1990 का जख्म आज भी हरा, पुनर्वास के इंतज़ार में कश्मीरी पंडित परिवार
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1990 का जख्म आज भी हरा, पुनर्वास के इंतज़ार में कश्मीरी पंडित परिवार

1990 में कश्मीर से विस्थापित कश्मीरी पंडित आज भी जम्मू के शिविरों में बदहाल हालात में रह रहे हैं। पुनर्वास और वापसी के वादे अब भी अधूरे हैं।


55 वर्षीय अशोक रैना को वह दिन आज भी साफ़ याद है, जब उनका परिवार कश्मीर छोड़कर चला गया था। वे कहते हैं, जब हमने शोपियां के मुजमार्ग स्थित अपने घर का मुख्य गेट बंद किया, तो मेरे पिता और पूरा परिवार फूट-फूटकर रो पड़ा था। वह साल 1990 था और तब अशोक अपने बीसवें दशक में थे। तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उस याद को सोचते ही उनकी आंखों से आँसू बहने लगते हैं।

तब से उनका परिवार जम्मू में रह रहा है, कश्मीरी पंडितों के लिए बनाए गए विस्थापन शिविरों में। कश्मीर घाटी की हिंदू आबादी को कश्मीरी पंडित कहा जाता है। अशोक के पिता कश्मीर में सरकारी कर्मचारी थे, लेकिन विस्थापन के बाद उनका पूरा जीवन जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा दी जाने वाली नकद सहायता और मुफ्त राशन (जिसकी भरपाई केंद्र सरकार करती है) पर निर्भर रहा। 2011 में पिता की मृत्यु के बाद यह सहायता उनकी माँ को मिलने लगी, लेकिन 2018 में उनका भी निधन हो गया।

अशोक ने निजी क्षेत्र में अलग-अलग नौकरियां कीं, लेकिन 2020 में दिल से जुड़ी समस्याओं के कारण दो सर्जरी होने के बाद से उनकी कोई आय नहीं है। अब वे भी पूरी तरह सरकारी राहत पर निर्भर हैं। अशोक, उनकी पत्नी और दो बच्चे जम्मू के बाहरी इलाके में स्थित पुरखू पंडित शिविर में रहते हैं, जहाँ उनके अलावा 124 अन्य परिवार भी हैं।

यहां रहने के लिए सिर्फ टीन की शेडनुमा झोपड़ियाँ हैं, जिनका आकार लगभग 20 फीट बाय 12 फीट है। इन्हीं तंग जगहों में पूरा परिवार रहता है। अशोक का घर भी टीन की चादरों से अस्थायी तौर पर बाँटा गया है, ताकि एक छोटा सा रसोईघर और सोने की जगह बन सके। हवा की निकासी बेहद खराब है और गोपनीयता लगभग नहीं के बराबर—खासतौर पर तब, जब घर में दो युवा बच्चे हों। अशोक के दोनों बच्चे अभी छात्र हैं, जिनकी उम्र 18 और 20 साल है।

“हम यहां बेहद बदहाल ज़िंदगी जी रहे हैं,” अशोक कहते हैं। “जून-जुलाई के मानसून में इन शेडों में रहना बेहद मुश्किल हो जाता है।” गर्मियों में हालात और भी खराब हो जाते हैं, जब तापमान अक्सर 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है।

19 जनवरी 1990: वह रात जिसने ज़िंदगी बांट दी

अधिकांश कश्मीरी पंडितों के लिए कम से कम वे जो 1990 से पहले घाटी में पैदा हुए थे।19 जनवरी 1990 की रात एक ऐसी लकीर है, जिसने उनकी ज़िंदगी को ‘पहले’ और ‘बाद’ में बांट दिया। उस समय आतंकवाद तेज़ी से बढ़ रहा था और हिंदू विरोधी भावनाएँ भी। अल्पसंख्यक समुदाय होने के कारण पंडितों को अपने ही घर में असुरक्षा महसूस होने लगी थी।

फिर 19 जनवरी की रात “रलिव, चलिव या गलिव” (धर्म बदलो, भाग जाओ या मरो) जैसे नारे गूँजने लगे और पंडितों के घरों पर पत्थर फेंके गए। अगले दिन कश्मीर घाटी से पंडितों का सामूहिक पलायन शुरू हो गया। 35 साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी, जब समुदाय के कई लोग भारत और दुनिया भर में बिखर चुके हैं, तब भी कुछ लोग जम्मू के शिविरों में जीवन गुज़ार रहे हैं।

टूटती उम्मीदें

कश्मीरी पंडित समुदाय ने केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से पुनर्वास की उम्मीदें लगाई थीं। भाजपा ने 2014 के आम चुनावों से ही अपने घोषणापत्र में पंडितों के पुनर्वास का मुद्दा शामिल किया था। लेकिन 11 साल बाद, समुदाय की उम्मीदें कमजोर पड़ती दिख रही हैं।

जम्मू के जगती माइग्रेंट कैंप में लगभग 5,000 पंडित परिवार रहते हैं। यहाँ दो कमरों और एक बाथरूम वाले फ्लैट हैं, जिन्हें 2011 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने बनवाया था। इसके अलावा पुरखू, भूटानगर और मुथी जैसे इलाकों के शिविरों में भी विस्थापित पंडित परिवार रह रहे हैं।

अशोक बताते हैं कि उन्होंने और पुरखू शिविर के अन्य लोगों ने कई बार पुनर्वास आयुक्त के कार्यालय जाकर टीन शेड की जगह पक्के मकानों की माँग की, लेकिन उन्हें अक्सर डाँट दिया जाता है और “अवैध निवासी” तक कह दिया जाता है। वे सवाल करते हैं, “अगर हम अवैध हैं, तो हमें राहत और राशन कार्ड क्यों दिए जाते हैं? हम अपनी मर्ज़ी से यहाँ नहीं आए। हालात ने हमें अपना घर छोड़ने पर मजबूर किया।”

'आज हम भिखारियों जैसी ज़िंदगी जी रहे हैंओ'

जगती शिविर में रहने वाले 73 वर्षीय ओम प्रकाश महाजन शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं—उनका एक हाथ नहीं है। श्रीनगर के अमीरा कदल के मूल निवासी महाजन भी 1990 में घाटी छोड़कर आए थे। वे कहते हैं कि सरकार से मिलने वाली ₹3,250 मासिक राहत में गुज़ारा करना बेहद मुश्किल है। “मुझे रोज़ दवाइयाँ चाहिए। इस उम्र में मैं कैसे मैनेज करूं?” वे पूछते हैं। “कश्मीर में ज़ैना कदल में मेरा तीन मंज़िला घर था और महाराजा बाज़ार में दुकान। आज हम भिखारियों जैसी ज़िंदगी जी रहे हैं।”

62 वर्षीय अश्वनी कुमार भी राहत राशि पर निर्भर रहने की पीड़ा बताते हैं। “शुरुआत में ₹500 मिलते थे, फिर ₹1,000 हुए। धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई, लेकिन पिछले पाँच साल से एक भी इज़ाफ़ा नहीं हुआ,” वे कहते हैं। उनका आरोप है कि राहत की अधिकतम सीमा ₹13,000 ही है, चाहे परिवार में कितने भी सदस्य हों।

अधूरा पुनर्वास

रिपोर्टों के अनुसार, 2022 तक भी जम्मू में 5,000 से अधिक पंडित परिवार पुनर्वास शिविरों में रह रहे थे। 1990 के दशक से लेकर 2000, 2008 और 2015 तक कई योजनाएँ बनीं, नौकरियाँ घोषित हुईं, ट्रांजिट आवासों की घोषणाएँ हुईं—लेकिन ज़मीन पर बहुत कम बदला।

कश्मीरी लेखक और पनुन कश्मीर संगठन के संस्थापक अग्निशेखर इन प्रयासों को “कॉस्मेटिक” बताते हैं। उनका कहना है कि जब तक समाज में भरोसा बहाल नहीं होगा, 1990 जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने की गारंटी नहीं मिलेगी और विस्थापन को नरसंहार के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक पंडितों की वापसी सिर्फ़ बयानबाज़ी बनी रहेगी।

वापसी की चाह, लेकिन शर्तों के साथ

कुछ पंडित आज भी घाटी में अपने पुराने पड़ोसियों के साथ रहने की इच्छा जताते हैं। मुथी शिविर में रहने वाले 70 वर्षीय जवाहरलाल कहते हैं कि पंडित और मुसलमानों की भाषा, संस्कृति और सामाजिक ताना-बाना साझा रहा है।

हैदराबाद में रहने वाले विजय रैना कहते हैं कि उनकी जड़ें आज भी कश्मीर में हैं। उनके बच्चे सवाल पूछते हैं “हम कश्मीरी होकर हैदराबाद में क्यों रहते हैं? हम कब लौटेंगे?”

हालांकि, कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिक्कू का कहना है कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद समुदायों के बीच दूरी और बढ़ी है, जिससे वापसी की संभावना और कम हो गई है।

राजनीति और ज़मीनी हकीकत

स्थानीय राजनीतिक दल पुनर्वास का भरोसा दिलाते रहे हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और प्रशासन सभी अपने-अपने दावे करते हैं। वहीं राहत आयुक्त का कहना है कि कोई भी परिवार असुरक्षित या छोड़ी गई झोपड़ियों में नहीं रह रहा और प्राथमिकता विधवाओं व दिव्यांगों को दी जा रही है।

लेकिन अशोक रैना जैसे लोगों के लिए ये आश्वासन खोखले साबित हुए हैं। वे कहते हैं, “भाजपा का कश्मीर में कोई वोट बैंक नहीं है, सिवाय कश्मीरी पंडितों के। घोषणाएँ हुईं, लेकिन ज़मीनी हकीकत नहीं बदली।” 2020 तक भाजपा के बूथ स्तर के अध्यक्ष रहे अशोक अब निराश हैं। वे कहते हैं, “हमने सोचा था कि यह सरकार हमारा दर्द समझेगी, लेकिन न हमें ढंग से बसाया गया, न ही वापसी का रास्ता बना। कश्मीर लौटने का सपना आज पहले से भी ज़्यादा दूर लगता है।”

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