असम चुनाव: बोरा के इस्तीफे और उसके बाद हुए सियासी ड्रामे की असली वजह क्या थी?
x

असम चुनाव: बोरा के इस्तीफे और उसके बाद हुए सियासी ड्रामे की असली वजह क्या थी?

असम में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी अंदरूनी संकट से जूझती नजर आई। वरिष्ठ नेता भूपेन कुमार बोरा के अचानक इस्तीफे ने पार्टी के हलचल मचा दी। सवाल ये है कि बोरा ने इस्तीफा क्यों दिया और फिर बाद में इसे वापस क्यों लिया?


प्रियंका गांधी के चुनावी राज्य असम दौरे से सिर्फ दो दिन पहले असम कांग्रेस में अंदरूनी संकट खड़ा हो गया है। वरिष्ठ नेता भूपेन कुमार बोरा के सोमवार (16 फरवरी) को दिए गए इस्तीफे ने पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी और असंतोष को उजागर कर दिया। दिन की शुरुआत शांत तरीके से हुई, लेकिन जल्द ही हालात नाटकीय हो गए। सुबह करीब 8 बजे बोरा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को ईमेल भेजकर अपनी जिम्मेदारियों से इस्तीफा दे दिया और उसकी कॉपी राहुल गांधी को भी भेजी। पार्टी के कई नेताओं के लिए यह खबर अचानक और चौंकाने वाली थी।

बोरा असम की राजनीति में कोई छोटे नेता नहीं हैं। वे बिहपुरिया से दो बार विधायक रह चुके हैं और 1994 से कांग्रेस से जुड़े हुए हैं। उन्होंने 24 जुलाई 2021 से 29 मई 2025 तक असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (APCC) के अध्यक्ष के रूप में काम किया। बाद में उनकी जगह गौरव गोगोई को अध्यक्ष बनाया गया। अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद भी बोरा आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की चुनाव अभियान समिति के चेयरमैन बने रहे।

इस्तीफे से हंगामा

जैसे ही इस्तीफे की खबर फैली, पार्टी ने तुरंत स्थिति संभालने की कोशिश शुरू कर दी। एआईसीसी के महासचिव और असम प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह, गौरव गोगोई और अन्य वरिष्ठ नेता गुवाहाटी में बोरा के घर पहुंच गए। गुवाहाटी और दिल्ली के बीच लगातार फोन कॉल होने लगे। राहुल गांधी ने भी सीधे बोरा से बात की, जिससे साफ हो गया कि मामला गंभीर है। दोपहर तक भंवर जितेंद्र सिंह ने मीडिया से कहा कि हाईकमान ने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है और बातचीत के बाद बोरा इसे वापस लेने के लिए तैयार हो गए हैं। आधिकारिक तौर पर संकट खत्म बताया गया। लेकिन राजनीतिक रूप से यह संदेश जा चुका था कि असम कांग्रेस के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि बोरा ने खुद पत्रकारों से कहा कि वे 'एक-दो दिन' में फैसला करेंगे। उन्होंने कहा, 'मैंने क्यों इस्तीफा दिया, इस पर अभी बोलना जरूरी नहीं समझता। मैंने इस्तीफा दे दिया है और हाईकमान को भेज दिया है। जब मुझे जरूरी लगेगा, तब मैं विस्तार से बात करूंगा।'

उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्होंने अपने पत्र में इस्तीफे की वजहें विस्तार से लिखी हैं। उन्होंने कहा, 'मैं कुछ भी छुपाता नहीं हूं और कोई भी कदम गुप्त तरीके से नहीं उठाता।' इसे सिद्धांत का मामला बताते हुए बोरा ने कहा, 'यह कोई व्यक्तिगत फैसला नहीं है। यह पार्टी के भविष्य की चिंता के कारण लिया गया कदम है। मैंने किसी खास व्यक्ति या निजी कारण से इस्तीफा नहीं दिया। मैं 32 साल से कांग्रेस की सेवा कर रहा हूं और पार्टी के भविष्य को लेकर चिंतित हूं।'

पार्टी में तनाव की ओर इशारा

साथ ही यह भी माना जा रहा है कि वे खुद को नजरअंदाज महसूस कर रहे थे। खबरों के अनुसार उन्होंने 'आत्मसम्मान' और राज्य इकाई में अहम फैसलों में अनदेखी किए जाने का मुद्दा उठाया था। एक खुली बातचीत में बोरा ने बताया कि अलग-अलग पार्टियों के नेताओं ने उनसे संपर्क किया है। उन्होंने कहा, 'अखिल गोगोई ने कहा है कि उनके दरवाजे मेरे लिए खुले हैं। लुरिन ज्योति गोगोई ने भी मुझे फोन किया। मुख्यमंत्री ने मुझे फोन नहीं किया। CPI(M) ने भी संपर्क किया। कांग्रेस हाईकमान ने भी बात की। लेकिन यह कोई बड़ी बात नहीं है।'

कई पार्टी सूत्र मौजूदा तनाव की जड़ बेहाली उपचुनाव को मानते हैं। उस समय बोरा के नेतृत्व में APCC ने 16 दलों के यूनाइटेड ऑपोजिशन फोरम द्वारा समर्थित CPI-ML उम्मीदवार को समर्थन देने का फैसला किया था। बाद में गौरव गोगोई के हस्तक्षेप के बाद हाईकमान ने कांग्रेस उम्मीदवार उतार दिया। बताया जाता है कि इस फैसले से नेतृत्व के कुछ हिस्सों में अविश्वास पैदा हो गया।

13 फरवरी को ‘समय परिवर्तनर’ यात्रा के माजुली चरण के दौरान नए तनाव सामने आए। बोरा ने इशारों में कहा कि प्रतिनिधिमंडल में किन लोगों को शामिल किया गया, इससे वे संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा, 'यह सब बेहाली से शुरू हुआ। मैंने पीसीसी अध्यक्ष से कहा है कि अगर कांग्रेस पार्टी माजुली यात्रा में अपने साथ किन लोगों को रखना है, यह भी तय नहीं कर सकती, तो हमें पार्टी के भविष्य पर विचार करना चाहिए।'

धुबरी के सांसद रकीबुल हुसैन, गौरव गोगोई के साथ माजुली गए थे। हालांकि बोरा ने उनका नाम नहीं लिया, लेकिन राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि उनकी मौजूदगी ही विवाद की एक वजह हो सकती है।

इस मुद्दे ने बड़ी बहस छेड़ दी है। बोरा अक्सर भारत की धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की बात करते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि एक कांग्रेस नेता माजुली के सत्र में किसी मुस्लिम सहयोगी के जाने पर आपत्ति कैसे कर सकता है? इस विरोधाभास ने पार्टी के अंदर और बाहर चर्चा को और तेज कर दिया है।

कांग्रेस के सामने बढ़ती चुनौतियां

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी इस मौके का फायदा उठाया। उन्होंने बोरा को कांग्रेस का 'आखिरी हिंदू नेता' बताया, जिनका कोई राजनीतिक पारिवारिक बैकग्राउंड नहीं है, और कहा कि भाजपा उनका स्वागत करेगी। माना जा रहा है कि 2026 के चुनाव से पहले कांग्रेस में दरार बढ़ाने की कोशिश के तौर पर यह बयान दिया गया। 'यह सब बेहाली से शुरू हुआ। मैंने पीसीसी अध्यक्ष से कहा है कि अगर कांग्रेस पार्टी माजुली यात्रा में अपने साथ किन लोगों को रखना है, यह भी तय नहीं कर सकती, तो हमें पार्टी के भविष्य पर विचार करना चाहिए।'

हालांकि बोरा ने साफ किया कि किसी भी पार्टी ने उन्हें कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं दिया है और वे राजनीति छोड़ नहीं रहे हैं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा। कई घंटों तक जनता के बीच यह चर्चा चलती रही कि कांग्रेस पार्टी अंदर से बंटी हुई है। मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। उसी दिन गोलपाड़ा वेस्ट के विधायक अब्दुर राशिद मंडल और निलंबित विधायक शेरमन अली ने गुवाहाटी में एक कार्यक्रम के दौरान अखिल गोगोई के नेतृत्व वाली राइजोर दल पार्टी जॉइन कर ली। पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस के कई विधायक भाजपा में शामिल हो चुके हैं, जिससे पार्टी के कमजोर होने की चिंता और बढ़ गई है।

राजनीतिक विश्लेषक थॉमस एलेक्स ने कहा कि कांग्रेस के लिए दोबारा सत्ता में आना बहुत मुश्किल होगा। उन्होंने कहा, 'असम में कांग्रेस का फिर से सत्ता हासिल करना बहुत बड़ी चुनौती है। कांग्रेस के कई पुराने और मजबूत नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। कांग्रेस एक बंद समूह जैसी बन गई है, जबकि भाजपा के पास आरएसएस समर्थित मजबूत कार्यकर्ता आधार है।'

पार्टी के भीतर असंतोष

विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया ने इन घटनाओं को सामान्य बताने की कोशिश की। उन्होंने कहा, 'यह बहुत आम बात है। सर्वे और अंदरूनी राजनीति से तय होता है कि किसे टिकट मिलेगा। अगर किसी को लगता है कि उसे मौका नहीं मिलेगा, तो वह दूसरी पार्टी में जा सकता है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है।' फिलहाल तुरंत वाला संकट काबू में दिख रहा है। बोरा अभी भी पार्टी में हैं और हाईकमान ने एकता दिखाने की कोशिश की है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से साफ हो गया है कि अंदर ही अंदर असंतोष और गुटबाजी अभी भी मौजूद है।

मार्च या अप्रैल 2026 में चुनाव होने की संभावना है। ऐसे में असम कांग्रेस और ज्यादा राजनीतिक ड्रामा बर्दाश्त नहीं कर सकती। इस बीच, कोई भी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं था, क्योंकि प्रमुख नेता ग्रीनवुड रिजॉर्ट में बंद कमरे की बैठक कर आगे की रणनीति तय कर रहे थे।

Read More
Next Story