
सावन में होगा केदारेश्वर मंदिर का लोकार्पण-अखिलेश का सॉफ्ट हिंदुत्व या छवि बदलने की रणनीति?
सपा को पुरानी एंटी हिंदू छवि से बाहर निकालकर अखिलेश यादव हर वर्ग का समर्थन लेना चाहते हैं।पर मुलायम सिंह यादव के साथ जनेश्वर मिश्रा, मोहन सिंह जैसे सवर्ण नेताओं की जो टीम थी ऐसी कोई टीम अखिलेश यादव के पास नहीं है।
Akhilesh Yadav’s Soft Hindutva card ahead of 2027 elections : पाँच राज्यों के चुनाव के बाद यूपी विधानसभा चुनाव के लिए जब सियासी हलचल तेज़ होगी ठीक उस समय यूपी के इटावा में केदारेश्वर मंदिर का लोकार्पण होगा।उत्तराखंड के केदारनाथ धाम की तर्ज़ पर निर्मित मंदिर में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव पूजा अर्चना करेंगे।हालांकि ख़ुद अखिलेश इस मंदिर के निर्माण को ईश्वरीय प्रेरणा और आस्था के लिए लिया गया फ़ैसला बता चुके हैं, पर चुनाव से महज़ कुछ महीने पहले मंदिर के लोकार्पण के राजनीतिक प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता।तो क्या योगी के 'हार्ड हिंदुत्व’ के जवाब में यह अखिलेश का 'सॉफ्ट हिंदुत्व’ है? या इस बहाने 2027 से पहले अखिलेश हिंदू वोटरों को यह संदेश देना चाहते हैं कि बीजेपी की ओर से मुलायम सिंह यादव के समय से ही सपा पर लगाया गया 'एंटी हिंदू’ होने का आरोप निराधार है? यूपी के सियासी हलकों में अभी से यह चर्चा तैरने लगी है।
सावन शिवरात्रि में अखिलेश यादव कर सकते हैं केदारेश्वर मंदिर का लोकार्पण-
समाजवादी पार्टी का गढ़ समझे जाने वाले इटावा में बनने वाला केदारेश्वर महादेव मंदिर फिर चर्चा में आ गया है।वजह यह है कि सावन महीने की शिवरात्रि (11 अगस्त) को मंदिर का लोकार्पण तय होना बताया जा रहा है।इस दिन मंदिर में 'कुंभ अभिषेक’ किया जाएगा और अखिलेश यादव अपनी पत्नी सांसद डिंपल यादव के साथ मंदिर में पूजा अर्चना करेंगे।मंदिर का शिलान्यास अखिलेश यादव ने यूपी विधानसभा चुनाव से पहले मार्च 2021 में किया था।हालांकि उस समय भी इसे अखिलेश के सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति की कोशिश के तौर पर देखा गया था।पर सपा की राजनीति और छवि की वजह से यह बात बहुत ज़्यादा चर्चा में नहीं आई थी।लेकिन पाँच साल में सपा ने अब तक कई बदलाव देखे।आज अखिलेश यादव सिर्फ़ सपा के पुराने और परम्परागत फॉर्म्युले मुस्लिम+यादव (M+Y) के भरोसे नहीं हैं बल्कि ग़ैर यादव ओबीसी( Non Yadav OBC) और दलित जातियों को मिलाकर न सिर्फ़ नया चुनावी जातीय समीकरण 'पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक’ (PDA ) बना चुके हैं बल्कि लोकसभा चुनाव में इस जातीय फार्मूले का उनको लाभ भी मिल चुका है।ऐसे में अब अखिलेश के मंदिर निर्माण करवाने और पूजा अर्चना करके वोटरों को संदेश देने को अलग तरह से देखा जा रहा है।
पीडीए समीकरण के साथ हिंदुत्व के जोड़ की नई रणनीति-
अखिलेश यादव इस बात को बखूबी समझते हैं कि केदारेश्वर मंदिर से जुड़े उनके किसी भी कदम को धार्मिक ही नहीं राजनीतिक बहस का भी मुद्दा बनाया जाएगा।अखिलेश यादव ने हाल ही में रामनवमी पर केदारेश्वर मंदिर में रामलला की मूर्ति स्थापित कर फोटो जारी की तो इस चर्चा ने तेज़ी पकड़ ली कि अखिलेश पीडीए के समीकरण को किसी क़ीमत पर टूटने नहीं देना चाहते और यही वजह है कि यूपी विधानसभा चुनाव से पहले वो मंदिर के ज़रिए भी हिंदू वोटरों को संदेश देना चाहते हैं।यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव पर तंज़ करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि 'भाजपा के भय से पहले मंदिर बनवाना और अब प्रभु श्रीरामलला की मूर्ति लगवाने की चर्चा करना, यह समाजवादी पार्टी की अवसरवादी राजनीति का चेहरा है।’’
वहीं सपा भी इस मुद्दे पर पलटवार कर रही है।अखिलेश यादव के समर्थन में उनकी पार्टी के प्रवक्ताओं ने मोर्चा संभाला।सपा प्रवक्ता फ़ख़रूल हसन चाँद कहते हैं ''सपा ने कभी मंदिर मस्जिद की पॉलिटिक्स नहीं की।जबकि बीजेपी ने सिर्फ मंदिर मस्जिद की राजनीति ही की है और बीजेपी के हर छोटे-बड़े नेता ने बाकायदा मंदिर के नाम पर वोट मांगे हैं।राष्ट्रीय अध्यक्ष जी (अखिलेश यादव) पहले ही कह चुके हैं कि यह आस्था की बात है और बाबासाहेब के संविधान के अनुसार सबको अपनी आस्था और धर्म का पालन करने का अधिकार है? अखिलेश यादव जी सनातन धर्म को मानते हैं और वो मंदिर बना रहे हैं इसमें किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए? किसी से मंदिर के नाम पर वोट तो नहीं माँग रहे।’’
'सॉफ्ट हिंदुत्व’ या काउंटर पॉलिटिक्स ?
ज़ाहिर है केदारेश्वर मंदिर के बहाने सियासी गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह यूपी में योगी की 'प्रखर हिंदुत्व’ की छवि और पॉलिटिक्स के जवाब में यह अखिलेश यादव का 'सॉफ्ट हिंदुत्व’ है? या बीजेपी की उस रणनीति का काउंटर पॉलिटिक्स है जिसके तहत बीजेपी सपा को मुस्लिम परस्त और हिंदू भावनाओं का विरोधी बताती रही है।ज़ाहिर है इटावा में 50 बीघे में बना यह मंदिर चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल भी पैदा करेगा।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अखिलेश यादव की आस्था की बात अपनी जगह है पर इससे वो एक मैसेज देने की कोशिश तो कर ही रहे हैं।पिछले कुछ समय से बीजेपी जिस तरह हर मौके पर समाजवादी पार्टी को हिंदू भावनाओं का विरोधी बताती रही है उस नैरेटिव के साथ सपा के लिए इस समय राजनीति करना मुश्किल है।दरअसल सपा की मुस्लिम वोटरों पर निर्भरता की वजह से कई बार ऐसे मौके आए जब पार्टी की यह छवि बनी।लेकिन 9 साल से सत्ता से दूर अखिलेश यादव के लिए अब इस नैरेटिव को तोड़ना ज़रूरी हो गया है।
सवर्ण नेताओं की कमी, प्रतीकों के माध्यम से संदेश-
दरअसल बीजेपी मुलायम सरकार में राम मंदिर आंदोलन के कारसेवकों पर गोली चलाने के फैसले से लेकर अखिलेश यादव की सरकार में मदरसों को मदद, आतंकी गतिविधियों में शामिल युवाओं के मुकदमे वापसी तक को मुद्दा बनाती रही है।ऐसे में अखिलेश यादव के लिए सपा की उस छवि की तोड़ना ज़रूरी है।ऐसे में अखिलेश सपा और की उस छवि की तोड़ना चाहते हैं।राजनीतिक विश्लेषक डॉ महेंद्र कुमार सिंह कहते हैं ''अखिलेश पीडीए की बात कर रहे हैं लेकिन जानते हैं कि बहुत ज़्यादा अगर इसी पर ज़ोर देंगे तो सवर्ण हिंदू दूर हो जाएगा।इसीलिए विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर माता प्रसाद पांडे जैसे ब्राह्मण नेता को ज़िम्मेदारी दी।क्योंकि ये जातियां भले ही संख्या की दृष्टि से कम हों लेकिन सवर्ण जातियों की भूमिका एजेंडा सेट करने और नैरेटिव गढ़ने की दृष्टि से प्रभावी होती है।इसलिए उनको नजरंदाज़ करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए संभव नहीं… और जैसे मुलायम सिंह के पास जनेश्वर मिश्रा और मोहन सिंह जैसे नेता थे अखिलेश यादव के पास ऐसे कोई नेता नहीं हैं।इसलिए इस तरह के प्रतीकों का सहारा लेना पड़ेगा।’’
यूपी में हिंदुत्व के मुद्दों पर योगी मुखर-
इधर बीजेपी लोकसभा चुनाव में पीडीए फॉर्म्युले से शिकस्त खाने के बाद यूपी में हिंदुत्व को लेकर काफ़ी अग्रेसिव है।अब योगी आदित्यनाथ भी पहले कार्यकाल से कहीं ज़्यादा हिंदुत्व को लेकर मुखर नज़र आ रहे हैं।ऐसे में अखिलेश यादव जातियों के समीकरण के साथ हिंदुत्व को भी मिलाना चाहते हैं।इसकी एक वजह लोकसभा चुनाव में सपा को मिली कामयाबी है।सपा को जहाँ कई ओबीसी और दलित जातियों का समर्थन और वोट मिला वहीं अयोध्या में सपा ने सांसद बनाकर बीजेपी को शिकस्त दे दी।अब आगे विधानसभा चुनाव में पीडीए को लेकर उम्मीद बरक़रार है।साथ ही इस समय योगी सरकार से ब्राह्मण वर्ग की नाराज़गी जैसे मुद्दे भी चर्चा में हैं जिनका लाभ मायावती से लेकर अखिलेश तक लेना चाहते हैं।राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अगर सपा को सभी जातियों का समर्थन हासिल करना है तो सपा को अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलना होगा।सपा की एंटी हिंदू छवि इसमें बाधा बन सकती है।इसलिए ख़ास तौर पर अखिलेश के राम मंदिर नहीं जाने पर बीजेपी के आरोप का जवाब मंदिर बनवाकर दिया जा सकता है।
शंकराचार्य मुद्दे पर मुखर, गुझिया और सेंवई पार्टी… राजनीति में प्रतीकों का है महत्व -
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर बताते हैं कि अखिलेश यादव यह संदेश देना चाहते हैं कि वो सबको साथ लेकर चल रहे हैं।प्रदीप कपूर कहते हैं, ''पूजा करना, मंदिर बनवाना अपनी धार्मिक आस्था की बात हो सकती है लेकिन राजनीति में प्रतीकों का भी बहुत महत्व है।अखिलेश यादव लगातार बीजेपी के बनाये उस नैरेटिव को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं जो क़रीब तीन दशकों से सपा के बारे में बनी हुई है।आप देखिए हाल ही में नवरात्र में डिम्पल यादव के कन्या पूजन की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर खूब दिखीं।होली पर अखिलेश ने 'गुझिया और सेंवई’ पार्टी एक साथ की जिससे लोगों में संदेश दिया जा सके।उससे पहले शंकराचार्य के मुद्दे पर मुखर रहे और बार-बार बयान दिए।’’
कैसा होगा केदारेश्वर महादेव मंदिर?
केदारेश्वर मंदिर इटावा में यमुना नदी के किनारे बन रहा है।केदारनाथ धाम की तर्ज़ पर इसका निर्माण कराया जा रहा है।इसी वजह से यह चर्चा के साथ विवाद में भी रहा है।इसको दक्षिण भारत की पारंपरिक मंदिर निर्माण शैली में बनाया जा रहा है इसमें लोहे या स्टील का प्रयोग नहीं किया गया है बल्कि पत्थरों को जोड़ कर बनाया गया है।दक्षिण भारत के प्रसिद्ध कृष्ण शिला पत्थरों से इसका निर्माण किया गया है और तमिलनाडु के कारीगरों ने इसके लिए पत्थर तराशा है।केदारनाथ धाम को सम्मान देने के लिए इसकी ऊँचाई केदारनाथ मंदिर से एक इंच कम रखी गई है।इसका मुख्य मंदिर केदारनाथ धाम की तर्ज़ पर बना है जबकि बाक़ी परिसर तंज़ौर के वृहदेश्वर मंदिर की तरह है।महादेव के इस मंदिर में भगवान रामलला के बाल स्वरूप की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

