यहां मुफ्त मिलता है दूध-दही, 400 साल से नहीं टूटी गांव की परंपरा
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यहां मुफ्त मिलता है दूध-दही, 400 साल से नहीं टूटी गांव की परंपरा

आंध्र प्रदेश के गंजीहल्ली गांव में पिछले 400 साल से दूध बेचना पाप माना जाता है। रोज करीब 1000 लीटर दूध उत्पादन के बावजूद ग्रामीण इसे मुफ्त बांटते हैं और परंपरा निभाते हैं।


एक ऐसा गांव है जहां सदियों से दूध बेचना पाप माना जाता है। लगभग 1,200 घरों और करीब 4,000 लोगों की आबादी वाले गंजिहल्ली गांव में आज भी दूध या दूध से बने किसी भी उत्पाद को बेचने की परंपरा नहीं है। यहां के लोग दूध का इस्तेमाल केवल घर की जरूरतों और आपसी साझेदारी के लिए करते हैं।

गांव के ज्यादातर लोग किसान हैं और मूंगफली, धान तथा हरी मिर्च की खेती करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार गांव में करीब 510 दुधारू पशु हैं, जो रोज लगभग 1,000 लीटर दूध देते हैं। इसके बावजूद गांव में दूध की एक बूंद भी बेची नहीं जाती।

58 वर्षीय ग्रामीण शेख महबूब बाशा कहते हैं, हम अपनी गाय-भैंसों का दूध सिर्फ घर के इस्तेमाल के लिए रखते हैं। अगर दूध बच जाता है तो उसे गांव के लोगों को मुफ्त में दे दिया जाता है। गांव के ही 50 वर्षीय चावल व्यापारी महेश्वर रेड्डी बताते हैं, “अगर किसी को दूध, मट्ठा या दही चाहिए तो हम मुफ्त में दे देते हैं। हमारे गांव में दूध बेचना पाप माना जाता है।”

जरूरतमंदों को मुफ्त में मिलता है दूध

गांव के बुजुर्ग पैइंटी श्रीनिवासुलु बताते हैं कि दूध खास तौर पर बच्चों और जरूरतमंदों को दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी महिला ने बच्चे को जन्म दिया हो तो आसपास के घरों से उसे दूध भेजना परंपरा है। गृहिणी सुलोचना देवी बताती हैं, अगर गांव में किसी महिला के यहां बच्चा पैदा होता है, तो पड़ोसी घरों से दूध भेजना एक परंपरा है।

400 साल पुरानी आस्था से जुड़ी है परंपरा

स्थानीय मान्यता के अनुसार यह परंपरा लगभग 400 साल पहले शुरू हुई थी। कहा जाता है कि उस समय एक सूफी संत या ‘पीर’ राजयोगी मुर्मू बड़े साहेब टाटा गांव में आए थे।बताया जाता है कि बड़े साहेब मूल रूप से आंध्र प्रदेश के अल्लागड्डा तालुक के पोडाला कंडुकुरु गांव के रहने वाले थे। वे इस्लाम के अनुयायी थे, लेकिन उन्हें कई बार एक हिंदू देवता के दर्शन हुए, जिन्होंने उन्हें गंजिहल्ली आने का निर्देश दिया।

पहले उन्हें कोंडा माधव स्वामी नामक देवता के दर्शन हुए, जिन्होंने उन्हें तेरनाकल गांव के मंदिर में आने को कहा। इसे दैवी आदेश मानकर बड़े साहेब वहां पहुंचे और मंदिर में रहकर भक्ति और सेवा करने लगे।

बाद में उन्हें फिर एक दर्शन हुआ, जिसमें उन्हें गंजिहल्ली जाने का निर्देश मिला। इसके बाद वे गंजिहल्ली पहुंचे, जहां स्थानीय पटवारी नागिरेड्डी ने उनका स्वागत किया।

मवेशियों की बीमारी से जुड़ा चमत्कार

स्थानीय लोगों के अनुसार करीब 400 साल पहले गांव में मवेशियों में एक संक्रामक बीमारी फैल गई थी। कई गाय-भैंसें मरने लगीं।एक दिन बड़े साहेब ने अपने बेटे हुसैन साहेब को दूध लाने के लिए भेजा, लेकिन गांव में लगभग सभी पशु बीमार थे, इसलिए किसी के पास दूध नहीं था। आखिरकार वह गांव के बुजुर्ग पेड्डा नागिरेड्डी के घर गया, जहां उसे बताया गया कि उनकी गाय भी बीमारी से मर चुकी है और उसका शव गांव के किनारे स्थित मारेम्मा मंदिर के पास पड़ा है।

हुसैन साहेब वहां पहुंचे और देवी से प्रार्थना की। लोककथा के अनुसार देवी ने कहा, “अपने पिता का नाम लेकर गाय को पुकारो।”कहा जाता है कि हुसैन साहेब ने पुकारा, “बाबा बोले, दूध देव।” और चमत्कारिक रूप से मृत गाय खड़ी हो गई और दूध देने लगी।

गांव के लिए बनाए गए तीन नियम

इस घटना के बाद गांव वालों ने बड़े साहेब से मदद मांगी। तब उन्होंने गांव के लिए तीन नियम तय किए। गांव में कोई भी दूध नहीं बेचेगा, किसी मवेशी को नहीं काटा जाएगा। पशुओं के चारे को नहीं जलाया जाएगा। ग्रामीणों ने इन नियमों का पालन करने का वादा किया, जिसे आज तक निभाया जा रहा है।

सभी धर्मों के लोग निभाते हैं परंपरा

आज गंजिहल्ली में करीब 60 मुस्लिम परिवार भी रहते हैं, लेकिन दूध न बेचने की परंपरा को सभी धर्मों के लोग समान रूप से मानते हैं।गृहिणी पनगाला चोडम्मा कहती हैं, “हम मानते हैं कि अगर कोई दूध बेचता या खरीदता है तो गांव के रक्षक महात्मा बड़े साहेब का श्राप लगेगा।”

गांव के सरपंच थोलु रामुडु बताते हैं कि बुजुर्गों से सुना है कि जिन्होंने कभी इस नियम को तोड़ने की कोशिश की, उन्हें दुर्भाग्य का सामना करना पड़ा।

आज भी पूजे जाते हैं बड़े साहेब

कहा जाता है कि बड़े साहेब ने 1679 में ‘जीव समाधि’ ली थी। गांव में उनकी याद में एक दरगाह भी बनाई गई है, जहां सभी धर्मों के लोग श्रद्धा से आते हैं।उनके परिवार की आठवीं पीढ़ी के वंशज सैयद चिन्ना मुदगोल बताते हैं कि गांव में पशुओं के लिए करीब 50 एकड़ जमीन पर चारा उगाया जाता है।

पड़ोसी गांव में भी यही परंपरा

दिलचस्प बात यह है कि पास के कडिमेटला गांव में भी दूध बेचने पर रोक है। वहां लोग पहले दूध को देवता चेनकेशव स्वामी को चढ़ाते हैं और फिर घर में इस्तेमाल करते हैं।बीमार लोगों और बच्चों को दूध मुफ्त में दिया जाता है। यहां तक कि स्थानीय होटल वाले भी गांव से दूध नहीं खरीदते, बल्कि बाहर के कस्बों से मंगाते हैं।

सामाजिक सौहार्द की मिसाल

इतिहासकारों के अनुसार गंजिहल्ली की कहानी भारत में धार्मिक सह-अस्तित्व और सामाजिक सद्भाव की गहरी परंपरा को दर्शाती है। हैदराबाद की सुरवरम प्रताप रेड्डी तेलुगु यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के सहायक प्रोफेसर एम.ए. श्रीनिवासन कहते हैं कि सूफी संतों और संत कबीर जैसे व्यक्तित्वों ने हमेशा धर्मों के बीच संवाद और एकता का संदेश दिया।

वे कहते हैं कि गंजिहल्ली जैसी परंपराएं भले ही लोककथाओं से जुड़ी हों, लेकिन समय के साथ वे समुदाय की पहचान और संस्कृति का मजबूत हिस्सा बन जाती हैं। सदियों से गंजिहल्ली के लोग बड़े साहेब द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चल रहे हैं। आज जब दुनिया में ज्यादातर फैसले मुनाफे के आधार पर होते हैं, तब यह गांव एक अलग संदेश देता है “पैसा कमाने से बड़ा है लोगों का भरोसा और सद्भाव कमाना।”

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