
पश्चिम बंगाल में SIR में हटाए गए 7 लाख नाम, 60 लाख से ज्यादा मामले EC के विचाराधीन
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से करीब 7 लाख लोगों का पत्ता कट गया।
भारत निर्वाचन आयोग ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय समयसीमा के अनुरूप विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद पश्चिम बंगाल की पहली किस्त की मतदाता सूची जारी की। हालांकि अभी चुनाव आयोग ने सूची ऑनलाइन जारी नहीं की थी, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि पिछले दिसंबर में प्रकाशित ड्राफ्ट सूची के बाद राज्य में कुल 7.08 करोड़ मतदाताओं में से अब तक लगभग 7 लाख नाम ‘हटाए गए’ चिह्नित किए गए हैं, जबकि 60,60,475 नाम विचाराधीन (अंडर एडजुडिकेशन) श्रेणी में रखे गए हैं।
ये करीब 60 लाख मामले ड्राफ्ट सूची में ‘तार्किक विसंगति’ या ‘अनमैप्ड’ श्रेणी में चिह्नित होने के बाद सत्यापन के लिए लंबित हैं।
पिछले दिसंबर में प्रकाशित ड्राफ्ट सूची में 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए थे। चुनाव आयोग के सूत्रों ने कहा कि SIR प्रक्रिया पूरी होने तक हटाए गए मतदाताओं की संख्या मौजूदा आंकड़े से अधिक हो सकती है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य के विभिन्न जिलों में शनिवार दोपहर से मतदाता सूची की हार्ड कॉपियां वितरित की जा रही थीं और शाम तक सूची के ऑनलाइन उपलब्ध होने की संभावना है।
अब तक बांकेुरा जिले में अंतिम सूची से लगभग 1.18 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। नादिया जिले में लगभग 2.73 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
उत्तर कोलकाता में अंतिम ड्राफ्ट में करीब 17,000 मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिससे SIR प्रक्रिया शुरू होने के बाद से कुल हटाए गए नामों की संख्या 4.07 लाख हो गई है।
दक्षिण कोलकाता में यह संख्या 3,207 रही, जबकि 78,675 मतदाताओं के नामों पर अभी फैसला होना बाकी है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही दावा कर चुकी हैं कि अंतिम सूची प्रकाशित होने पर 1.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं।
उत्तर बंगाल के अलीपुरद्वार जिले में अंतिम सूची में 11,96,651 नाम शामिल हैं, जबकि कुल हटाए गए नामों की संख्या 1,02,835 बताई गई है।
शनिवार को कई जिलों में अद्यतन मतदाता सूचियों की हार्ड कॉपियां प्रदर्शित की गईं, हालांकि निर्धारित पोर्टल और मोबाइल एप्लिकेशन पर सूचियां देर शाम तक उपलब्ध नहीं कराई गई थीं।
चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि नाम हटाने के प्रमुख कारण मृत्यु, स्थानांतरण, दोहराव (डुप्लिकेशन) और मतदाता का पता न चल पाना रहे हैं, जबकि नए नाम दस्तावेजों की जांच के बाद जोड़े गए हैं।
राज्य के कई हिस्सों में लोग नोटिस बोर्ड पर लगी मुद्रित सूचियों को देखने के लिए उमड़ पड़े, पन्ने पलटे और मोबाइल फोन से प्रविष्टियों की तस्वीरें लीं। जिला मजिस्ट्रेट और उप-विभागीय कार्यालयों में लोग लंबी कतारों में खड़े होकर यह सत्यापित करते दिखे कि उनके नाम ‘स्वीकृत’, ‘हटाए गए’ या ‘विचारणाधीन’ श्रेणी में रखे गए हैं।

