
इन तमाम घटनाक्रमों को देखते हुए यह साफ है कि भारत-अमेरिका संबंधों के जल्द किसी स्थिर दौर में पहुंचने की संभावना कम ही दिखती है। व्यापार, कूटनीति और वैश्विक राजनीति मोर्चों पर आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों की परीक्षा होती रहेगी।
साल की शुरुआत से अब तक अमेरिका की कार्रवाइयों, बयानों और टिप्पणियों का सीधा असर भारत के हितों पर रहा है। इनमें सबसे अहम कदम अमेरिका द्वारा किया गया वह सैन्य अभियान है, जिसके तहत वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को कराकस से बाहर निकालकर न्यूयॉर्क की अदालत में पेश करने की तैयारी की गई। उन पर अमेरिका में ड्रग तस्करी को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए हैं। इस कार्रवाई के पीछे अमेरिका के उद्देश्य और रणनीति अब साफ हो चुके हैं। इसके नतीजे सिर्फ वेनेजुएला तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया पर इसका असर पड़ सकता है—खासतौर पर भारत जैसे उभरते वैश्विक शक्ति केंद्र के लिए।
ताकत के बल पर फैसले
मादुरो और उनकी पत्नी को जबरन बाहर निकालने की कोशिश के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह साफ कर दिया है कि वे अपने देश के हितों की रक्षा के लिए कितनी दूर तक और किस हद तक जाने को तैयार हैं। इस प्रक्रिया में उन्होंने उस नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्थाको नजरअंदाज कर दिया है, जिसे दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ही खड़ा किया था। यह सही है कि ट्रंप से पहले की अमेरिकी सरकारों ने भी कई बार अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन किया, लेकिन वे अपने कदमों को किसी न किसी तरह वैधता का आवरण देने की कोशिश करती थीं। ट्रंप इस तरह की औपचारिकताओं में विश्वास नहीं रखते। उनका साफ मानना है कि अगर अमेरिका के पास ताकत है तो वह जब चाहे दूसरे देशों पर अपनी मर्जी थोप सकता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी
अब तक अमेरिका यह सिद्धांत दोहराता रहा है कि देशों की संप्रभुता पवित्र है और किसी भी देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया जाना चाहिए—हालांकि व्यवहार में वह कई बार इसका उल्लंघन करता रहा। ट्रंप के मामले में स्थिति अलग है। वे यह दिखाने की भी जरूरत नहीं समझते कि उनके कदम अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में हैं। साफ है कि वे किसी वैश्विक नियम, समझौते या परंपरा से खुद को बंधा हुआ नहीं मानते। उनके लिए ताकत ही सबसे बड़ा हथियार है।
भारत की चिंता क्यों बढ़ी?
भारत हमेशा से यह कहता आया है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था न्याय और समानता पर आधारित होनी चाहिए। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाया है, लेकिन साथ ही उसने खासकर ग्लोबल साउथ के देशों के हितों के साथ संतुलन बनाने की कोशिश की है। भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भर विदेश नीति को बेहद अहम मानता है। मौजूदा विकास चरण में भारत के लिए नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था बेहद उपयोगी है। इसी वजह से ट्रंप की मादुरो के खिलाफ कार्रवाई ने भारत को असहज किया है, क्योंकि भारत ने मादुरो को वेनेजुएला का वैध राष्ट्रपति माना है। हालांकि भारत ने इस मुद्दे पर अब तक बेहद संयमित प्रतिक्रिया दी है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि भारत नहीं चाहता कि ऐसे समय में ट्रंप और ज्यादा नाराज हों, जब भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अटका हुआ है।
व्यापार समझौते पर गतिरोध
दो दिन पहले अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक ने दावा किया था कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता पूरा हो चुका है। लेकिन अंतिम मुहर लगाने के लिए उन्होंने भारतीय वार्ताकारों से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति ट्रंप से सीधे बात करनी होगी। क्योंकि यह बातचीत नहीं हो पाई, इसलिए व्यापार समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। इसी बीच अमेरिका ने अन्य देशों के साथ व्यापार समझौते कर लिए, जिनमें भारत की तुलना में ऊंचे टैरिफ तय किए गए।
बाद में भारतीय वार्ताकारों ने फिर से अमेरिकी पक्ष से संपर्क कर समझौता आगे बढ़ाने की सहमति जताई। लेकिन तब तक हालात बदल चुके थे। हावर्ड लुटनिक ने साफ शब्दों में कहा कि “ट्रेन स्टेशन से निकल चुकी है” और अब यह समझौता मेज पर नहीं है।
हालांकि, भारत ने अमेरिका के वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक के उस दावे को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता पूरा हो चुका था। भारत का कहना है कि विभिन्न मौकों पर दोनों देश समझौते को अंतिम रूप देने के काफी करीब जरूर पहुंचे थे, लेकिन यह कहना सही नहीं है कि डील पूरी तरह फाइनल हो गई थी। भारत ने यह भी साफ किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बातचीत नहीं हुई, यह दावा भी गलत है। भारतीय पक्ष के अनुसार, साल 2025 के दौरान दोनों नेताओं के बीच आठ बार फोन पर बातचीत हुई, जिनमें द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा की गई।
भारत ने रखा अपना पक्ष
यह सकारात्मक माना जा रहा है कि भारत ने बातचीत से जुड़ा अपना पक्ष सार्वजनिक रिकॉर्ड में रखा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत थोड़ी और जानकारी साझा करे तो स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। जैसे कि फोन कॉल की तारीखें, किस पक्ष ने बातचीत की पहल की और किन मुद्दों पर चर्चा हुई। ऐसी जानकारी देने से न तो कूटनीतिक मर्यादाएं टूटेंगी और न ही द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचेगा। साथ ही, इससे व्यापार समझौते पर चल रही बातचीत भी प्रभावित नहीं होगी।
सरकार किन मुद्दों पर समझौता नहीं कर सकती
मोदी सरकार उन बिंदुओं को भी सार्वजनिक कर सकती है, जिन पर दोनों देशों के बीच सहमति बन चुकी है और साथ ही यह भी बता सकती है कि किन कुछ मुद्दों पर मतभेद बाकी हैं। भारत के लिए खासतौर पर कृषि से जुड़े मुद्दों पर समझौता करना मुश्किल है, क्योंकि इससे किसानों के हित प्रभावित होते हैं। सांस्कृतिक और धार्मिक संवेदनशीलता से जुड़े मामलों में भी भारत पीछे हटने को तैयार नहीं है। सरकार का रुख साफ होने से इन दोनों मुद्दों पर देश के भीतर किसी तरह की गलतफहमी भी दूर हो सकती है।
भारत-पाकिस्तान मुद्दे पर ट्रंप की नाराजगी
डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ा मुद्दा यह बन गया है कि भारत यह मानता है कि पिछले साल मई में भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव में कमी दोनों देशों की आपसी बातचीत से हुई थी। यह भारत की पारंपरिक नीति के अनुरूप है, जिसमें भारत-पाकिस्तान संबंधों को द्विपक्षीय मामला माना जाता है और किसी तीसरे देश की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया जाता। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि भारत दूसरे बड़े देशों से युद्ध और शांति जैसे मुद्दों पर बातचीत नहीं करता। लेकिन भारत यह स्पष्ट करता है कि वह पाकिस्तान के साथ अपने संबंध स्वतंत्र रूप से तय करता है, न कि किसी अन्य देश के दबाव या प्रभाव में।
ट्रंप का दावा और नोबेल शांति पुरस्कार की चाह
ट्रंप का मानना है कि भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को उन्होंने अपनी मध्यस्थता से रोका, जो परमाणु युद्ध में बदल सकता था। उनका दावा है कि उन्होंने लाखों लोगों की जान बचाई। इसी वजह से वे खुद को नोबेल शांति पुरस्कार का हकदार मानते हैं। वे यह बात लगभग हर हफ्ते दोहराते रहे हैं। 9 जनवरी को भी, जब वे अमेरिकी तेल और गैस उद्योग के नेताओं से मिले—जो वेनेजुएला के पेट्रोलियम सेक्टर में जाने की तैयारी कर रहे हैं तो उन्होंने एक बार फिर मीडिया के सामने नोबेल शांति पुरस्कार की मांग दोहराई।
इस दौरान ट्रंप ने फिर कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले साल मई में हुई सैन्य झड़पें उनकी पहल से थमी थीं। उन्होंने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा था कि ट्रंप ने एक करोड़ लोगों की जान बचाई। गौरतलब है कि पिछले साल जून में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने औपचारिक रूप से नोबेल समिति को पत्र लिखकर भारत-पाकिस्तान तनाव कम कराने में भूमिका के लिए ट्रंप को नामित किया था।
मोदी से नाराजगी और भारत पर टैरिफ
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप, प्रधानमंत्री मोदी से इसलिए नाराज हैं, क्योंकि भारत ने यह स्वीकार नहीं किया कि भारत-पाकिस्तान तनाव खत्म कराने में ट्रंप की भूमिका थी। यही नाराजगी भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ की एक बड़ी वजह मानी जा रही है। इसमें से 25% टैरिफ भारत द्वारा रूस से तेल आयात जारी रखने को लेकर है। हालांकि, भारत ने रूसी तेल का आयात काफी कम कर दिया है, इसके बावजूद यह टैरिफ अब भी लागू है। माना जा रहा है कि ट्रंप ऐसा सिर्फ रूस को संदेश देने के लिए नहीं कर रहे, बल्कि इसमें उनकी निजी नाराज़गी भी शामिल है।
संबंधों में फिलहाल स्थिरता के आसार नहीं
इन तमाम घटनाक्रमों को देखते हुए यह साफ है कि भारत-अमेरिका संबंध जल्द ही किसी स्थिर दौर में पहुंचेंगे, इसकी संभावना कम ही दिखती है। व्यापार, कूटनीति और वैश्विक राजनीति—तीनों मोर्चों पर आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों की परीक्षा होती रहेगी।
(फेडरल सभी पक्षों से विचार और राय प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। लेख में दी गई जानकारी, विचार या राय लेखक की हैं और जरूरी नहीं कि वे फेडरल के विचारों को प्रतिबिंबित करें।)


