फिल्मी चमक लेकिन सियासत में झटका, खेसारी-रीतेश की अधूरी राजनीतिक कहानी
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फिल्मी चमक लेकिन सियासत में झटका, खेसारी-रीतेश की अधूरी राजनीतिक कहानी

बिहार चुनाव में खेसारी लाल यादव और रीतेश पांडे की हार ने साबित किया कि सिर्फ फिल्मी स्टारडम नहीं, जमीनी जुड़ाव ही राजनीति की असली कसौटी है।


क्या फिल्मी चेहरों के लिए राजनीति पार्ट टाइम होती है। यह खुद में बड़ा सवाल है। वैसे तो हर एक फिल्मी चेहरा इस मुद्दे पर रटा रटाया जवाब देता है। वो जनता की सेवा करना चाहते हैं, अगर चुनावी नतीजे पक्ष में नहीं रहे तो भी सियासत से नाता बना रहेगा। लेकिन हकीकत कुछ और है। यहां पर हम बात करेंगे बिहार विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाने वाले दो बड़े चेहरों खेसारी लाल यादव और रीतेश पांडे की। चुनावी मैदान में उतरने से पहले खेसारी लाल यादव ने कुछ इस तरह आगाज किया था।

“क्या हार में क्या जीत में,

किंचित नहीं भयभीत मैं,

संघर्ष पथ पर जो मिला,

ये भी सही वो भी सही…

जनता मेरे लिए तब भी सर्वोपरि थी, आज भी है और हमेशा रहेगी! मुद्दा तब भी उठल बा, आगे भी उठी...जय बिहार! कुछ इसी अंदाज में रीतेश पांडे भी जनता के बीच जाकर बड़ी बड़ी तकरीरें करते थे। दोनों को उम्मीद थी कि बिहार की जनता उन्हें पटना का टिकट पकड़ा देगी। लेकिन जब नतीजे सामने आए तो इशारा था कि कुछ अधिक मेहनत करनी होगी। पहले आपको बता दें कि इन दोनों चेहरों को कितने मत मिले थे। आरजेडी के टिकट पर किस्मत आजमा रहे खेसारी लाल यादव को छपरा विधानसभा में 79 हजार मत मिले। लेकिन 7600 मतों से चुनाव हार गए। वहीं करगहर विधानसभा से जनसुराज पार्टी से किस्मत आजमा रहे रीतेश पांडे तीसरे स्थान पर रहे। रीतेश पांडे को कुल 16298 मत मिले थे और करीब 35 हजार मतों से चुनाव हार गए। चुनाव में शिकस्त के बाद दोनों बोले कि हारे तो क्या हुआ। जनता का प्रेम उनके साथ है। अब इन बयानों के गुजरे बहुत महीने नहीं बीते। खेसारी लाल यादव ने सियासत से किनारा कर लिया। खेसारी लाल यादव ने कहा कि शायद उनकी किस्मत में सियासत का जो छौंका लगना चाहिए था। वो नहीं हुआ। और अब रीतेश पांडे को भी अहसास हो गया कि शायद राजनीति की उबड़ खाबड़ जमीन के लिए नहीं बने हैं। इससे पहले आपको यह भी जानने में दिलचस्पी होगी कि इन दोनों चेहरों का फिल्मी करियर कैसा रहा है।

खेसारी लाल यादव का जन्म 15 मार्च 1986 को बिहार के छपरा जिला में हुआ था। उनका नाम पहले शत्रुघ्न कुमार यादव था, बाद में वो सिनेमाई दुनिया में खेसारी लाल यादव नाम से दर्शकों के बीच चर्चित हुए। अभिनेता शुरुआत से ही गायन और नृत्य में माहिर थे। उनका गायक बनने का सपना था, लेकिन गरीबी में पले-बढ़े खेसारी के लिए यह आसान नहीं था। इस ख्वाब को पूरा करने के लिए उन्होंने लिट्टी-चोखा तक बेचा। लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने भोजपुरी एल्बम गाना शुरु किया। खेसारी ने सैकड़ों भोजपुरी हिट गीत गाए, जिनमें 'पियवा गए रे हमर सऊदी रे भौजी', 'सैयां अरब गइले न' और 'सैयां आइबा की न आइबा' जैसे गाने उनके प्रसिद्ध एल्बम गीतों में से एक हैं। कभी एक-एक पैसों के लिए लिट्टी-चोखा बेचने वाले खेसारी लाल यादव आज 32 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं। अभिनेता ने संपत्ति की जानकारी अपने चुनावी हलफनामे में बताया है।

रितेश पांडे भोजपुरी इंडस्ट्री के चमकते सितारे हैं, जो सिंगिंग, एक्टिंग और मॉडलिंग में सक्रिय हैं। 14 मई 1991 को बिहार के सासाराम (रोहतास जिला) में जन्मे रितेश ने 2014 में 'मुंडा लाइक मी' से डेब्यू किया। उनका गाना 'हैलो कौन' यूट्यूब पर 900 मिलियन व्यूज के साथ ग्लोबल चार्ट टॉपर बना। 'बलमा बिहारवाला 2 'तोहरे में बसेला प्राण' जैसी फिल्मों में काम कर चुके रितेश को 'भोजपुरी का एडेल' कहा जाता है।

लिट्टी चोखा बेचने वाले खेसारी लाल यादव का सिल्वर स्क्रीन पर संघर्ष कम नहीं रहा। लेकिन अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे। वहीं भोजपुरी के एडेल से खास पहचान बना चुके रीतेश पांडे भी फिल्मी स्क्रीन पर बेहतर करते नजर आए। ऐसे में दोनों को लगा कि स्टारडम की बदौलत वो सियासत की पिच पर भी चौके छक्के लगाने में कामयाब होंगे। लेकिन जब सियासी आगाज पर ग्रहण लग गया तो लोगों को लगा कि ये दोनों दूसरे फिल्मी सितारों से अलग हैं। वो रील के संघर्ष को रीयल जिंदगी में समझेंगे और अपने वोटर्स के सुख दुख में खड़े रहेंगे। लेकिन सियासत की चमक जितनी तेज होती है उसमें सफर इतना आसान नहीं होता। रील की दुनिया में संघर्ष दो से ढाई घंटे का होता है। लेकिन सियासी आगाज पर ग्रहण लग जाए तो कम से कम पांच साल का इंतजार करना ही होगा। जानकार कहते हैं चाहे खेसारी लाल हों या रीतेश पांडे ये दोनों लोग अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, सन्नी देओल, विनोद खन्ना से बड़े तो नहीं हैं। दरअसल फिल्मी चेहरों को लगने लगता है कि उन्होंने जो शोहरत हासिल की है उसके दम पर राजनीति की गाड़ी में सरकती चली जाएगी।

खेसारी लाल यादव और रीतेश पांडे ने जब सियासत से किनारा कसा तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। बिहार और यूपी में कहा भी जाता है कि फिल्मी सितारे जो महानगरों में रहते हैं वो राजनीति को पार्ट टाइम पेशे की तरह लेते हैं। लेकिन अब जनता भी समझदार हो चुकी है। यही नहीं चुनावी परीक्षा में वही उम्मीदवार कामयाब होगा जो अपने इलाके की नब्ज को समझता है। अब आप अगर सिर्फ पर्यटन के इरादे से अपने इलाके और लोगों के बीच जाएंगे तो नतीजा वही आएगी जिसका सामना खेसारी लाल यादव-रीतेश पांडे को करना पड़ा। अच्छी बात यह है कि सियासत की कड़वी सच्चाई इन दोनों लोगों को बहुत जल्द समझ में आ गई।

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