
मार्कापुरम बस आग: भारत के राजमार्ग मौत का जाल क्यों बने हुए हैं?
गायब स्पीड गन से लेकर निगरानी रहित टोल प्लाजा तक, सड़क सुरक्षा प्रवर्तन में प्रणालीगत विफलताएं आंध्र के राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रियों की जान ले रही हैं
Andhra Pradesh Burning Bus: आंध्र प्रदेश में बस में आग लगने की एक और भयावह घटना में, गुरुवार (26 मार्च) की सुबह कम से कम 14 लोग जिंदा जल गए। यह हादसा तब हुआ जब उनकी निजी बस प्रकाशम जिले के मरकापुरम के पास एक टिप्पर लॉरी से टकरा गई। वह लॉरी पास की ही एक ग्रेनाइट खदान की थी। इस दुर्घटना ने एक बार फिर भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों पर व्याप्त 'कानूनविहीन' स्थिति की ओर सबका ध्यान खींचा है।
हादसों का खूनी इतिहास और प्रशासन का मौन:
आंध्र और तेलंगाना के हाइवे पर खून की होली लगातार जारी है। अक्टूबर 2025 में कुरनूल के पास भी 21 लोग जिंदा जले थे। उस समय पूरे देश में इस त्रासदी की चर्चा हुई थी। लेकिन एक महीने बाद ही तेलंगाना में 19 और जानें गईं। जनवरी में भी नंदयाल में एक बस आग की चपेट में आई। साल 2013 के महबूबनगर हादसे की यादें आज भी ताजा हैं। तब 40 से ज्यादा लोगों की जान बस की आग में गई थी। महाराष्ट्र और राजस्थान में भी हाल के वर्षों में ऐसे ही कांड हुए। हर बार मौत का कारण तेज रफ्तार और सुरक्षा मानकों की कमी रही। प्रशासनिक सख्ती केवल कागजों और आश्वासनों तक ही सीमित नजर आती है।
निजी बस ऑपरेटरों का 'अंधा साम्राज्य':
राज्य में सरकारी बस सेवा APSRTC के समानांतर एक बड़ा तंत्र खड़ा है। निजी बस ऑपरेटरों ने अपना एक अलग और अनियंत्रित नेटवर्क बना लिया है। अकेले तिरुपति से हर दिन 326 से ज्यादा निजी बसें रवाना होती हैं। इनमें एसी स्लीपर और नॉन-एसी बसें धड़ल्ले से चल रही हैं। पूरे राज्य में ऐसी बसों की संख्या एक हजार से पार है। ये ऑपरेटर 'वन इंडिया वन टैक्स' नीति का जमकर दुरुपयोग करते हैं। बसें अन्य राज्यों में रजिस्टर कराई जाती हैं ताकि टैक्स बचे। लेकिन ये बसें पूरी तरह से आंध्र प्रदेश के भीतर ही चलती हैं। रेगुलेटरी अथॉरिटी इन अनियमितताओं को देखकर भी अपनी आंखें मूंद लेती है।
स्पीड गवर्नर: सुरक्षा का केवल एक दिखावा:
साल 2015 से सभी नई बसों में स्पीड लिमिटिंग डिवाइस अनिवार्य है। नियम के अनुसार बस शोरूम से निकलते समय ही यह फिट होना चाहिए। लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा तकनीकी झोल मौजूद है। राज्य परिवहन विभाग के पास इन डिवाइस की जांच की तकनीक नहीं है। उन्हें नहीं पता कि चलते समय ये डिवाइस सक्रिय हैं या नहीं। अक्सर ड्राइवर इन डिवाइस को हटा देते हैं या उनसे छेड़छाड़ करते हैं। तिरुपति आरटीओ के अधिकारियों ने खुद इस बात को स्वीकार किया है। उनके पास ऐसी कोई मशीन नहीं जो सड़क पर बस रोककर स्पीड गवर्नर चेक कर सके। यह लापरवाही सीधे तौर पर सड़क पर चल रहे यात्रियों की जान से खिलवाड़ है।
हाइवे और टोल प्लाजा का तकनीकी फेलियर:
सरकार ने हाइवे बनाने के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च किए हैं। टोल प्लाजा पर आधुनिक सेंसर और कैमरे लगाए गए हैं। ये प्लाजा हर गाड़ी से मोटी फीस वसूलते हैं। लेकिन इन कैमरों का इस्तेमाल ओवरस्पीडिंग रोकने में नहीं होता। विशेषज्ञों का कहना है कि औसत गति निकालना बहुत आसान है। अगर एक गाड़ी 9 बजे एक टोल पार करती है और 10 बजे अगले पर पहुँचती है। तो उसकी औसत गति का हिसाब सॉफ्टवेयर खुद लगा सकता है। लेकिन टोल ऑपरेटरों को केवल पैसा वसूलने से मतलब है। सुरक्षा उनकी प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे आती है। यह सिस्टम मौजूद है पर इसे जानबूझकर लागू नहीं किया जा रहा।
निजी बनाम सरकारी: सुरक्षा का दोहरा मापदंड:
सरकारी बस ऑपरेटर APSRTC ने अपनी बसों में कुछ कड़े नियम बनाए हैं। तिरुपति से चेन्नई चलने वाली सरकारी बसों की रफ्तार 80 पर फिक्स है। हर सीट के पास इमरजेंसी हैमर यानी शीशा तोड़ने वाला हथौड़ा लगा है। यह एक छोटी लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण जीवन रक्षक पहल है। अगर सरकारी बसें ये सुरक्षा मानक अपना सकती हैं तो निजी बसें क्यों नहीं? निजी ऑपरेटरों की 10 घंटे की रात की यात्रा सबसे ज्यादा जोखिम भरी होती है। फिर भी परिवहन विभाग उन्हें ऐसे साधारण सुरक्षा उपकरण रखने के लिए मजबूर नहीं करता। निजी बसों के खिड़की-दरवाजे हादसे के समय अक्सर जाम हो जाते हैं।
तिरुपति-तिरुमला का मॉडल क्यों नहीं लागू होता?
तिरुपति से तिरुमला जाने वाले घाट रोड पर सुरक्षा का एक बेहतरीन मॉडल है। वहां 18 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए 30 मिनट का समय तय है। अगर कोई वाहन इससे पहले पहुँचता है तो ऑटोमैटिक जुर्माना लगता है। यही नहीं उस वाहन पर पहाड़ी रास्ते पर चलने का प्रतिबंध भी लग जाता है। यह तकनीक बहुत सरल और प्रभावी साबित हुई है। लेकिन ताज्जुब की बात है कि इसे नेशनल हाइवे पर लागू नहीं किया गया। हाइवे पर गाड़ियाँ 120 की रफ्तार से दौड़ती हैं और कोई पूछने वाला नहीं। सिस्टम की यही ढिलाई बड़े हादसों को दावत देती है।
रेलवे कनेक्टिविटी का अभाव और मजबूरी का सफर:
सड़क हादसों को कम करने का एक स्थायी हल रेल नेटवर्क का विस्तार है। तिरुपति से रोजाना करीब 95 ट्रेनें गुजरती हैं। फिर भी यात्रियों की भारी मांग को ये पूरा नहीं कर पातीं। अकेले हैदराबाद रूट पर 21 स्पेशल ट्रेनें चलती हैं। फिर भी लोगों को टिकट नहीं मिल पाते और वे निजी बसों का रुख करते हैं। रेलवे में तीसरे ट्रैक और नए डिविजन की मांग सालों से लंबित है। जब तक रेल सेवाएं पर्याप्त नहीं होंगी, लोग इन 'मौत की बसों' में बैठने को मजबूर रहेंगे। प्रशासन को अब लंबी नींद से जागना होगा वरना राख के ढेर और बढ़ेंगे।
(लेख मूल रूप से द फेडरल आंध्र प्रदेश में प्रकाशित हुआ था।)

