दिल्ली में AAP–LG टकराव फिर तेज, सौरभ भारद्वाज का वीके सक्सेना पर तीखा हमला
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दिल्ली में AAP–LG टकराव फिर तेज, सौरभ भारद्वाज का वीके सक्सेना पर तीखा हमला

AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना पर सरकार को पंगु करने के आरोप लगाए और उनके रवैये की तीखी आलोचना की।


आम आदमी पार्टी और दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना के बीच तनातनी की कहानी नई नहीं है। सरकार में रहने के दौरान आप और उपराज्यपाल के बीच तलवार खींची रहती थी। इस कड़ी में दिल्ली आप के संयोजक सौरभ भारद्वाज ने वीके सक्सेना पर भगवान के प्रकोप और उन्हें पीड़ा मिलने की कामना कर रहे हैं। भारद्वाज ने कहा कि आप सरकार के दौरान ऐसी परिस्थतियों का निर्माण किया गया जिससे हम पंगु हो जाएं। जानबूझकर ऐसी अधिकारियों की तैनाती हुई जो लगातार कामकाज में रोड़ा अटकाते रहें।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि BJP और केंद्र सरकार लगातार यह तर्क देती रहीं कि दिल्ली देश की राजधानी है लिहाजा अधिकारियों के तबादलों का अधिकार चुनी हुई राज्य सरकार को नहीं दिया जा सकता। इसक असर यह हुआ कि सरकार में रहते हुए भी हम भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सके या कार्रवाई करीब करीब नामुमकिन हो गया।

2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार को ये अधिकार न्यायोचित रूप से वापस कर दिए थे। हालांकि, केंद्र सरकार ने बाद में अनैतिक और असंवैधानिक कानून लाकर उन शक्तियों को फिर से अपने पास ले लिया। भारद्वाज ने सवाल उठाया कि जब वही कानून अब भी लागू है, तो फिर मंत्रियों द्वारा अधिकारियों के ट्रांसफर और निलंबन कैसे संभव हो पा रहे हैं।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि तत्कालीन मुख्य सचिव और स्वास्थ्य सचिव जैसे अधिकारियों को भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता की कई शिकायतों के बावजूद संवेदनशील पदों पर बनाए रखा गया। इन अधिकारियों को उपराज्यपाल के संरक्षण में काम करने दिया गया जबकि मंत्रियों को एक चपरासी तक का तबादला करने की इजाजत नहीं थी। इसके बावजूद उनसे रोज़ाना कामकाज और नीतियों की डिलीवरी को लेकर जवाबदेही मांगी जाती रही।

प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए भारद्वाज ने कहा कि यह पूरा घटनाक्रम उनके शासन मॉडल और राजनीतिक सोच को उजागर करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक लाभ के लिए जानबूझकर ऐसी प्रशासनिक बाधाएं खड़ी की गईं, जिनका सीधा असर लाखों गरीब दिल्ली वालों पर पड़ा। इन फैसलों से कैंसर के मरीजों और डायलिसिस पर निर्भर लोगों तक की बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हुईं।

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