पर्वतारोही अरूण तिवारी का अंतिम विश्राम अब एवरेस्ट की चोटियों पर
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पर्वतारोही अरूण तिवारी का अंतिम विश्राम अब एवरेस्ट की चोटियों पर

हैदराबाद के पर्वतारोही का पार्थिव शरीर पर्वत पर ही छोड़ेगा परिवार, आध्यात्मिक आस्था और जोखिमों के चलते लिया भावुक फैसला


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Arun Kumar Tiwari Death: हैदराबाद के रहने वाले पर्वतारोही अरुण कुमार तिवारी का पिछले हफ्ते माउंट एवरेस्ट से उतरते समय निधन हो गया था। अब उनके परिवार ने एक बेहद बड़ा और भावुक फैसला लिया है। परिवार ने अरूण के पार्थिव शरीर को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर ही स्थायी रूप से विश्राम करने देने का निर्णय लिया है। पारंपरिक तरीके से शव को वापस लाने की कोशिशों से अलग परिवार का यह फैसला उनकी गहरी आध्यात्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। परिवार अरूण का हिमालय के साथ गहरा जुड़ाव था और वे इसे ही सम्मान देना चाहते हैं। तेलंगाना के रहने वाले 53 वर्षीय सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल अरूण कुमार तिवारी की 21 मई को शिखर पर पहुंचने के कुछ ही घंटों बाद हिलेरी स्टेप के पास मौत हो गई थी। रिकवरी मिशन पर कई दिनों के विचार-विमर्श के बाद बुधवार 27 मई को परिवार ने स्पष्ट कर दिया कि वे शव को घर नहीं लाएंगे।


शिव के धाम में हैं अरूण
तिवारी के बहनोई सुधीर उपाध्याय ने पत्रकारों को बताया कि परिवार एवरेस्ट को त्रासदी की जगह नहीं बल्कि एक पवित्र स्थान मानता है। उन्होंने कहा कि वह भगवान शिव के धाम में हैं। पार्थिव शरीर को वापस लाने की प्रक्रिया बहुत कठिन थी। तब तक शरीर काफी खराब हो चुका होता। ऐसी ऑपरेशन्स की सफलता की दर भी बहुत कम होती है। परिवार ने जोर दिया कि अरूण एक भावुक पर्वतारोही थे जो पर्वत श्रृंखला का सम्मान करते थे। अरूण ने पहले भी माउंट एल्ब्रस, डेनाली और एकांकागुआ जैसे वैश्विक शिखर फतह किए थे। उन्होंने 2025 में भी एवरेस्ट पर चढ़ने का प्रयास किया था, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से 7200 मीटर से वापस लौट आए थे। इस वसंत ऋतु में वे अपने जीवन के सपने को पूरा करने के लिए वापस लौटे थे।

हाई-एल्टीट्यूड रिकवरी की चुनौतियां
आध्यात्मिक भावनाओं के अलावा अत्यधिक ऊंचाई पर शव को लाने की बड़ी बाधाओं ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है। अभियान आयोजकों ने बताया कि डेथ ज़ोन से मैनुअल रिकवरी के लिए आठ से दस अनुभवी शेरपाओं की एक विशाल टीम की जरूरत होती है। इस बेहद खतरनाक प्रक्रिया में बर्फ से जमे शव को काट कर बाहर निकालना पड़ता है। इसके बाद रस्सियों के जरिए उसे ढलान से नीचे लाना होता है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, यह जोखिम भरे ऑपरेशन्स अक्सर 71 लाख रुपये से ज्यादा महंगे होते हैं। सामान्य अभियान बीमा में हेलीकॉप्टर निकासी शामिल होती है, लेकिन मैनुअल रिकवरी शामिल नहीं होती है। इस कारण कई परिवार अपने प्रियजनों को ढलानों पर ही छोड़ देना पसंद करते हैं।

एवरेस्ट पर भारी भीड़ बनी त्रासदी
तिवारी इसी अभियान के दौरान जान गंवाने वाले दो भारतीय पर्वतारोहियों में से एक थे। दूसरे पर्वतारोही 46 वर्षीय संदीप अरे की 20 मई को शिखर पर पहुंचने के कुछ देर बाद मौत हो गई थी। संदीप को शिखर के नीचे गंभीर स्नो ब्लाइंडनेस और थकान ने घेर लिया था। शेरपा गाइडों की टीम उन्हें कैंप दो तक नीचे लाने में सफल रही थी, लेकिन 22 मई को उन्होंने दम तोड़ दिया। संदीप कम ऊंचाई पर थे, इसलिए बचाव दल उन्हें हेलीकॉप्टर से वापस लाने में सफल रहे। यह दोहरा हादसा माउंट एवरेस्ट पर अभूतपूर्व भीड़ के समय हुआ है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल ने इस सीजन के लिए रिकॉर्ड 495 परमिट जारी किए थे। एक ही दिन में 274 पर्वतारोहियों ने शिखर को फतह किया था। इस अत्यधिक भीड़ के कारण पांच किलोमीटर लंबी कतार लग गई थी। पर्वतारोहियों को पतली हवा में लंबा इंतजार करना पड़ा था, जिससे उतरते समय उनकी थकान और मौत का जोखिम बहुत बढ़ गया था।


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