क्या अविमुक्तेश्वरानंद वास्तव में शंकराचार्य हैं? विवाद और दावों की पूरी कहानी
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क्या अविमुक्तेश्वरानंद वास्तव में शंकराचार्य हैं? विवाद और दावों की पूरी कहानी

Shankaracharya: शंकराचार्य पद का मामला पुराना है। 1941 से पहले 168 वर्षों तक ज्योतिर्मठ में शंकराचार्य की गद्दी खाली रही।


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Shankaracharya controversy: प्रयागराज के माघ मेले में सिर्फ श्रद्धालुओं की भीड़ ही नहीं थी, बल्कि विवाद की आंच भी फैल गई। दरअसल, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद को शंकराचार्य घोषित किया और मेला प्रशासन ने उनके पद पर सवाल उठाए। इस लंबे समय से चल रहे विवाद ने धार्मिक आस्था, न्याय और कोर्ट के आदेशों को एक साथ घेर लिया। शंकराचार्य पद का इतिहास 1941 से लेकर आज तक राजनीति, वसीयत और कोर्ट के फैसलों से जुड़ा रहा है और अब इसे लेकर फिर से बहस छिड़ गई है।

मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर पूछा कि वह किस आधार पर खुद को शंकराचार्य बताते हैं। मेला प्रशासन ने यह सवाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर उठाया था, जिसमें शंकराचार्य की नियुक्ति और पट्टाभिषेक प्रक्रिया पर रोक की बात कही गई थी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद 2022 से ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन इस पद पर उनकी नियुक्ति शुरू से ही विवादित रही है।

माघ मेला टकराव और शिष्यों का बयान

माघ मेला के दौरान हुए टकराव के दो दिन बाद विवाद फिर से उठ खड़ा हुआ। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों ने बताया कि मेला में क्या हुआ और प्रशासन ने किस तरह उनके गुरु पर सवाल उठाए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी नोटिस का जवाब देते हुए कहा कि उन्हें शंकराचार्य के रूप में मान्यता है।

शंकराचार्य पद का विवाद

शंकराचार्य पद का मामला पुराना है। 1941 से पहले 168 वर्षों तक ज्योतिर्मठ में शंकराचार्य की गद्दी खाली रही। 18वीं सदी में स्वामी रामकृष्ण तीर्थ ने मठ संभाला, लेकिन उनके लिए शंकराचार्य की उपाधि दर्ज नहीं है। स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को ज्योतिष्पीठ (ज्योतिर्मठ) का शंकराचार्य बनाया गया। उन्हें पुरी, शृंगेरी, गढ़वाल, वाराणसी और दरभंगा के शंकराचार्यों तथा शासकों का समर्थन मिला। उनके निधन के बाद शिष्य स्वामी हरिहरानंद सरस्वती को शंकराचार्य बनाने का प्रस्ताव आया, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके बाद कथित वसीयत में चार नाम बताए गए, जिससे शंकराचार्य पद पर विवाद और गहरा गया।

एक ही पीठ पर दो शंकराचार्य

1989 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने खुद को शंकराचार्य घोषित किया। उसी समय स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को भी उत्तराधिकारी घोषित किया गया। इस तरह एक ही पीठ पर दो शंकराचार्य हो गए। 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों को शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया और कहा कि कोई भी योग्य उत्तराधिकारी नहीं है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा

11 सितंबर 2022 को स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हुआ। इसके अगले दिन, उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद को शंकराचार्य घोषित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2022 को उनके पट्टाभिषेक और छत्र-चंवर के उपयोग पर रोक लगा दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी लंबित है।

वकील का पक्ष

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के वकील पीएन मिश्रा का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2022 के आदेश में 17 अक्टूबर के बाद किसी पट्टाभिषेक पर रोक लगाई थी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक इससे पहले ही हो चुका था। आदेश में कई जगह उन्हें शंकराचार्य के रूप में संबोधित किया गया है।

विवाद की प्रमुख बातें

1941: स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को शंकराचार्य बनाया गया।

1953: ब्रह्मानंद सरस्वती का निधन, उत्तराधिकार को लेकर विवाद शुरू।

1989: एक ही पीठ पर दो शंकराचार्य – स्वरूपानंद और वासुदेवानंद।

2017: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों को शंकराचार्य मानने से इनकार किया।

2022: स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद को शंकराचार्य घोषित किया।

सुप्रीम कोर्ट ने पट्टाभिषेक और छत्र-चंवर के उपयोग पर रोक लगाई, मामला अभी भी लंबित है।

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