
कर्नाटक: पहली कक्षा में प्रवेश की आयु पर घमासान, 60 दिन की छूट भी नाकाफी
कर्नाटक सरकार ने कक्षा 1 के दाखिले के लिए आयु सीमा में 60 दिन की छूट दी है, लेकिन अभिभावक इसे नाकाफी बताते हुए कट-ऑफ को 5.5 वर्ष करने की मांग पर अड़े हैं।
Karnataka And NEP : कर्नाटक सरकार ने शैक्षणिक वर्ष 2026-27 से कक्षा 1 में प्रवेश के लिए बच्चों की आयु पात्रता मानदंड में 60 दिन (दो महीने) की छूट देने की घोषणा की है। इस नए नियम के तहत, अब वे बच्चे भी दाखिले के पात्र होंगे जिनकी आयु 1 जून तक पांच वर्ष 10 महीने है। सरकार का यह कदम उन अभिभावकों को राहत देने के लिए है जो इस बात से चिंतित थे कि उनके बच्चों का एक साल बर्बाद हो जाएगा और उन पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। हालांकि, अभिभावक समुदाय इस रियायत से अब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।
अभिभावकों की मांग है कि सरकार कक्षा 1 में प्रवेश के लिए कट-ऑफ आयु को फिर से साढ़े पांच साल (5.5 वर्ष) करे, जैसा कि पिछले साल तक चलन में था। डर यह है कि केवल 60 दिनों की छूट देने से लगभग चार लाख बच्चे दाखिले से वंचित रह सकते हैं, जबकि इससे केवल एक लाख बच्चों को ही लाभ मिलेगा।
NEP और छह साल का नियम: भ्रम की स्थिति
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुसार, कक्षा 1 में प्रवेश के लिए बच्चे की आयु प्रवेश वर्ष की 1 जून तक छह वर्ष होनी अनिवार्य है। कर्नाटक ने भी अपने आयु नियमों में बदलाव करते हुए इसे अपनाया है, जबकि दशकों से यहाँ साढ़े पांच साल का नियम चल रहा था। जब इस पुरानी व्यवस्था को अचानक बंद किया गया, तो हजारों अभिभावक असमंजस में पड़ गए।
छह साल के नियम के तहत समस्या यह है कि यदि किसी बच्चे ने एलकेजी (LKG) और यूकेजी (UKG) सफलतापूर्वक पूरी कर ली है, लेकिन वह जून की निर्धारित तारीख तक छह साल का नहीं हो पाता (भले ही कुछ ही दिनों का अंतर हो), तो उसे मजबूरी में यूकेजी दोहराना पड़ेगा। यह न केवल बच्चे के लिए मानसिक तनाव का कारण बनता है, बल्कि अभिभावकों के लिए भी आर्थिक रूप से असुविधाजनक है। 60 दिनों की इस नई छूट ने इस डर को पूरी तरह खत्म नहीं किया है।
अभिभावकों का आरोप: 'यह भेदभावपूर्ण है'
शिकायत करने वाले अभिभावकों में से एक, चंद्रकला बी. ने 'द फेडरल' को बताया कि हालांकि 60 दिन की छूट अच्छी है, लेकिन यह केवल एक लाख बच्चों की मदद करेगी। उन्होंने कहा, "उन बच्चों के साथ यह अन्याय है जो अपना छठा वर्ष पूरा करने से महज ढाई से तीन महीने दूर हैं।" कई अन्य अभिभावकों ने भी सरकार पर एक विशेष वर्ग को खुश करने के लिए भेदभाव करने का आरोप लगाया है।
शिक्षा जगत के विशेषज्ञ भी सरकार के इस आधे-अधूरे फैसले से प्रभावित नहीं हैं। सेवानिवृत्त शिक्षक टी. रवि कुमार ने कहा कि पिछली आयु सीमा सही थी और इसे बढ़ाकर छह साल करने से लाखों बच्चों का भविष्य प्रभावित हुआ है। उन्होंने 60 दिन की छूट की सराहना तो की, लेकिन इसे 30 दिन और बढ़ाने की वकालत की। उन्होंने कहा, "इससे पहली कक्षा में लाखों बच्चों के प्रवेश की राह आसान हो जाएगी।" रवि कुमार ने प्री-प्राइमरी स्तर पर नामांकन में तकनीकी खामियों को भी एक बड़ी समस्या बताया, जिसे ठीक करने की तत्काल आवश्यकता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर छिड़ा आंदोलन
असंतुष्ट अभिभावकों ने अब व्हाट्सएप, फेसबुक और 'एक्स' (X) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर "आयु सीमा घटाकर 5.5 वर्ष करें" जैसे टैग्स के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है। पूरे राज्य के अभिभावक एकजुट हो रहे हैं ताकि सरकार कट-ऑफ आयु को और नीचे लाने के लिए मजबूर हो सके।
बाल अधिकार निकाय और विपक्ष का हस्तक्षेप
इस मामले में 'कर्नाटक राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग' ने भी हस्तक्षेप किया है। आयोग ने शिक्षा विभाग को सिफारिश की है कि इस छूट को बढ़ाकर कम से कम तीन महीने किया जाना चाहिए। आयोग के अनुसार, इससे 2.3 लाख से अधिक बच्चों की समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है। भारतीय जनता पार्टी के विधायक अरविंद बेलाड ने विधानसभा में चेतावनी दी कि यह मामला हर साल की समस्या नहीं बनना चाहिए। उन्होंने मांग की कि इसे एक स्थायी कानून बनाया जाए और राज्य शिक्षा अधिनियम में संशोधन कर आयु सीमा में स्थायी छूट दी जाए।
बजट सत्र के दौरान उन्होंने कहा, "सरकार केवल 60 दिन की छूट देकर चुप बैठी है, जो 4 लाख बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक है। यह देखते हुए कि शैक्षणिक वर्ष 2026-27 एक विशेष संक्रमणकालीन वर्ष है, कम से कम 3 से 5 महीने की छूट देना उचित है। शिक्षा विशेषज्ञों, अभिभावकों और शिक्षकों के साथ चर्चा के बाद एक निश्चित आयु सीमा तय की जानी चाहिए।"
आंकड़ों का गणित और भविष्य की अनिश्चितता
पिछले साल भी अभिभावकों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया था, जिसके बाद सरकार ने मानवीय आधार पर कट-ऑफ आयु में दो महीने की अस्थायी छूट दी थी। इस साल ये चिंताएं फिर से उभर आई हैं।
सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार, राज्य भर में 2.3 लाख से अधिक बच्चे इस साल 1 जून को छह साल के नहीं होंगे और वे इस मानदंड से मात्र कुछ दिन या अधिकतम 90 दिन पीछे रह जाएंगे। अभिभावकों की लगातार अपील और बढ़ते दबाव के कारण ही सरकार ने 60 दिन की छूट दी है, लेकिन मांग अब इसे और विस्तार देने की है।
(यह लेख मूल रूप से द फेडरल कर्नाटक में प्रकाशित हुआ था।)
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