Vivek Katju

ईरान पर अमेरिका-इजरायल का हमला और नई वैश्विक व्यवस्था की आहट


ईरान पर अमेरिका-इजरायल का हमला और नई वैश्विक व्यवस्था की आहट
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भारत को ख़ामेनेई की हत्या का विशेष उल्लेख करना चाहिए. कम से कम यह खेद व्यक्त किया जाना चाहिए कि किसी देश के सर्वोच्च नेता को विशेष रूप से निशाना बनाकर मार दिया गया.

अमेरिका (United States) और इजरायल (Israel) ने 28 फरवरी से ईरान (Iran) पर हमला शुरू किया. ये युद्ध जारी है और इसके जल्द थमने के आसार नहीं नजर आ रहे. अमेरिका-इजरायल ने हमले के पहले दिन ईरान के आयतुल्ला अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) को मार गिराया. अमेरिका ने “रिजीम चेंज” यानी ईरान की मौजूदा व्यवस्था को बदलने की बात कही है. अमेरिका ने ‘रेजीम चेंज’ यानी शासन परिवर्तन की मांग की है, जिसका अर्थ है मौजूदा ईरानी व्यवस्था ‘विलायत-ए-फक़ीह’ का अंत. यह व्यवस्था 1979 की ईरानी क्रांति के नेता अयातुल्ला रुहोल्ला ख़ुमैनी के धर्मशास्त्रीय और राजनीतिक चिंतन पर आधारित है. अमेरिका और इज़राइल के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं होगा.

ईरान पर हमला और उसकी प्रतिक्रिया भले ही अपने आप में महत्वपूर्ण हो, लेकिन यह उस बड़े परिदृश्य का हिस्सा भी है जिसमें अमेरिका बिना हिचक एक नई विश्व व्यवस्था गढ़ना चाहता है ऐसी व्यवस्था जो विडंबना यह है कि 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वयं अमेरिका द्वारा स्थापित विश्व व्यवस्था से बिल्कुल अलग हो.

नई विश्व व्यवस्था ने उन सीमाओं से किनारा कर लिया है, जो एकतरफा और निर्दयतापूर्वक अपने हित साधने वाली महाशक्तियों पर लगाने की कोशिश की गई थीं. यह सही है कि महाशक्तियों ने शायद ही कभी विश्व व्यवस्था के मानकों को अपने मूलभूत हितों के आड़े आने दिया हो, लेकिन कम से कम वे उसी विश्व व्यवस्था की आड़ बनाए रखने की कोशिश करती थीं जिसे उन्होंने स्वयं स्थापित किया था. अब वह आड़ भी हट चुकी है. दो घटनाएं और एक भाषण यह दिखाते हैं कि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका क्या सोचता है और उसी के अनुसार कैसे काम करता है.

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) ने 14 फरवरी को म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन को संबोधित किया. यह भाषण उस घटना के लगभग छह सप्ताह बाद आया, जब वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो (Nicolas Maduro) और उनकी पत्नी सेलिया फ्लोरेस को अमेरिकी बलों ने राजधानी कराकस से अगवा कर लिया था. इस कार्रवाई ने ट्रंप प्रशासन की वैश्विक मानकों के प्रति अवहेलना को उजागर किया था. अपने संबोधन में रुबियो ने इसका औचित्य सिद्ध करने की कोशिश की. उन्होंने कहा, “हम अब तथाकथित वैश्विक व्यवस्था को अपने लोगों और अपने राष्ट्रों के महत्वपूर्ण हितों से ऊपर नहीं रख सकते.”

अर्थात, यदि “महत्वपूर्ण हितों” की मांग होगी कि किसी राष्ट्राध्यक्ष और उसकी पत्नी को उठा लिया जाए, तो ऐसा किया जाएगा और उसके लिए ‘कानूनी’ औचित्य भी खोज लिया जाएगा. मादुरो के मामले में पहले यह घोषित किया गया कि उनका चुनाव त्रुटिपूर्ण था और इसलिए वे अवैध रूप से पद पर थे. इसके अलावा, उनके अपहरण को कानून-व्यवस्था की कार्रवाई के रूप में पेश किया गया, मानो किसी भगोड़े को न्याय के कटघरे में लाया जा रहा हो.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था वैश्विक बहुलवाद के मूल विश्वास पर आधारित थी। यह इस विचार से संचालित थी कि सभी सभ्यताएं सम्मान की पात्र हैं। कोई अपनी सभ्यता पर गर्व कर सकता है, लेकिन यह भावना अन्य सभ्यताओं के सम्मान के सिद्धांत को कमजोर नहीं कर सकती।

फिर भी रुबियो ने पश्चिमी सभ्यता के गुणों का इस तरह बखान किया कि दशकों पहले के पश्चिमी उदारवादी भी असहज हो जाते. उन्होंने कहा, “द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से पहले पांच सदियों तक पश्चिम विस्तार करता रहा उसके मिशनरी, तीर्थयात्री, सैनिक और खोजी समुद्रों को पार कर नए महाद्वीपों में बसते गए और दुनिया भर में विशाल साम्राज्य खड़े किए.” पश्चिम के इस विस्तार के साथ उपनिवेशवाद की विनाशलीला भी जुड़ी थी, जिसने उपनिवेशित देशों के संसाधनों का निर्ममता से दोहन किया और वहां के लोगों के जीवन का कोई मूल्य नहीं समझा. उन्हें ‘कानूनविहीन निम्न जाति’ जैसा समझा गया. इसलिए जो भी पश्चिम का विरोध करता, उसे मार दिया जाता और उसके लिए कानूनी कारण ढूंढ लिए जाते.

इसके बावजूद रुबियो ने उपनिवेशवाद से हुई पीड़ा की अनदेखी की और अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों जो पश्चिमी सभ्यता का हिस्सा हैं से कहा कि वे “गिल्ट और शर्म की जंजीरों में न बंधें.” उन्होंने आगे कहा, “हम ऐसे सहयोगी चाहते हैं जिन्हें अपनी संस्कृति और विरासत पर गर्व हो, जो समझते हों कि हम एक ही महान और श्रेष्ठ सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं, और जो हमारे साथ मिलकर उसकी रक्षा करने को तैयार और सक्षम हों।” उनके शब्दों से संकेत मिलता है कि जो पश्चिम प्रभुत्वशाली रहा है, उसे वही बने रहना चाहिए.

रुबियो का भाषण वस्तुतः उपनिवेशवाद का बचाव था और यही वह व्यवस्था थी जिसके खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने संघर्ष किया. महात्मा गांधी के प्रेरणादायी नेतृत्व में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की. स्वतंत्र भारत ने उपनिवेशवाद के खिलाफ वैश्विक संघर्ष का नेतृत्व किया. यह एक महान विरासत है जिसे कभी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. उपनिवेशवाद-विरोधी वैश्विक आंदोलन में अग्रणी रहते हुए भी स्वतंत्र भारत ने अपने हितों की रक्षा के प्रयास में कभी किसी शक्ति के सामने घुटने नहीं टेके.

अब ट्रंप और अमेरिका फिर से पश्चिमी प्रभुत्व के युग की ओर लौटना चाहते हैं. रुबियो का भाषण उसका सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत करता है. मादुरो और उनकी पत्नी को उठा ले जाना तथा अयातुल्ला ख़ामेनेई की हत्या ये दोनों घटनाएं इस विचार को अमल में लाने के संकेत हैं. दुश्मन नेताओं को निशाना बनाना युद्ध में भी कम ही किया जाता है. लेकिन ख़ामेनेई को बिना औपचारिक युद्ध घोषणा के मार दिया गया. यह वही तरीका है जैसा पश्चिमी उपनिवेशवादी शक्तियां अपनाती थीं. अब अमेरिका और इज़राइल भी उसी तरह व्यवहार कर रहे हैं और वह भी दंडमुक्ति के साथ.

वे ऐसा इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि पश्चिमी शक्तियों और अन्य देशों की सैन्य क्षमता और ताकत में भारी अंतर है. जिस विज्ञान और तकनीकी अंतर ने यूरोप को एशिया और अफ्रीका पर उपनिवेश स्थापित करने में सक्षम बनाया था, वैसा ही अंतर अब अमेरिका और पश्चिम तथा बाकी दुनिया (चीन और कुछ विकसित देशों को छोड़कर) के बीच दिखाई देता है. नए उपनिवेशवाद से बचने का एकमात्र तरीका है स्वदेशी विकास के माध्यम से अपनी वास्तविक रक्षा क्षमता का निर्माण, विशेषकर रक्षा क्षेत्र में. जिन देशों के पास परमाणु हथियार हैं, वे अमेरिकी दंडात्मक कार्रवाई से काफी हद तक बच जाते हैं, भले ही उन पर प्रतिबंध लगाए जाएं.

भारतीय सुरक्षा योजनाकारों और राजनीतिक वर्ग को उस व्यापक संदर्भ से अवगत रहना चाहिए, जिसमें अमेरिका अपनी भूमिका निभा रहा है. भारत के तात्कालिक हितों का पीछा करते हुए भी इस व्यापक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखना आवश्यक है. इसलिए भारत को ख़ामेनेई की हत्या का विशेष उल्लेख करना चाहिए. कम से कम यह खेद व्यक्त किया जाना चाहिए कि किसी देश के सर्वोच्च नेता को विशेष रूप से निशाना बनाकर मार दिया गया. यह भी उल्लेख होना चाहिए था कि उनके घर और कार्यालय पर बमबारी में उनके परिवार के सदस्य मारे गए. यह सब तब भी कहा जाना चाहिए, भले ही भारत को उनके भारत संबंधी रुख और बयानों पर कुछ आपत्तियां रही हों.

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