
इंडिया ओपन से उठे सवाल, क्या तैयार हैं हमारे स्टेडियम?
इंडिया ओपन में पक्षियों की बीट से रुका मैच भारतीय खेल ढांचे की कमजोरियां उजागर करता है, जहां गैर-क्रिकेट खेल फंड, रखरखाव और बुनियादी सुविधाओं के संकट से जूझ रहे हैं।
रैली जारी थी कि अचानक खेल रुक गया। जनवरी के मध्य में नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में इंडिया ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट के पुरुष एकल मुकाबले के दौरान खिलाड़ी नेट के पार देखने के बजाय ऊपर देखने लगे। अधिकारी कोर्ट पर आए, तौलिये लाए गए, टीवी कैमरे ज़ूम इन करने लगे और फोकस था पक्षियों की बीट पर।
भारत के एच.एस. प्रणॉय और सिंगापुर के लो केन यू के बीच मैच एक बार नहीं, बल्कि दो बार रोका गया। हर बार कोर्ट को साफ किया गया, खेल दोबारा शुरू हुआ, और फिर वही समस्या लौट आई। भारत के सबसे प्रमुख इंडोर खेल स्थलों में से एक में पक्षियों ने प्रवेश कर लिया था और तत्काल कोई समाधान नहीं दिख रहा था।
मैच के बाद प्रणॉय ने संक्षेप में कहा, “पक्षियों की बीट के कारण खेल रुका।” लो ने हॉल के भीतर की हवा को लेकर कहा कि सांस लेना मुश्किल था और इससे सहनशक्ति प्रभावित हुई। बयान संयमित थे, लेकिन जो दृश्य सामने आया वह खुद बहुत कुछ कह रहा था। यह केवल एक शर्मनाक वायरल क्षण नहीं था। यह भारत की वैश्विक खेल मेज़बानी की महत्वाकांक्षा और बुनियादी रखरखाव व संचालन नियंत्रण की वास्तविकता के बीच टकराव था।
आने वाले दिनों में अन्य अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों ने अधिक स्पष्ट शब्दों में प्रतिक्रिया दी। डेनमार्क की शटलर मिया ब्लिचफेल्ट ने सार्वजनिक रूप से स्टेडियम को गंदा और अस्वस्थ बताया, यह कहते हुए कि हॉल के भीतर पक्षी उड़ रहे थे और कोर्ट के पास गंदगी कर रहे थे। एक अन्य दिन, दर्शक दीर्घा के भीतर कथित रूप से बंदर के होने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिससे यह धारणा और मजबूत हुई कि आयोजन स्थल बुनियादी नियंत्रण में भी संघर्ष कर रहा है।
बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन ने बयान जारी कर कहा कि खेल क्षेत्र आवश्यक मानकों पर खरा उतरता है और वायु गुणवत्ता सहित पर्यावरणीय चुनौतियों का प्रबंधन किया जा रहा है। आयोजकों ने भी कहा कि स्थिति संभाल ली गई है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय सर्किट में नियमित यात्रा करने वाले खिलाड़ियों और खेल समुदाय के भीतर यह प्रतिक्रिया आश्वस्त करने के बजाय रक्षात्मक लगी।
वरिष्ठ खेल पत्रकार और प्रशासक एक असहज सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। पिछले लगभग तीन वर्षों से कई डेनिश खिलाड़ी भारत में टूर्नामेंट खेलने को लेकर अनिच्छुक रहे हैं। यह बात शायद ही सार्वजनिक रूप से कही जाती है। खिलाड़ियों को डर रहता है कि उन्हें मुश्किल या नखरीला करार दिया जाएगा। लेकिन यह झिझक मौजूद है, और इसके कारण केवल प्रतिस्पर्धी परिस्थितियों तक सीमित नहीं हैं।
इंडिया ओपन की घटना ने एक कठिन सवाल उठाया—क्या भारत के गैर-क्रिकेट खेल ढांचे वास्तव में उच्च स्तरीय प्रतिस्पर्धा या रोज़मर्रा के प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त और सुरक्षित हैं? हरियाणा में इसका जवाब दुखद घटनाओं के रूप में सामने आया। नवंबर 2025 में गुरुग्राम के एक सरकारी खेल परिसर में अभ्यास के दौरान एक 17 वर्षीय बास्केटबॉल प्रशिक्षु की मौत हो गई, जब जंग लगे जोड़ और ढीले एंकरिंग के कारण बास्केटबॉल पोल गिर गया। एक सप्ताह बाद जींद में जिला स्तरीय खेल परिसर में 16 वर्षीय खिलाड़ी की अस्थिर उपकरण के कारण जान चली गई। दोनों ही नाबालिग थे और सार्वजनिक सुविधाओं में प्रशिक्षण ले रहे थे।
इसके बाद आपात निरीक्षण हुए, समितियां बनीं, आश्वासन दिए गए। लेकिन खिलाड़ियों और कोचों के बीच राहत से अधिक आक्रोश था। उनका कहना था कि चेतावनी संकेत वर्षों से दिख रहे थे। गुरुग्राम के नेहरू स्टेडियम में असमतल और फिसलन भरे कोर्ट की शिकायतें लगातार आती रहीं। फरीदाबाद में प्रशिक्षण हॉल के पास शौचालयों में इस्तेमाल की गई सिरिंज मिलने की खबर आई। रोहतक के राजीव गांधी स्टेट स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और छोटू राम स्टेडियम में जर्जर हालात, टूटे दरवाजे और गंदगी की शिकायतें सामने आईं।
ओलंपिक पदक विजेताओं के गांवों में स्टेडियम निर्माण की घोषणाएं भी धीमी रहीं। कई परियोजनाएं धनाभाव के कारण अटकी पड़ी हैं। यह केवल हरियाणा की समस्या नहीं है। राजस्थान को उभरते खेल केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन राजस्थान टेनिस संघ के अध्यक्ष दिलीप शिवपुरी का कहना है कि गैर-क्रिकेट खेलों की सबसे बड़ी समस्या धन की कमी है। मीडिया कवरेज कम होने से प्रायोजक नहीं मिलते, और प्रायोजन के बिना ढांचा नहीं सुधरता—यह एक दुष्चक्र है। उनका कहना है कि क्रिकेट की तुलना में अन्य खेलों में करियर की स्थिरता कम होने से प्रतिभाशाली खिलाड़ी भी बीच में खेल छोड़ देते हैं।
राजस्थान बैडमिंटन संघ के उपाध्यक्ष मनोज दासोत बताते हैं कि जिला और राज्य स्तरीय टूर्नामेंट आयोजित करना भी कठिन है। नियमित प्रतियोगिताएं न होने से खिलाड़ी मैच अनुभव खो देते हैं और सुविधाएं भी अनुपयोगी पड़ी रहती हैं। तमिलनाडु में खिलाड़ी बताते हैं कि कई बार कबड्डी खिलाड़ी निगम के मैदानों में अभ्यास करते हैं क्योंकि समर्पित कोर्ट नहीं हैं। फुटबॉल खिलाड़ियों का कहना है कि राज्य में फुटबॉल-विशिष्ट स्टेडियमों की कमी है। मैदान एथलेटिक्स के साथ साझा होते हैं, जिससे सतह खराब होती है और चोट का खतरा बढ़ता है। ड्रेसिंग रूम तक पर्याप्त नहीं हैं।
पूर्व भारतीय फुटबॉलर और कोच रमण विजयन कहते हैं कि बड़े टूर्नामेंटों के दौरान स्टेडियमों का रखरखाव होता है, लेकिन आयोजन समाप्त होते ही स्थिति बिगड़ जाती है। निजी टर्फ महंगे हैं और तकनीकी रूप से उपयुक्त नहीं, खासकर कम संसाधन वाले खिलाड़ियों के लिए। मुंबई में समस्या अलग है ढांचा मौजूद है, लेकिन पहुंच और वहन क्षमता सीमित है। सार्वजनिक मैदान या तो बुक रहते हैं, या खराब हालत में, या नियंत्रित पहुंच वाले हैं। खिलाड़ी अक्सर देर रात अभ्यास करते हैं।
युवा मामलों और खेल मंत्रालय तथा विभिन्न सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि आधे से कम स्कूलों में उपयोग योग्य खेल मैदान हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या और कम है। इससे शुरुआती स्तर पर प्रतिभा पहचान कठिन हो जाती है। क्रिकेट के साथ तुलना स्पष्ट है। क्रिकेट देश के खेल राजस्व का अधिकांश हिस्सा प्राप्त करता है, मजबूत और स्वायत्त प्रशासनिक ढांचे का लाभ उठाता है और निरंतर व्यावसायिक समर्थन पाता है। गैर-क्रिकेट खेल सीमित सरकारी सहायता और अनियमित प्रायोजन पर निर्भर हैं।
वरिष्ठ खेल पत्रकार गुलु एज़ेकियल मानते हैं कि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। उनके अनुसार पिछले 30–40 वर्षों की तुलना में ढांचे में सुधार हुआ है—अधिक स्टेडियम, अकादमियां और ‘खेलो इंडिया’ जैसी योजनाएं शुरू हुई हैं। वे 2008 ओलंपिक को एक मोड़ मानते हैं, जिसने गैर-क्रिकेट खेलों को बढ़ावा दिया। हालांकि उसी वर्ष आईपीएल की व्यावसायिक सफलता ने संतुलन को फिर क्रिकेट की ओर झुका दिया।
हाल के वर्षों में खेल बजट में वृद्धि और नई योजनाओं की घोषणाएं हुई हैं, लेकिन अधिकारी भी मानते हैं कि उपयोग और रखरखाव सबसे बड़ी चुनौती है। बंद या कम उपयोग होने वाली सुविधाएं टिकाऊ नहीं रह सकतीं।
इंडिया ओपन की वह घटना अब भले पीछे छूट गई हो, लेकिन उसने एक गहरा प्रतीक छोड़ दिया। भारत वैश्विक आयोजन करना चाहता है, ओलंपिक पदक जीतना चाहता है, विश्वस्तरीय लीग चाहता है। लेकिन खेल केवल महत्वाकांक्षा से नहीं चलता। वह साफ कोर्ट, सुरक्षित उपकरण, सांस लेने योग्य हवा, कार्यशील शौचालय और खिलाड़ियों के लिए गरिमा पर निर्भर करता है।
जब तक इन बुनियादी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, सवाल बना रहेगा। क्या भारत दुनिया की मेज़बानी कर सकता है, और क्या उसके अपने खिलाड़ियों को दुनिया के लिए तैयार होने योग्य स्थान मिल रहा है?

