पहले ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय,अब कुर्मी बनाम लोध…यूपी चुनाव से पहले मुद्दे ग़ायब, जातियों का शोर !
ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय और अब कुर्मी बनाम लोध की चर्चा से चुनाव से पहले ही जातियों का घमासान होने के आसार बढ़ गए हैं।

यूपी चुनाव में एक साल का वक्त रह गया है और चारों तरफ़ जातियों का शोर सुनाई पड़ रहा है।अपने सम्मान और सियासी हिस्सेदारी की माँग करते हुए जातियों के मुखर होने से सभी सियासी दल दबाव में हैं।ख़ास तौर पर बीजेपी में इसको लेकर बेचैनी बढ़ी है।ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय और अब कुर्मी बनाम लोध की चर्चा से चुनाव से पहले ही जातियों का घमासान होने के आसार बढ़ गए हैं।ऐसे में मुद्दे ग़ायब हैं तो सभी दल जातीय समीकरण बनाने की रणनीति में लगे हैं।
बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की बंद कमरे में बैठक से सियासी तापमान बढ़ गया।मायावती ने ब्राह्मणों को किसी का 'बाटी चोखा न खाने' की सलाह दे दी तो अखिलेश यादव ने भी बीजेपी में ब्राह्मणों की अनदेखी की बात उठाई।इस बीच नये नवेले कुर्मी प्रदेश अध्यक्ष ने बैठक करने वाले विधायकों को नोटिस थमा दिया।अब नई मुश्किल कुर्मी बनाम लोध की है।मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को गाँव की समस्याओं पर विधायक बृजभूषण राजपूत ने घेरा तो विरोध ने जातीय रंग ले लिया।फिर लखनऊ में लोध महासभा के सम्मेलन में भी कुर्मी से मुक़ाबले और लोध जाति के नेताओं को ज़्यादा भागीदारी की माँग करते हुए शक्ति प्रदर्शन किया गया।आख़िर चुनाव से एक साल पहले मुद्दे गायब दिख रहे हैं और जातियां ताक़त दिखा रही हैं।क्या ये यूपी चुनाव का ट्रेंड सेट करेंगी?
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर मानते हैं कि यही समय है जब जातियां चुनाव से पहले अपने लिए बार्गेन कर सकती हैं।और ऐसा हमेशा से होता आया है।प्रदीप कपूर कहते हैं ' बीजेपी को कभी सवर्णों ख़ास तौर कर ब्राह्मण और बनियों की पार्टी कहा जाता था।लेकिन पार्टी ने हाल के वर्षों में जिस तरह अपनी राजनीति में बदलाव किया है उससे तय है कि अब हर जाति को अपने लिए बार्गेन करना पड़ेगा।चुनाव से पहले इसलिए ये जातियां अपनी ताकत दिखा रही हैं।' प्रदीप कपूर यह भी मानते हैं कि बीजेपी के लिए यह मजबूरी है।' जिस तरह बीजेपी ने यह देखा कि 'कमंडल' और 'लाभार्थी' दोनों साथ होने के बावजूद लोकसभा चुनाव में सीटें घट गईं और अखिलेश यादव ने जो PDA बनाया उसका लाभ सपा को मिला इसलिए भी अब यह ज़रूरी है कि बीजेपी जातियों को आपकी तरफ़ मोडे।'
वरिष्ठ पत्रकार हेमेन्द्र प्रताप सिंह तोमर कहते हैं आख़िर जातियाँ क्यों नहीं उठाएँगी? आज के समय में यही माना जाता है जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी।ख़ास तौर पर यूजीसी के जो नियम आए अब सवर्ण जातियां सोच रही हैं किसके साथ जाएँ? राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 'सेवा बस्तियों' में जो कार्यक्रम होने थे उनकी डेट आगे बढ़ा दी गई है।क्यों सब स्पॉन्सर्स चले गए।कुछ जातियों को लग रहा है कि वो कमजोर पड़े तो सियासी हिस्सेदारी कम होगी इसलिए यह अंतर्द्वंद्व और टकराव है।'
हालाँकि जातियों की बात पहले से होती रही है।मुलायम सिंह यादव हो या कांशीराम एक जाति के लोग उनके पीछे चले पर आज के समय में जातियों के जो नेता है वो अपना ही भला करते हैं, या अपने परिवार का भला करते हैं।वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर कहते हैं ' यह सही है कि आज जो जातियों ने नेता हैं वो अपना और अपने परिवार का ही भला करते हैं।पर कहीं ना कहीं वो जातियों में राजनीतिक हिस्सेदारी की बात जगाते हैं।कई बार ये प्रयोग सफल होते हैं।जैसे देखिए मायावती अपने 2007 के प्रयोग को दोहराने की कोशिश में ब्राह्मण+दलित कमसमीआक्रम बनाने में लगी हैं।' पर क्या बीजेपी में सनातन की पॉलिटिक्स से यह जातियों की पॉलिटिक्स नहीं टकराती है ? हेमेन्द्र प्रताप सिंह तोमर कहते हैं ‘ ऐसा ही है लेकिन जातियों को लेकर प्रयोग होता रहा है।2014 के बाद से यह बढ़ा है।’

