स्नान के बिना माघ मेले से लौटे अविमुक्तेश्वरामानंद
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स्नान के बिना माघ मेले से लौटे अविमुक्तेश्वरामानंद

मौनी अमावस्या पर संगम स्नान को लेकर प्रशासन से टकराव के ग्यारहवें दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने माघ मेला क्षेत्र छोड़ दिया।उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि वो भारी मन से माघ मेले से बिना स्नान किए ही लौट रहे हैं।


माघ मेले में विवाद के बाद धरने पर बैठे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बुधवार को प्रयागराज छोड़ दिया।अविमुक्तेश्वरानंद बिना त्रिवेणी स्नान के ही वापस लौट गए।माघ मेले से रवाना होने से पहले उन्होंने मीडिया में बयान जारी कर कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है और अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसके लिए बीजेपी और योगी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया है।

बिना संगम स्नान किए माघ मेले से निकले अविमुक्तेश्वरानंद-

माघ मेले में शंकराचार्य के स्नान विवाद के बाद 10 दिन से धरने कर बैठे ज्योतिष पीठ के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बुधवार को प्रयागराज छोड़ दिया और बिना त्रिवेणी स्नान किए ही काशी के लिए रवाना हो गए।अपने शिविर के बाहर बैठे अविमुक्तेश्वरानंद ने विवाद का हल न होने की स्थिति में माघ मेला बीच में ही छोड़ने का फैसला लिया।अपने फैसले को उन्होंने अत्यंत दुखद फ़ैसला बताते हुए कहा कि सनातन परंपरा में ऐसा कभी नहीं हुआ जब एक शंकराचार्य को बिना स्नान के पवित्र भूमि छोड़नी पड़े।मेला प्रशासन के साथ चले लंबे विवाद के बाद अविमुक्तेश्वरानंद की वापसी हुई।अविमुक्तेश्वरानंद के साथ माघ मेला प्रशासन का टकराव 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के स्नान से शुरू हुआ था।

अखिलेश यादव ने बीजेपी को ज़िम्मेदार बताया-

11 दिन धरने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने विरोध प्रदर्शन समाप्त करने और माघ मेले से प्रस्थान करने की घोषणा की। उन्होंने कहा, “आज मन इतना व्यथित है कि हम बिना स्नान किए इस पावन भूमि से लौट रहे हैं। इसकी कल्पना नहीं की थी। वक्त बताएगा कि किसकी हार हुई और किसकी जीत।” इसके बाद वे अपने शिष्यों के साथ काशी रवाना हो गए।धरने पर बैठे अविमुक्तेश्वरानंद से समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने फ़ोन पर बात की थी। आज उनके लौटने पर अखिलेश यादव ने बीजेपी सरकार पर हमला करते हुए कहा, “भाजपा ने सनातनी परंपरा तोड़ी है।यह संतों का अपमान है।” इस पूरे घटनाक्रम में संत समाज बंटा नज़र आया।कुछ संतों ने अविमुक्तेश्वरानंद की आलोचना की तो कुछ में सरकार को दोषी ठहराया।

मौनी अमावस्या से शुरू हुआ था विवाद-

विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन हुई थी जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने पालकी पर सवार होकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे।उनके अनुसार मेला प्रशासन और पुलिस ने उनकी पालकी रोक दी और उन्हें पैदल जाने को कहा।उन्होंने इसको शंकराचार्य परंपरा से जोड़ते हुए आपत्ति की। इसके बाद उनके शिष्यों और पुलिस प्रशासन में झड़प हो गई।अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे संतों का अपमान बताते हुए आरोप लगाया कि प्रशासन ने उन्हें स्नान करने से रोका जबकि परंपरा के अनुसार शंकराचार्यों को विशेष व्यवस्था से स्नान की अनुमति होती है।साथ ही पुलिस ने अधिकारियों की मौजूदगी में उनके शिष्यों और बाल बटुकों के साथ मारपीट की और उनकी शिखा खींच कर अपमानित किया।

इधर माघ मेला प्रशासन ने उनपर यह आरोप लगाया कि भीड़ होने की वजह से विशेष व्यवस्था से स्नान के लिए जाना संभव नहीं था।ऐसे में कोई दुर्घटना हो सकती यही इसलिए अविमुक्तेश्वरानंद को पैदल जाने के लिए कहा गया पर वो तैयार नहीं हुए।इस बीच बाल बटुकों के साथ मारपीट और शिखा खींचने के वीडियो वायरल हो गए।इसके बाद प्रशासन और अविमुक्तेश्वरानंद में टकराव बढ़ गया। प्रशासन अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए।आरोप है कि अविमुक्तेश्वरानंद ने यूपी के मुख्यमंत्री के लिए आपत्तिजनक टिप्पणी की।

प्रशासन और अविमुक्तेश्वरानंद में नोटिस का दौर-

अविमुक्तेश्वरानंद के धरने कर बैठने के बाद माघ मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ‘शंकराचार्य’ टाइटल लिखने पर नोटिस जारी कर दिया जिसमें पूछा गया कि उन्होंने शंकराचार्य क्यों लिखा है क्योंकि ज्योतिष पीठ प्रमुख पर उनका दावा विवादित है।प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में मामला लम्बित होने की बात कही।इसका जवाब अविमुक्तेश्वरानंद ने दिया और कहा कि मामला कोर्ट में जाने से पहले उनका पट्टाभिषेक हो चुका था और उनको इससे रोका नहीं गया है।उसके बाद माघ मेला प्रशासन ने उनको दूसरा नोटिस देते हुए कहा कि भीड़ में बग्घी से जाने की जिद की वजह से हादसा हो सकता था। ऐसे में क्यों न उनको माघ मेले में आने से प्रतिबंधित किया जाए।उसके बाद शंकराचार्य ने नोटिस भेजकर इसका जवाब दिया।

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