केरल में अराक बैन के 30 साल, सुधार की कहानी या बढ़ती चुनौतियां?
x

केरल में अराक बैन के 30 साल, सुधार की कहानी या बढ़ती चुनौतियां?

केरल में 1996 में अराक (देसी शराब) पर लगाए गए प्रतिबंध के 30 साल पूरे हो गए हैं। जो शराब कभी केरल में कलंक मानी जाती थी, वह आज विदेश में एक 'प्रीमियम ग्लोबल प्रोडक्ट' के रूप में बेची जा रही है।


केरल में एक समय एक स्थानीय शराब होती थी जिसे मलयालम में “चरायम” कहा जाता था, और बाकी जगहों पर इसे अराक (Arrack) के नाम से जाना जाता था। यह नारियल के पेड़ के रस, गुड़ या गन्ने के शीरे से बनाई जाती थी। इसे छोटे-छोटे देसी तरीकों से तैयार किया जाता और फिर छोटे 90 ml की बोतलों (पोडिक्कुप्पी) में बेचा जाता था।

अराक की दुकानें सिर्फ शराब बेचने की जगह नहीं थीं, बल्कि वहां लोग इकट्ठा होकर राजनीति पर चर्चा करते, सौदे करते और कई बार झगड़े भी होते थे। धीरे-धीरे इसे समाज के लिए नुकसानदायक माना जाने लगा, खासकर महिलाओं और चर्च के विरोध के कारण। लेकिन 1 अप्रैल, 1996 को तत्कालीन मुख्यमंत्री ए.के. एंटनी ने एक झटके में इस पर प्रतिबंध लगा दिया। आज इस फैसले के 30 साल पूरे होने वाले हैं, लेकिन इसके जख्म और यादें आज भी ताजा हैं। यह फैसला विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लिया गया था।

सिर्फ शराब नहीं, एक सामाजिक केंद्र

पुराने समय में अराक की दुकानें सिर्फ शराब बेचने की जगह नहीं थीं। वहां राजनीतिक बहसें होती थीं, सौदे तय किए जाते थे और अक्सर झगड़े भी होते थे। आबकारी विभाग हर साल इन दुकानों की नीलामी करता था। ठेकेदार इन लाइसेंसों को आगे उप-ठेके पर देते थे, जिससे नियंत्रण की कई परतें बन जाती थीं। हालांकि, समाज का एक बड़ा हिस्सा इसके खिलाफ था।

त्रिशूर के एक गांव में रहने वाली लगभग 70 साल की जानकी उस दिन को याद करती हैं जब अराक की दुकानें बंद हुईं। जानकी केआर के लिए यह बैन किसी नीतिगत फैसले से कहीं बढ़कर था। उनके पति उन्हें छोड़ चुके थे और तीन बच्चों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। उन्होंने एक अराक की दुकान में खाना बनाने से शुरुआत की और धीरे-धीरे दुकान चलाने लगीं।

समाज ने उन्हें ताने दिए, उन्हें 'वेश्या' तक कहा गया, लेकिन जानकी पीछे नहीं हटीं। उन्होंने कहा, "मैंने तीन साल तक अकेले अराक बेचा। मैंने जो कुछ भी कमाया, उन्हीं दिनों से आया। उसी कमाई से मैंने अपने बच्चों को पाला। आज मेरा एक बेटा विदेश में है, एक बेटी टीचर है और दूसरी फार्मासिस्ट।" जब 1 अप्रैल 1996 को बैन लागू हुआ, तो जानकी की कमाई का जरिया छिन गया। उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला क्योंकि वह कानूनी तौर पर 'ठेकेदार' की श्रेणी में नहीं आती थीं।

क्या बैन से शराबखोरी खत्म हुई?

प्रतिबंध के आलोचकों का तर्क है कि इससे शराबखोरी खत्म नहीं हुई, बल्कि उसका रूप बदल गया। अराक की जगह IMFL (Indian-Made Foreign Liquor) ने ले ली, जो काफी महंगी थी। 78 वर्षीय माधवन ककुंगल कहते हैं, "हमें मुआवजे के नाम पर सिर्फ 30,000 रुपये मिले। बैन से मजदूरों की रोटी छिन गई, लेकिन शराब पीना बंद नहीं हुआ। आज हम टैक्स के रूप में तीन गुना ज्यादा कीमत चुका रहे हैं।" वरिष्ठ पत्रकार श्रीजीत दिवाकरण का भी मानना है कि इस फैसले ने शराब के कारोबार को 'अंडरग्राउंड' कर दिया और मिलावटी शराब की तस्करी को बढ़ावा दिया।

चरायम' का नया अवतार: केरल में बैन, पोलैंड में प्रीमियम!

दिलचस्प बात यह है कि जहां केरल में इस पर बैन के 30 साल पूरे हो रहे हैं, वहीं एक मलयाली उद्यमी मिथुन मोहन ने "Manavatty" ब्रांड नाम से अराक को यूरोप में लॉन्च किया है। पोलैंड में बनने वाली इस शराब ने लंदन स्पिरिट्स कॉम्पिटिशन 2025 में कांस्य पदक भी जीता है। जो शराब कभी केरल में कलंक मानी जाती थी, वह आज विदेश में एक 'प्रीमियम ग्लोबल प्रोडक्ट' के रूप में बेची जा रही है।

आज पर्यटन उद्योग भी सवाल उठा रहा है कि क्या श्रीलंका की तरह केरल भी अराक को एक 'सांस्कृतिक उत्पाद' के रूप में पेश कर सकता था? लेकिन केरल की राजनीति में अराक की यादें आज भी विवादों और सामाजिक दबाव से जुड़ी हुई हैं।

Read More
Next Story