अरुणाचल प्रदेश के निर्जुली पर कंक्रीट का कब्जा, 20 साल में 17% जंगल खत्म
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अरुणाचल प्रदेश के निर्जुली पर कंक्रीट का कब्जा, 20 साल में 17% जंगल खत्म

अरुणाचल प्रदेश के निर्जुली में 20 साल में 17% वन क्षेत्र खत्म हुए हैं। दुर्लभ व स्थानिक पौध प्रजातियों पर शहरीकरण से खतरा संकट बढ़ गया है।


भारत के लिए चिंताजनक खबर के रूप में, निर्जुली जो अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर के निकट स्थित एक छोटा कस्बा है तेजी से फैलते शहरी विस्तार के कारण बीते 20 वर्षों में अपने लगभग 17 प्रतिशत वन क्षेत्र को खो चुका है। वनस्पति के इस गंभीर क्षरण ने उस कम-ज्ञात निजी वन क्षेत्र में पाई जाने वाली दुर्लभ और स्थानिक (एंडेमिक) पौध प्रजातियों के अस्तित्व को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं।

Discover Forests पत्रिका में प्रकाशित एक नए सहकर्मी-समीक्षित अध्ययन के अनुसार, 2004 में 17.46 वर्ग किमी का वन क्षेत्र घटकर 2024 में 14.52 वर्ग किमी रह गया।

चौंकाने वाली गिरावट

अध्ययन के लेखकों ने बताया, “2004 में 17.46 वर्ग किमी का वन क्षेत्र 2024 में घटकर 14.52 वर्ग किमी रह गया, जो इस अवधि में 2.94 वर्ग किमी (16.83%) की कमी दर्शाता है।” आंकड़े स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। पूरे दो दशकों में शोधकर्ताओं ने पाया कि कुल 3.13 वर्ग किमी (15.9%) वन क्षेत्र नष्ट हुआ, जबकि केवल 0.22 वर्ग किमी, यानी महज 1.2 प्रतिशत क्षेत्र में ही वनीकरण हुआ।

वनों की यह हानि कंक्रीट के बढ़ते प्रभुत्व को भी दर्शाती है। 2004 में 2.12 वर्ग किमी रहा निर्मित क्षेत्र 2024 में बढ़कर 5.06 वर्ग किमी हो गयाअर्थात 20 वर्षों में यह दोगुने से अधिक हो गया।

उपग्रह चित्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि केवल 2014 से 2024 के बीच ही 2.29 वर्ग किमी वन क्षेत्र निर्मित भूमि में बदल गया, जो पिछले दशक की तुलना में लगभग दोगुनी दर है। उपग्रह वर्गीकरण की सटीकता 95 प्रतिशत से अधिक रही, जिससे निष्कर्षों की विश्वसनीयता बढ़ती है।

संरक्षण से बाहर जैव विविधता का हॉटस्पॉट

इस क्षति को और गंभीर बनाता है निर्जुली का 19.58 वर्ग किमी का वह पारिस्थितिक रूप से समृद्ध परिदृश्य, जो अरुणाचल के पापुम पारे जिले में स्थित है। प्रभावित वन क्षेत्र में पाई जाने वाली कुछ दुर्लभ और देशज प्रजातियां हैं, वैटिका लांसिफ़ोलिया (Vatica lanceifolia), एरिस्टोलोचिया असामिका (Aristolochia assamica) (यहीं से खोजी गई), स्ट्रोबिलैन्थेस ऑक्सीकैलिसिना (Strobilanthes oxycalycina), बेगोनिया ग्रिफ़िथियाना (Begonia griffithiana), बोइका अरुणाचलेंसिस (Boeica arunachalensis) (यहीं से खोजी गई), स्यूडेरानथेमम अरुणाचलेंसिस (Pseuderanthemum arunachalensis) (यहीं से खोजी गई)

2016 से 2023 के बीच किए गए फील्ड सर्वेक्षणों में इस संकटग्रस्त वन क्षेत्र में 156 देशज पौध प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया। इनमें 11 प्रजातियाँ उत्तर-पूर्व भारत के लिए स्थानिक हैं, छह प्रजातियों का प्रथम वर्णन इसी क्षेत्र से हुआ है और तीन प्रजातियाँ ऐसी हैं जो पृथ्वी पर कहीं और नहीं पाई जातीं।

अध्ययन में उल्लेख किया गया कि “इस स्तर की प्रजातीय समृद्धि समान आकार के संरक्षित क्षेत्रों के बराबर या उनसे अधिक है, जो इस धारणा को चुनौती देती है कि असंरक्षित भूमि पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वहीन होती है।”

क्या गलत हुआ?

20 वर्षों में निर्मित क्षेत्र दोगुने से अधिक

2004 से 2024 के बीच वन क्षेत्र में लगभग 17% कमी

2014 के बाद के दशक में वनों की कटाई तेज

दुर्लभ स्थानिक प्रजातियाँ अध्ययन से पहले ही लुप्त हो रहीं

संरक्षित क्षेत्रों से बाहर निजी वनों को कानूनी सुरक्षा का अभाव

शहरीकरण से समुदायों का पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान क्षीण

निर्जुली पूर्वी हिमालय के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में स्थित है, जिसे वैश्विक स्तर पर इंडो-बर्मा और हिमालयी जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा माना जाता है। अरुणाचल प्रदेश स्वयं भारत की लगभग आधी पुष्पीय पौध प्रजातियों का घर है।हालाँकि राज्य में कुल लगभग 80 प्रतिशत वन आवरण है, परंतु इसका छोटा हिस्सा ही राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों, टाइगर रिज़र्व या बायोस्फीयर रिज़र्व के अंतर्गत आता है। शेष वन, जिनमें निर्जुली का वन भी शामिल है, सामुदायिक या निजी स्वामित्व में हैं। शोधकर्ता इसे “संरक्षण का अंधा क्षेत्र” (कंज़र्वेशन ब्लाइंड स्पॉट) बताते हैं।

लुप्त होती प्रजातियां

अध्ययन की सबसे चिंताजनक खोज यह है कि कुछ पूर्व में दर्ज प्रजातियाँ अब सर्वेक्षणों में नहीं मिल रहीं। इनमें Piper pedicellatum भी शामिल है, जिसे International Union for Conservation of Nature (IUCN) ने ‘संकटग्रस्त’ (Vulnerable) श्रेणी में रखा है। लेखकों ने चेतावनी दी कि “हाल के भू-आवरण परिवर्तनों ने इन स्थानिक और संकटग्रस्त प्रजातियों की स्थानीय गिरावट या संभावित विलुप्ति में सीधा योगदान दिया हो सकता है, जो आवास क्षरण और जैव विविधता हानि के बीच स्पष्ट संबंध दर्शाता है।”

इनमें से कई प्रजातियां अत्यंत विशिष्ट सूक्ष्म-आवासों—जैसे मौसमी जलधाराओं के पास छायादार क्षेत्र और नम दोमट मिट्टी—में पाई जाती हैं, जो कटाई और विखंडन के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी चेताया कि उपग्रह चित्रों में “अपरिवर्तित वन” के रूप में दिखने वाले क्षेत्र भी पारिस्थितिक रूप से सुरक्षित नहीं हो सकते। कई स्थानों पर चयनात्मक कटाई के बाद सदाबहार वनों को बांस-प्रधान द्वितीयक वन में बदल दिया गया है, जिससे जैव विविधता की जटिलता घटती है।

तुरंत हस्तक्षेप की आवश्यकता

अध्ययन के सह-लेखक दिपंकर बोरा ने कहा कि तेजी से शहरीकरण वाले वन क्षेत्रों में प्रजातियों की सुरक्षा के लिए प्राकृतिक आवासों से बाहर संरक्षण (एक्स-सीटू संरक्षण) ही व्यावहारिक उपाय है।उन्होंने समर्पित वनस्पति उद्यान, फील्ड जीन बैंक और शैक्षिक संरक्षण पार्क स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। अध्ययन के अनुसार, अर्ध-शहरी परिदृश्यों में, जहाँ वनों की कटाई एक महत्वपूर्ण सीमा पार कर चुकी है, एक्स-सीटू संरक्षण “वैज्ञानिक रूप से उचित और सामाजिक-प्रशासनिक रूप से संभव” है।

शहरी विकास और सांस्कृतिक बदलाव

156 दर्ज प्रजातियों में से 56 का पारंपरिक खाद्य, औषधीय या सांस्कृतिक महत्व है। लेकिन बढ़ता प्रवासन और शहरी जीवनशैली पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को कमजोर कर रही है।

पुरानी जनजातीय बस्तियों के विपरीत, जहाँ समुदायों का वन परिदृश्य से गहरा पीढ़ीगत संबंध रहा है, निर्जुली की बढ़ती आबादी वेतनभोगी रोजगार और व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न है। जंगली खाद्य पदार्थ अब परिवारों द्वारा सीधे संग्रहित करने के बजाय विशेष संग्राहकों द्वारा एकत्र कर बाजारों में बेचे जाते हैं। इससे अनौपचारिक संरक्षण प्रथाएँ कमजोर हो रही हैं।

खोज और विनाश का विरोधाभास

अरुणाचल प्रदेश भारत में प्रतिवर्ष नई पौध प्रजातियों की खोज में अग्रणी है, जहां औसतन हर वर्ष लगभग पांच नई प्रजातियों का वर्णन किया जाता है। निर्जुली में ही छह प्रजातियाँ इसी वन क्षेत्र से औपचारिक रूप से वर्णित की गई हैं। फिर भी, सीमित वित्तपोषण, प्रशिक्षित वनस्पतिशास्त्रियों की कमी और लॉजिस्टिक चुनौतियों के कारण कई नई खोजी गई प्रजातियों का संरक्षण मूल्यांकन नहीं हो पाया है। यह एक विडंबना है कि प्रजातियां खोजी जा रही हैं, जबकि उनके आवास नष्ट हो रहे हैं।

हिमालय की तलहटी से चेतावनी

2.94 वर्ग किमी की क्षति अरुणाचल के विशाल वन क्षेत्र की तुलना में छोटी लग सकती है, लेकिन 19.58 वर्ग किमी के परिदृश्य में यह दो दशकों में लगभग एक-छठा आवास समाप्त होने के बराबर है। सीमित क्षेत्र में पाई जाने वाली सूक्ष्म-स्थानिक प्रजातियों के लिए यह विनाश का संकेत हो सकता है।

निर्जुली का सिकुड़ता वन केवल स्थानीय भूमि-उपयोग का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत की तेजी से शहरी होती हिमालयी तलहटी में जैव विविधता संरक्षण के लिए एक चेतावनी संकेत है, जहाँ पारिस्थितिक समृद्धि और तीव्र विकास आमने-सामने खड़े हैं।

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