पश्चिमी यूपी में सपा की नई चाल, क्या मुस्लिम-गुर्जर फॉर्मूला बनेगा गेमचेंजर?
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पश्चिमी यूपी में सपा की नई चाल, क्या मुस्लिम-गुर्जर फॉर्मूला बनेगा गेमचेंजर?

पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी नया सामाजिक समीकरण साधने में जुटी है। मुस्लिम-गुर्जर रणनीति और दादरी रैली से 2027 की तैयारी के संकेत दिए।


क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) को सामाजिक समीकरण साधने का नया मंत्र मिल गया है? क्या वे मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बदले हालात को समझते हुए गैर-मुस्लिम जाट समीकरण को साधने की कोशिश कर रहे हैं? क्या उनका यह दांव आरएलडी-बीजेपी के मजबूत गठबंधन की काट साबित हो सकता है? क्या वे मुस्लिम-गुर्जर समीकरण के जरिए बीजेपी के किले को चुनौती देंगे? और क्या इन सभी सवालों के जवाब दादरी की समाजवादी ‘समानता भाईचारा रैली’ में छिपे हैं? क्या इस रैली के जरिए अखिलेश उन तबकों को साधने की कोशिश कर रहे हैं, जो 2013 के बाद उनकी पार्टी से दूर हो गए थे?

उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल 403 सीटों में से पश्चिमी उत्तर प्रदेश को लेकर अखिलेश यादव इन दिनों गहन रणनीति में जुटे हैं। उनका मानना है कि पूर्वांचल में उनकी पकड़ मजबूत है, जबकि मध्य उत्तर प्रदेश को वे संभाल सकते हैं, लेकिन पश्चिमी यूपी में समीकरण उनके पक्ष में पूरी तरह नहीं हैं। आरएलडी के जयंत चौधरी (Jayant Chaudhary) अब उनके साथ नहीं हैं, और जाट वोट बैंक पर आरएलडी का प्रभाव अब भी कायम माना जाता है।

ऐसे में समाजवादी पार्टी के पास मुस्लिम वोट बैंक तो मजबूत है, लेकिन उसे जीत में बदलने के लिए किसी अन्य प्रभावी जातीय समूह का साथ जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने मुस्लिम-गुर्जर समीकरण पर काम शुरू किया है। पश्चिमी यूपी के 18 जिलों की 70 से अधिक विधानसभा सीटों पर छोटे-छोटे कार्यक्रम, चौपाल और रैलियां आयोजित करने की योजना बनाई गई है, खासकर उन इलाकों में जहां मुस्लिम और गुर्जर मतदाताओं की संख्या निर्णायक है।

पश्चिमी यूपी की राजनीति में मुस्लिम, जाट और दलित तीन बड़े वोट बैंक माने जाते हैं। इसके अलावा गुर्जर, कश्यप, सैनी, ठाकुर, त्यागी और ब्राह्मण समुदाय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जाट वोट पर आरएलडी का प्रभाव, ठाकुर-त्यागी-ब्राह्मण वोट पर बीजेपी की पकड़, दलित वोट पर बसपा का प्रभाव और मुस्लिम वोट पर सपा की पकड़ मानी जाती है।

पश्चिमी यूपी में गुर्जर-जाट मुस्लिम आबादी
पश्चिमी यूपी में जाट समाज की आबादी करीब 3 से 4 फीसद

पश्चिमी यूपी में गुर्जर समाज की आबादी करीब 5 से 6 फीसद

मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बागपत, सहारनपुर, मुजफ्फरपुर नगर, शामली और बुलंदशहर जैसे जिलों में गुर्जर आबादी अधिक

बिजनौर में 43 और सहारनपुर में करीब 42 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है। मुजफ्फरनगर में 41.30% और सहारनपुर में 41.95% आबादी मुसलमानों की है।


2013 के मुजफ्फरनगर दंगे (Muzaffarnagar riots) के बाद हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण ने राजनीति की दिशा बदल दी। 2019 में चौधरी अजीत सिंह ने (Chaudhary Ajit Singh) इस खाई को पाटने की कोशिश की, जबकि 2022 में जयंत चौधरी ने सपा के साथ गठबंधन कर जाट-गुर्जर वोट को जोड़ने का प्रयास किया। इसके बावजूद 2022 विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में बीजेपी का पलड़ा भारी रहा।

हालांकि 2024 के आम चुनाव में पश्चिमी यूपी से सपा को बेहतर प्रदर्शन मिला, जिसने पार्टी को नई उम्मीद दी। दादरी की रैली में अखिलेश यादव ने गुर्जर समाज और किसानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने वादा किया कि सरकार बनने पर लखनऊ के गोमती रिवर फ्रंट पर मिहिर भोज की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। इसके जरिए उन्होंने गुर्जर समाज की पहचान और सम्मान के मुद्दे को छूने की कोशिश की।

यूपी की सियासत को समझने वाली वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरोन कहती हैं, “देखिए, पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी के कोर वोटर्स यानी यादव वोटर्स की संख्या कम है। ऐसे में अखिलेश यादव के सामने चुनौती है कि सामाजिक आधार को किसी भी तरह मजबूत किया जाए। आपने देखा होगा कि उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने (Mulayam Singh Yadav) ने ‘मजगर’ यानी मुस्लिम, जाट, गुर्जर और राजपूत का समीकरण बनाया था और उसका फायदा न सिर्फ उन्हें, बल्कि अखिलेश यादव को भी 2012 के चुनाव में मिला। लेकिन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद तस्वीर बदल गई। हिंदू मतदाता बड़े पैमाने पर बीजेपी की तरफ चले गए। यहां तक कि आरएलडी की गणित भी बिगड़ गई। अब जबकि अखिलेश यादव पिछले 10 साल से सत्ता से बाहर हैं, खासतौर पर पश्चिमी यूपी में उनका प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है, ऐसे में दादरी की समाजवादी ‘भाईचारा समानता रैली’ अहम हो जाती है।”

सुनीता एरोन आगे कहती हैं, “इसमें कोई दो राय नहीं है कि यूपी में कोई भी दल विकास की कितनी भी बड़ी बातें करे या उसे जमीन पर उतारने का दावा करे, सामाजिक समीकरण हमेशा अहम रहता है। दादरी में जिस तरह से गुर्जर, मुस्लिम, जाट, सैनी और कश्यप समाज के लोग उमड़े, उससे यह साफ है कि समाजवादी पार्टी का ‘पीडीए’ वाला नारा असर दिखा रहा है। लेकिन सियासत में जिस समाज की भी आप बात करते हैं, उसकी भागीदारी पार्टी, संगठन और सरकार में भी नजर आनी चाहिए।”

वे आगे कहती हैं, “दादरी की रैली में जिस तरह से अखिलेश यादव ने कहा कि गुर्जर समाज हो या अन्य पिछड़ा वर्ग, उन्हें सिर्फ वोटबैंक के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि संगठन और सियासी लड़ाई में उनकी भागीदारी भी जरूरी है। ऐसे में यह साफ है कि आने वाले समय में पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी को टिकट वितरण में विशेष ध्यान देना होगा। अगर संगठन या टिकट वितरण में गुर्जर समाज की अनदेखी हुई, तो यह प्रयास केवल बयान तक सीमित रह जाएगा।”

इस तरह अखिलेश यादव दो रणनीतियों पर काम कर रहे हैं—पहला, जाट वोट में संभावित नुकसान की भरपाई करना, और दूसरा, युवाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देना। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगातार बैठकों और कार्यक्रमों के जरिए सपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि चुनावी बढ़त की शुरुआत यहीं से होगी। यदि पार्टी को यहां बढ़त मिलती है, तो 2027 का चुनाव उसके लिए अधिक अनुकूल हो सकता है।

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