क्या जयपुर के नागरिकों ने मॉरल पुलिसिंग का सामना कर एक मिसाल पेश की है?
x
पैनलिस्टों के अनुसार, जयपुर की घटना यह दिखाती है कि अहिंसक और कानूनी जागरूक नागरिक कार्रवाई ऐसी स्वयंभू निगरानी का प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकती है।

क्या जयपुर के नागरिकों ने 'मॉरल पुलिसिंग' का सामना कर एक मिसाल पेश की है?

पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आज़ाद और महिला अधिकार कार्यकर्ता ब्रिंदा अडिगे का कहना है कि वायरल वैलेंटाइन डे वीडियो साहस का प्रतीक है और यह दूसरों को संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रेरित कर सकता है।


Click the Play button to hear this message in audio format

“इस तरह की गुंडागर्दी के आगे झुकिए मत। यह भीड़ की हिंसा है।” पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आज़ाद का यह कड़ा संदेश उस घटना के बाद आया, जब जयपुर में कुछ युवा नागरिकों ने कथित तौर पर बजरंग दल से जुड़े कार्यकर्ताओं द्वारा वैलेंटाइन डे पर की जा रही नैतिक पुलिसिंग का शांतिपूर्वक विरोध किया। यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है और इसने स्वयंभू निगरानी, संवैधानिक अधिकारों और पुलिस जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है।

द फेडरल ने महिला अधिकार कार्यकर्ता ब्रिंदा अडिगे और पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आज़ाद से बातचीत की, ताकि समझा जा सके कि जयपुर की यह घटना भारत के लोकतंत्र के लिए क्या मायने रखती है और क्या नागरिकों द्वारा इस तरह का प्रतिरोध अब एक नई प्रवृत्ति बनता जा रहा है। चर्चा का मुख्य विषय था- बजरंग दल की वैलेंटाइन डे राजनीति और व्यापक रूप से नैतिक पुलिसिंग की संस्कृति।

नागरिकों का प्रतिरोध

यह घटना 14 फरवरी को जयपुर के एक सार्वजनिक पार्क में हुई। कथित रूप से बजरंग दल से जुड़े कुछ लोग डंडे और गमछे लेकर पार्क में पहुंचे और वहां मौजूद युवा जोड़ों से पूछताछ करने लगे। बताया जाता है कि उन्होंने नाम, फोन नंबर और पते की जानकारी मांगी, जो सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने का एक तरीका माना जा रहा है।

उसी समय एक युवक ने पूरी घटना की रिकॉर्डिंग शुरू कर दी और उन लोगों से सवाल पूछे-“आप कौन हैं? आपका पहचान पत्र क्या है? आप डंडा क्यों लेकर आए हैं? किस अधिकार से आप सार्वजनिक पार्क में निजी जानकारी मांग रहे हैं?”

ब्रिंदा अडिगे ने इस दृश्य को जनता की असली ताकत और सक्रिय नागरिकता बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं की शांत लेकिन दृढ़ प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि “हम अभी भी खुद को और अपने देश को बचा सकते हैं।” उनके अनुसार, यहां आक्रामकता नहीं बल्कि साहस दिखा। “वे उन लोगों के सामने खड़े हुए, जिन्हें कई तरह की ताकतों से शक्ति मिलती है… और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन स्वयंभू समूहों को राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त होता है,” उन्होंने कहा।

एक आदर्श प्रतिक्रिया

यशोवर्धन आज़ाद ने उस युवक के संयम की सराहना की, जिसने बहुत ही विनम्र तरीके से उस ग्रुप से सवाल किए। उन्होंने कहा कि आवागमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से सुनिश्चित अधिकार हैं, फिर भी नागरिकों को इन्हें लागू करने के लिए असाधारण साहस दिखाना पड़ता है।

उन्होंने कहा, “जो चीज मुझे एक संवैधानिक अधिकार के रूप में सहज रूप से मिलनी चाहिए… उसके लिए आपको इतना साहस जुटाना पड़ता है।”

उनके अनुसार, जयपुर की यह घटना एक उदाहरण बन सकती है। जब पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में विफल रहती है, तो आम नागरिक खुद अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए मजबूर हो सकते हैं — लेकिन कानून की सीमाओं के भीतर रहकर। आज़ाद ने कहा, “इतने संयमित और लोकतांत्रिक तरीके से ऐसा करना वास्तव में सराहनीय है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसे वीडियो कानून प्रवर्तन एजेंसियों को उनके कर्तव्य की याद दिलाते हैं।

कानूनी उपाय

जब उनसे पूछा गया कि ऐसी परिस्थितियों में कौन-कौन से कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं, तो आज़ाद ने कहा कि वर्णित कृत्य उत्पीड़न, सार्वजनिक उपद्रव, डराने-धमकाने और संभवतः गैरकानूनी जमावड़े की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने कहा कि नागरिकों को गलत कार्यों की शिकायत करने और आवश्यकता पड़ने पर आत्मरक्षा का अधिकार है।

उनका तर्क था कि सार्वजनिक पार्कों में बैठे जोड़ों को परेशान करना सार्वजनिक व्यवस्था और शांति भंग करने के समान है। ऐसे कृत्यों को शून्य सहिष्णुता अपराध माना जाना चाहिए।

ब्रिंदा अडिगे ने जोड़ा कि यदि वहां महिलाएं मौजूद थीं, तो यौन उत्पीड़न, शील भंग करने और पीछा करने से जुड़े प्रावधान भी लागू हो सकते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि वैलेंटाइन डे पर अक्सर ऐसी घटनाएं होने के बावजूद स्थानीय बीट पुलिस वहां मौजूद क्यों नहीं थी।

उन्होंने कहा, “कर्नाटक में पुलिस ने हर जगह थिएटर, पार्क और सार्वजनिक स्थलों पर निगरानी बढ़ाई थी, क्योंकि उन्हें पहले से आशंका थी।” उन्होंने संकेत दिया कि निवारक पुलिसिंग भी राज्य की जिम्मेदारी का हिस्सा है।

सोशल मीडिया की भूमिका

दोनों पैनलिस्टों ने माना कि जयपुर की इस घटना को व्यापक रूप से सामने लाने में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अडिगे ने कहा, “हम जानते हैं कि सोशल मीडिया हर चीज़ को बढ़ा-चढ़ाकर सामने लाता है। पहले यह नफरत और असहिष्णुता को बढ़ावा देता था। आज हम देख रहे हैं कि लोग नागरिकों के खड़े होने को भी बढ़ावा दे रहे हैं।”

आज़ाद ने भी इस बात से सहमति जताई और कहा कि वीडियो को ऑनलाइन मिल रही सराहना से प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बन सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वह स्वयं इस मुद्दे को मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक सहित वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष उठाएंगे और पूछेंगे कि स्पष्ट दृश्य सामने होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

चर्चा के दौरान स्वयंभू निगरानी और राजनीतिक संरक्षण के व्यापक मुद्दे पर भी बात हुई। कार्यक्रम संचालक ने सवाल उठाया कि क्या कर्नाटक में श्रीराम सेना या राजस्थान में करणी सेना जैसे समूह बिना किसी मौन समर्थन के इतनी स्वतंत्रता से काम कर सकते हैं।

अडिगे ने जोर देकर कहा कि गैर-राज्य तत्वों द्वारा की जाने वाली तथाकथित “मोरल पुलिसिंग” असल में पुलिसिंग है ही नहीं। उन्होंने कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जिम्मेदारियों का जिक्र करते हुए कहा, “आपकी पुलिस मैनुअल में ऐसा कुछ नहीं लिखा है। इसके लिए आपको वेतन नहीं दिया जाता।”

पुलिस का नजरिया

चर्चा का दायरा उन घटनाओं तक भी बढ़ा, जहां स्वयं पुलिसकर्मियों पर नैतिक पहरेदारी के आरोप लगे। पैनल ने उत्तर प्रदेश की एक घटना को याद किया, जिसमें एक महिला पुलिस अधिकारी ने पार्क में अपने भाई के साथ बैठी एक लड़की को गलतफहमी में डांट दिया था।

अडिगे ने कहा कि भारत अब भी “गहराई से पितृसत्तात्मक, लैंगिक भेदभावपूर्ण और स्त्री-विरोधी” सोच से प्रभावित है, जहां वयस्कों के बीच सहमति से होने वाली सार्वजनिक बातचीत को भी संदेह की नजर से देखा जाता है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में बनाए गए “रोमियो स्क्वॉड” जैसे अभियानों की आलोचना करते हुए कहा कि पितृसत्तात्मक सोच के तहत दी जाने वाली सुरक्षा महिलाओं की वास्तविक सुरक्षा को मजबूत नहीं करती।

आज़ाद ने अपने पुलिस अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि पहले महिलाओं के कॉलेजों के बाहर होने वाली छेड़छाड़ को गंभीरता से लिया जाता था। उन्होंने कहा, “इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती,” और जोर दिया कि उत्पीड़न से सख्ती से निपटना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

संवैधानिक अधिकार

चर्चा के केंद्र में यह बात रही कि नागरिकों को संविधान द्वारा स्वतंत्र रूप से घूमने, शांतिपूर्वक एकत्र होने और कानून की सीमाओं के भीतर अपनी अभिव्यक्ति करने का अधिकार है। पार्क की बेंच पर साथ बैठना, हाथ पकड़ना या सार्वजनिक स्थान पर बातचीत करना डराने-धमकाने का आधार नहीं हो सकता।

अडिगे ने युवाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “युवा हमारा कल नहीं हैं, युवा आज हैं।” उन्होंने कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों से अपील की कि वे छात्रों को अपने अधिकार समझने और उनकी रक्षा करने के लिए सशक्त बनाएं।

आज़ाद ने व्यापक संदेश के साथ चर्चा का समापन किया। उन्होंने कहा, “भारत हमारा है और इसे कैसे संभालना है, यह भी हमारी जिम्मेदारी है। साहस के साथ जवाब दीजिए, हम सब आपका समर्थन करेंगे।”

पैनलिस्टों के अनुसार, जयपुर की यह घटना दिखाती है कि शांतिपूर्ण और कानूनी समझ के साथ किया गया नागरिक प्रतिरोध भी सतर्कतावाद (विजिलेंटिज़्म) का मुकाबला कर सकता है। हालांकि, प्रशासन आगे कानूनी कार्रवाई करेगा या नहीं, यह अब भी एक खुला प्रश्न बना हुआ है।

Read More
Next Story