
जयललिता की 'चेन्नई परंपरा' छोड़ दिल्ली पहुंचे EPS, गठबंधन पर आर-पार
तमिलनाडु NDA में सीट शेयरिंग पर फंसा पेंच; EPS ने अमित शाह से की मुलाकात, स्टालिन ने साधा निशाना, पीयूष गोयल कल चेन्नई में करेंगे फाइनल डील। जानें पूरा मामला।
Tamil Nādu Assembly Election : तमिलनाडु की सियासत में इन दिनों एक ऐसा बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसने दशकों पुरानी राजनीतिक परंपराओं को झकझोर कर रख दिया है। AIADMK के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब गठबंधन और सीटों के बंटवारे जैसी महत्वपूर्ण चर्चाएं चेन्नई के पार्टी मुख्यालय 'एमजीआर मालिगाई' से निकलकर सीधे देश की राजधानी दिल्ली की चौखट पर पहुंच गई हैं। पार्टी के शीर्ष नेता एडप्पादी के. पलानीस्वामी (EPS) ने एक लंबी चली आ रही परंपरा को दरकिनार करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ बंद कमरे में सीधी बातचीत की है। पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता के दौर में, गठबंधन की सभी शर्तें चेन्नई के 'पोस गार्डन' में तय होती थीं, लेकिन अब बदले हुए शक्ति समीकरणों के बीच EPS का दिल्ली दौरा राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ चुका है।
इस घटनाक्रम पर राज्य की सत्ताधारी पार्टी DMK ने बेहद तीखा और हमलावर रुख अपनाया है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने EPS के इस कदम पर तंज कसते हुए कहा कि उन्होंने AIADMK के आत्म-सम्मान को दिल्ली के दरबार में गिरवी रख दिया है। स्टालिन ने जनता के बीच सवाल उछाला कि अगर तमिलनाडु की कमान ऐसे नेताओं के हाथ में चली गई जो चुनाव लड़ने के लिए भी दिल्ली से पर्ची कटने का इंतजार करते हैं, तो राज्य के स्वाभिमान का क्या होगा? DMK का सीधा आरोप है कि AIADMK अब पूरी तरह से केंद्र की भाजपा सरकार की 'बी-टीम' बन चुकी है। हालांकि, AIADMK ने भी इस पर पलटवार करने में देरी नहीं की। पार्टी प्रवक्ताओं ने इसे स्टालिन का दोहरा मापदंड बताते हुए याद दिलाया कि करुणानिधि ने भी गठबंधन के लिए दिल्ली के कई चक्कर काटे थे।
सीटों का गणित: भाजपा और AIADMK के बीच कहाँ फंसा है पेंच?
अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात के बाद EPS ने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट संकेत दिए कि अगले चार दिनों के भीतर सीटों के बंटवारे की पूरी तस्वीर साफ हो जाएगी। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि सीटों की संख्या को लेकर दोनों दलों के बीच अभी भी बड़ा गतिरोध बना हुआ है।
भाजपा की बड़ी मांग: पिछले लोकसभा चुनावों में 11% वोट शेयर हासिल करने के बाद भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है। पार्टी इस बार विधानसभा चुनाव में कम से कम 40 सीटों की मांग कर रही है।
AIADMK का सुरक्षात्मक रुख: पलानीस्वामी का खेमा भाजपा को केवल 25 से 28 सीटें देने के पक्ष में है। EPS का मानना है कि AIADMK को कम से कम 160 सीटों पर अपने चुनाव चिन्ह "दो पत्ती" (Two Leaves) पर चुनाव लड़ना चाहिए ताकि बहुमत का आंकड़ा पार्टी के पास सुरक्षित रहे।
छोटे दलों का दबाव: PMK के अंबुमणि रामदास और AMMK के टीटीबी दिनाकरण भी दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं, जिससे गठबंधन के भीतर सीटों की खींचतान और जटिल हो गई है।
गठबंधन का 'सुल्तान' कौन? EPS की दो टूक रणनीति
EPS इस बात पर पूरी तरह अडिग हैं कि तमिलनाडु में NDA का चेहरा और नेतृत्व केवल AIADMK ही करेगी। इस दिल्ली दौरे का एक मुख्य उद्देश्य यह भी था कि भाजपा के साथ किसी भी 'पैरेलल डील' (Parallel Deal) को रोका जा सके। दरअसल, दिनाकरण की AMMK चाहती थी कि उनकी सीट शेयरिंग सीधे भाजपा के माध्यम से तय हो, लेकिन EPS इसके सख्त खिलाफ हैं। उन्होंने भाजपा नेतृत्व को स्पष्ट कर दिया है कि पूरे तमिलनाडु NDA की ओर से गठबंधन के समझौते पर केवल वही हस्ताक्षर करेंगे। वे चाहते हैं कि स्टालिन की तरह उनकी भी गठबंधन में वही भूमिका हो, जहाँ छोटे दल उनके नेतृत्व को स्वीकार करें।
पीयूष गोयल और 'सम्मान' की अनकही कहानी
राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि AIADMK नेतृत्व और भाजपा के मुख्य वार्ताकार पीयूष गोयल के बीच आपसी तालमेल में कुछ खटास आई थी। वरिष्ठ पत्रकार थरासु श्याम के अनुसार, ऐसी खबरें हैं कि AIADMK ने पीयूष गोयल के कद और अनुभव के अनुरूप उन्हें सम्मान नहीं दिया, जिसकी वजह से बात अमित शाह तक पहुंची। यही कारण है कि शाह ने खुद कमान संभाली और EPS को दिल्ली बुलाया। हालांकि, श्याम का मानना है कि EPS का दिल्ली जाना उनकी कमजोरी नहीं बल्कि उनकी कूटनीतिक मजबूती को दर्शाता है कि वे सीधे शीर्ष स्तर पर 'हार्ड बारगेनिंग' करने की क्षमता रखते हैं।
अगले 48 घंटे तमिलनाडु की राजनीति के लिए बेहद निर्णायक होने वाले हैं। पीयूष गोयल कल चेन्नई पहुंच रहे हैं, जहाँ अंतिम दौर की बातचीत के बाद सीटों की आधिकारिक घोषणा की जा सकती है। EPS का लक्ष्य बहुत साफ है—गठबंधन का नियंत्रण अपने हाथ में रखना और भाजपा को सीमित सीटों पर समेटना।

