
मासिक धर्म अंधविश्वास ने रोकी लड़कियों की पढ़ाई, कर्नाटक के तुमकुर में हॉस्टल खाली
कर्नाटक के तुमकुर जिले के एक गांव में मासिक धर्म से जुड़े अंधविश्वास के कारण 8 साल से बालिका छात्रावास खाली है, जिससे लड़कियों की शिक्षा और संसाधनों पर असर पड़ा है।
कर्नाटक के तुमकुर ज़िले के अक्किरामपुरा गांव (कोराटगेरे तालुक) में स्थित एक सरकारी बालिका छात्रावास पिछले लगभग आठ वर्षों से वीरान पड़ा है। यह इलाका राज्य के गृह मंत्री जी. परमेश्वर का विधानसभा क्षेत्र है। इस छात्रावास के बंद रहने के पीछे कोई प्रशासनिक कारण नहीं, बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुकी स्थानीय अंधविश्वासी मान्यता है—गांव के देवी मंदिर के पास रहने वाली मासिक धर्म वाली लड़कियां देवी के क्रोध को आमंत्रित करेंगी।
यह ‘कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यार्थी निलय’, जिसे जिला पंचायत और सार्वजनिक शिक्षा विभाग ने लगभग 80 लाख रुपये की लागत से अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की लड़कियों के लिए बनाया था, कभी करीब 45 छात्राओं का घर हुआ करता था। लेकिन कोविड के बाद से यहां एक भी लड़की ने दाखिला नहीं लिया।
जर्जर हो रही इमारत
आज इस छात्रावास की हालत बेहद खराब है। सोलर पैनल, पानी की पाइपें और दरवाजे जंग खा रहे हैं। बालकनियों में शराब की बोतलें और सिगरेट के पैकेट बिखरे पड़े हैं। अब इस इमारत का उपयोग जल जीवन मिशन के निर्माण सामग्री रखने और दूसरे जिलों से आए मजदूरों के ठहरने के लिए किया जा रहा है।
‘देवी का क्षेत्र’
यह छात्रावास येलु मांडेम्मा देवी मंदिर से लगभग 100 मीटर की दूरी पर है और स्थानीय लोग मानते हैं कि यह पूरा इलाका देवी की परिधि में आता है। उनका विश्वास है कि देवी इस क्षेत्र में विचरण करती हैं और मासिक धर्म वाली महिलाएं, नई माताएं या मांस खाने वाले लोग इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकते। यह मान्यता सिर्फ हिंदुओं तक सीमित नहीं है—करीब 3,000 आबादी वाले इस गांव में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग इसे मानते हैं।
एक किसान श्रीनिवास कहते हैं, “पहले यहां लड़कियां रहती थीं, लेकिन अब कोई दाखिला नहीं लेता। लोगों का मानना है कि मासिक धर्म वाली लड़कियां इस क्षेत्र में नहीं रह सकतीं क्योंकि देवी यहां घूमती हैं।” गृहिणी जयम्मा का सुझाव है, “लड़कियों का छात्रावास गांव से बाहर है और सुरक्षित नहीं है। अगर गांव के अंदर स्थित लड़कों का छात्रावास यहां शिफ्ट कर दिया जाए, तो लड़कियां गांव के भीतर वाले भवन का इस्तेमाल कर सकती हैं।”
मुस्लिम निवासी शफी अहमद भी यही मानते हैं, “हम भी येलु मांडेम्मा देवी में विश्वास करते हैं। जब हम मासिक धर्म में होते हैं या मांस खाते हैं, तो इस रास्ते से नहीं जाते।” एक अन्य निवासी अल्लाभक्ष ने कहा, “छात्रावास के पास का हाई स्कूल भी मंदिर की सीमा में आता है। इसलिए हम अपनी बेटियों को मासिक धर्म के दौरान नौ दिनों तक स्कूल नहीं भेजते।”
असहमति की आवाजें
हालांकि, गांव में सभी लोग इस अंधविश्वास को नहीं मानते। दादापीर नामक निवासी कहते हैं, “हम ऐसी बातों में विश्वास नहीं करते और इस रास्ते पर स्वतंत्र रूप से चलते हैं।” एक अन्य ग्रामीण सुरेश के अनुसार, “एक समय छात्रावास की वार्डन ने अफवाह फैला दी थी कि वहां कुछ अजीब गतिविधि हो रही है। उसी के बाद से माता-पिता अंधविश्वास की ओर झुक गए। देवी के नाम पर छात्रावास बंद रखना सही नहीं है।”
जागरूकता की जरूरत
तुमकुर साइंस सेंटर के उपाध्यक्ष सी. यातिराजु का मानना है कि इस अंधविश्वास को संवाद के जरिए चुनौती दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा, “जिला पंचायत, शिक्षा विभाग और संबंधित अधिकारियों को गांव में जागरूकता बैठकें करनी चाहिए। सार्वजनिक धन से बनी इमारत को यूं बर्बाद नहीं होने देना चाहिए।”
कर्नाटक राज्य विज्ञान परिषद के अध्यक्ष हुलिकल नटराजु ने बताया कि उन्होंने स्थानीय शिक्षा अधिकारी के अनुरोध पर यहां एक प्रयोग भी किया था। “हम आसपास के स्कूलों की लड़कियों को लाए और उन्हें सुबह से शाम तक छात्रावास में रखा, ताकि यह साबित किया जा सके कि वहां कोई अलौकिक शक्ति नहीं है। बच्चे तो मान गए, लेकिन माता-पिता की सोच नहीं बदली।”
उन्होंने इस मान्यता पर सवाल उठाते हुए कहा, “अगर देवी यहां घूमती हैं, तो यह तो अच्छी बात है। और क्या देवी खुद एक महिला नहीं हैं? वह लड़कियों को आशीर्वाद देंगी, नुकसान नहीं पहुंचाएंगी।”
विडंबना और सवाल
प्रगतिशील विचारक के.एस. विमला ने इस प्रथा को असंवैधानिक बताया। उन्होंने कहा, “मासिक धर्म, गर्भावस्था और प्रसव प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाएं हैं। इन्हें अपवित्र कहना मानवता और संविधान दोनों पर दाग है। यह विडंबना है कि परमेश्वर जैसे नेता, जिन्होंने छुआछूत के अनुभवों पर सार्वजनिक रूप से आंसू बहाए, उनके ही क्षेत्र में अंधविश्वास के कारण एक बालिका छात्रावास खाली पड़ा है।”
शिक्षा विशेषज्ञ निरंजनाराध्य वी.पी. ने भी तीखी टिप्पणी की, “वैज्ञानिक युग में इस तरह की मान्यताओं का बने रहना इस बात का संकेत है कि हमारी शिक्षा प्रणाली तार्किक सोच विकसित करने में असफल रही है।”
प्रशासन की चुप्पी
अक्किरामपुरा ग्राम पंचायत के प्रभारी विकास अधिकारी एम. रमेश ने बताया कि कोविड के दौरान छात्रावास बंद हुआ था और उसके बाद से कोई दाखिला नहीं हुआ। उन्होंने माना कि मंदिर से जुड़ी मान्यता भी एक कारण हो सकती है।उन्होंने कहा, “हमें जून में फिर से आवेदन आमंत्रित करने के निर्देश मिले हैं। ग्रामीणों ने छात्रावास बदलने का सुझाव दिया है। आवेदन मिलने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।”
कानून और हकीकत
कर्नाटक में 2020 से अमानवीय कुप्रथाओं और काले जादू को रोकने के लिए कानून लागू है, जो सीधे गृह मंत्री परमेश्वर के अधीन आता है। इसके बावजूद उनके ही क्षेत्र में इस तरह की प्रथा का जारी रहना सरकार की प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करता है।हालांकि मंत्री ने हाल ही में कार्रवाई का आश्वासन दिया है, लेकिन यह देखना बाकी है कि स्थिति में वास्तविक बदलाव कब और कैसे आता है।

