‘रिपब्लिक ऑफ बेल्लारी’ की वापसी?  खनन माफिया फिर आमने-सामने
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‘रिपब्लिक ऑफ बेल्लारी’ की वापसी? खनन माफिया फिर आमने-सामने

बल्लारी में बैनर विवाद से गोलीकांड तक की कहानी बताती है कि खनन, राजनीति और सत्ता की जंग ने कानून को फिर हाशिये पर धकेल दिया है।


कर्नाटक का बल्लारी (पूर्व में बेल्लारी) ज़िला, जो कभी अवैध खनन गतिविधियों को लेकर राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा है, अब खनन कारोबार से जुड़े राजनीतिक दिग्गजों की आपसी प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा बन गया है। राज्य की दो प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े खनन सम्राटों के बीच बल्लारी पर वर्चस्व को लेकर टकराव सामने आया है।

खनिज संपदा से भरपूर इस ज़िले में हालात गुरुवार (1 जनवरी) को इतने तनावपूर्ण हो गए कि महज़ बैनर लगाने जैसे मामूली विवाद में गोली चल गई, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। इस घटना के बाद बल्लारी के पुलिस अधीक्षक पवन नेज्जूर को निलंबित कर दिया गया।

अवैध खनन मामले में ज़मानत पर रिहा होने के बाद राजनीतिक मैदान में लौटे गंगावती के विधायक जनार्दन रेड्डी ने बल्लारी में दोबारा प्रवेश किया है। इसके साथ ही ज़िले में खनन कारोबार से जुड़े नेताओं के बीच प्रभुत्व की जंग तेज़ हो गई है। उनके सामने बल्लारी सिटी विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक नारा भारत रेड्डी हैं, जो जनार्दन रेड्डी के पुराने सहयोगी रहे एन. सूर्यनारायण रेड्डी के बेटे हैं। कभी जनार्दन और सूर्यनारायण साथ मिलकर कारोबार और राजनीति दोनों में सक्रिय थे।

बैनर लगाने से शुरू हुआ विवाद

यह पूरा विवाद गुरुवार (1 जनवरी) को उस समय शुरू हुआ, जब शनिवार (3 जनवरी) को होने वाले महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमा के अनावरण से पहले बल्लारी में बैनर लगाए जा रहे थे। कांग्रेस कार्यकर्ता जनार्दन रेड्डी के आवास के सामने बैनर लगा रहे थे, जिस पर उन्होंने आपत्ति जताई। जब कार्यकर्ता नहीं माने और रात में फिर से बैनर लगाने लौटे, तो हालात और बिगड़ गए।

जैसे-जैसे विवाद बढ़ा और झड़पें शुरू हुईं, कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के वरिष्ठ नेता मौके पर पहुंच गए। पूर्व मंत्री बी. श्रीरामुलु जनार्दन रेड्डी के घर पहुँचे, जबकि भारत रेड्डी के सहयोगी सतीश रेड्डी भी अपने समर्थकों के साथ वहाँ आ गए। भीड़ बढ़ने के साथ स्थिति हिंसक हो गई और पथराव शुरू हो गया। इसी अफरातफरी के बीच सतीश रेड्डी के एक सहयोगी ने गोली चला दी, जिसमें कांग्रेस कार्यकर्ता राजशेखर की मौत हो गई।

हालात को काबू में करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और हवा में गोलियां भी चलाई गईं। लेकिन तब तक इस घटना ने पूरी तरह राजनीतिक रंग ले लिया था। जनार्दन रेड्डी और भाजपा ने दावा किया कि यह पूरी घटना उन्हें मारने की साज़िश थी। वहीं, भारत रेड्डी ने भी घटनास्थल पर जाने का फैसला किया, जिससे तनाव और बढ़ गया।

‘रिपब्लिक ऑफ बेल्लारी’ की यादें

जनार्दन रेड्डी के आवास के चारों ओर 200 मीटर के दायरे में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई। यह पूरा घटनाक्रम ‘रिपब्लिक ऑफ बेल्लारी’ के उन काले दिनों की याद दिलाने लगा, जब जनार्दन रेड्डी (2008–11) राज्य मंत्री थे और बल्लारी में अवैध खनन चरम पर था। उस दौर में बहुत कम लोग विरोध करने का साहस जुटा पाते थे।

तत्कालीन विपक्षी कांग्रेस ने तब बल्लारी को ‘खनन माफिया का गणराज्य’ कहकर तंज कसा था। 2010 में कांग्रेस ने बेंगलुरु से बल्लारी तक 320 किलोमीटर लंबी पदयात्रा भी निकाली थी, ताकि तत्कालीन भाजपा सरकार की विफलताओं को उजागर किया जा सके। इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि में कांग्रेस 2013 में सत्ता में आई थी। गुरुवार की अराजक तस्वीरों ने एक बार फिर उस अस्थिर बल्लारी की याद दिला दी, जहाँ निजी सत्ता राज्य के कानून से ऊपर दिखती थी।

पुराने बैर की नई चिंगारी

सूत्रों के मुताबिक, गुरुवार की हिंसा के पीछे जनार्दन रेड्डी और सूर्यनारायण रेड्डी के बीच पुरानी दुश्मनी अहम कारण रही। दोनों कभी साथ मिलकर खनन कारोबार चलाते थे, लेकिन जनार्दन की जेल यात्रा के बाद बल्लारी की राजनीतिक तस्वीर बदल गई और साझा कारोबार बिखर गया। जब सुप्रीम कोर्ट ने जनार्दन रेड्डी के बल्लारी में प्रवेश पर रोक लगा दी थी, तो क्षेत्र में सत्ता का खालीपन पैदा हो गया। इस खाली जगह को भरने की कोशिश कई नेताओं ने की, जिनमें भारत रेड्डी भी शामिल थे। उन्हें पड़ोसी आंध्र प्रदेश के कारोबारियों का समर्थन मिला और 2023 में वे विधायक चुने गए। जनार्दन रेड्डी को दोबारा बल्लारी में प्रवेश की अनुमति मिलते ही टकराव लगभग तय माना जा रहा था।

आरोप–प्रत्यारोप का दौर

गुरुवार की हिंसा के बाद जनार्दन रेड्डी ने दावा किया कि यह उन्हें मारने की साज़िश थी। इसके जवाब में भारत रेड्डी ने कहा कि वे इस तरह की छोटी राजनीतिक चालों में विश्वास नहीं रखते और उन्हें भाजपा नेता की हत्या करने की कोई ज़रूरत नहीं है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जनार्दन रेड्डी कोई इतने बड़े नेता हैं क्या।

अतीत में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने विपक्षी भाजपा के खिलाफ बेंगलुरु से बल्लारी तक विशाल मार्च का नेतृत्व कर आक्रामक भूमिका निभाई थी, जिसका फायदा कांग्रेस को चुनावी रूप से मिला था। अब सवाल यह है कि क्या वे इस बार भी उतनी ही प्रभावी भूमिका निभा पाएंगे, खासकर तब जब ताज़ा हिंसा में उनकी ही पार्टी के एक विधायक का नाम सामने आ रहा है। और क्या पुलिस अधीक्षक पवन नेज्जूर का निलंबन इस पूरे घटनाक्रम के लिए पर्याप्त कार्रवाई माना जा सकता है?

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