
भारत में आर्थिक सुरक्षा, लैंगिक समानता और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में निवेश करना अनिवार्य है। तभी लोग सपनों का परिवार बना पाएंगे।
पूर्वी एशिया और यूरोप में जन्मदर घटने की खबरें भारत से दूर लग सकती हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की ‘State of World Population 2025’ रिपोर्ट बताती है कि भारत, इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे देश में
अब प्रजनन के एक निर्णायक मोड़ पर है। रिपोर्ट में चिंता यह जताई गई है कि भारत की जनसंख्या घट नहीं रही है, लेकिन लाखों लोग वह परिवार नहीं बना पा रहे, जिसकी वे इच्छा रखते हैं। इसकी वजह आर्थिक असुरक्षा है, न कि बच्चों की कमी की इच्छा।
सियोल से साओ पाउलो और भारत के छोटे शहरों तक यही कहानी दोहराई जा रही है। महंगे घर, बच्चों की शिक्षा और देखभाल के बढ़ते खर्च, असुरक्षित रोजगार आदि कारणों से परिवार शुरू करना कठिन हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग चार में से एक व्यक्ति कहता है कि आर्थिक दबाव के कारण उन्होंने उतने बच्चे नहीं किए, जितने वे चाहते थे।
वैश्विक ‘प्रजनन अंतर’
UNFPA इसे “fertility gap” यानी प्रजनन अंतर कहता है। यह अंतर उस संख्या का फर्क है जो लोग चाहेंगे और वास्तविक में होने वाले बच्चों की संख्या के बीच। दुनिया भर में लगभग आधे गर्भधारण अनपेक्षित हैं और हर पांच में से एक वयस्क अपने मनचाहे परिवार का आकार नहीं पा पाता। यह अंतर सरकारी आदेश या प्रचार से नहीं सुधारा जा सकता।
आर्थिक असुरक्षा ही सबसे बड़ी बाधा
दक्षिण कोरिया, जिसकी जन्मदर दुनिया में सबसे कम है, एक चेतावनी देता है: बच्चा होना अब मुश्किल नहीं बल्कि महंगा हो गया है। यह समस्या केवल अमीर देशों तक सीमित नहीं है। कामकाजी और मध्यम वर्गीय परिवारों की जिंदगी पर भी इसका असर पड़ रहा है। रिपोर्ट में दिखाया गया है कि भारत में किशोर गर्भधारण कम हुआ है, लड़कियां अधिक समय तक स्कूल में पढ़ रही हैं और महिलाएं मातृत्व को टाल रही हैं। यह महिलाओं की स्वतंत्रता और अवसर का संकेत है। लेकिन बिना सहयोगी कार्यस्थल, किफायती चाइल्डकेयर और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं के कई दंपत्ति समय रहते परिवार नहीं बना पाते।
सामाजिक और लैंगिक असमानताएं
भारत में सामाजिक अपेक्षाएं, पारिवारिक दबाव, कलंक और घरेलू हिंसा तय करते हैं कि महिलाएं कब और क्या मातृत्व अपनाएं। रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर सिर्फ आधी महिलाएं ही अपने यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के निर्णय स्वतंत्र रूप से ले पाती हैं।
समाधान: केवल चेतावनी नहीं, समर्थन जरूरी
रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है कि केवल जागरूकता अभियानों से काम नहीं चलेगा। लोगों को अर्थिक सुरक्षा, लचीली कार्यशैली, माता-पिता के लिए छुट्टियां और किफायती चाइल्डकेयर जैसी मूल सुविधाएं मिलनी चाहिए। UNFPA का कहना है कि समाज तभी फल-फूल सकता है जब लोग खुद अपने प्रजनन विकल्प चुनने में समर्थ हों। इसके लिए व्यापक यौन शिक्षा, गर्भनिरोध और बांझपन उपचार तक पहुंच, गुणवत्ता वाली मातृत्व स्वास्थ्य सेवाएं, सुरक्षित गर्भपात और लैंगिक आधारित हिंसा से मजबूत सुरक्षा जरूरी है। साथ ही, पुरुषों को भी पितृत्व की जिम्मेदारी और सामाजिक दबाव के संदर्भ में शामिल करना जरूरी है।
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