
बिहार सांसदों का रिपोर्ट कार्ड: फंड खर्च में 6 सांसद जीरो, जनता बेहाल
MPLADS फंड खर्च करने में बिहार के 6 दिग्गज सांसद रहे फिसड्डी। ललन सिंह, मीसा भारती और शांभवी चौधरी के खाते में जीरो खर्च; योजना बंद करने की उठने लगी है मांग।
Bihar MP's Report Card : बिहार की राजनीति में जहां विकास के दावों का शोर गूंजता है, वहीं सरकारी आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। 18वीं लोकसभा चुनाव को डेढ़ साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन बिहार के कई माननीय सांसद अपने क्षेत्र के विकास के लिए मिले सरकारी फंड (MPLADS) को खर्च करने में पूरी तरह 'फुस्स' साबित हुए हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि इस लिस्ट में कई केंद्रीय मंत्री और दिग्गज नेताओं के नाम शामिल हैं, जिन्होंने दो साल में विकास के नाम पर एक धेला भी खर्च नहीं किया है।
फंड की 'गंगा' में प्यासा है बिहार
नियमों के मुताबिक, हर सांसद को अपने क्षेत्र में सड़क, अस्पताल और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने के लिए सालाना 5 करोड़ रुपए आवंटित होते हैं। बिहार की 40 सीटों के हिसाब से यह राशि 5 साल में 1000 करोड़ रुपए बैठती है। अब तक प्रति सांसद लगभग 9.80 करोड़ रुपए आवंटित हो चुके हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि ललन सिंह, मीसा भारती और शांभवी चौधरी जैसे 6 बड़े सांसद ऐसे हैं, जिनके खर्च का कॉलम आज भी 'शून्य' (0) दिखा रहा है। न इन्होंने पैसा खर्च किया और न ही विकास की कोई योजना जिला प्रशासन को सुझाई।
सांसद निधि: विकास का जरिया या भ्रष्टाचार की जननी?
योजना की शुरुआत 2011-12 में एक पवित्र भावना के साथ हुई थी कि सांसद अपनी मर्जी से क्षेत्र की छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा कर सकेंगे। लेकिन अब इस योजना को बंद करने की मांग उठने लगी है। जानकारों का कहना है कि यह निधि अब 'भ्रष्टाचार की जननी' बन गई है। हाल ही में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का अपने बेटे को 'कमीशन लेने' की सलाह देने वाला बयान इस व्यवस्था की पोल खोलता है। सवाल उठ रहे हैं कि जब सांसद पैसा खर्च ही नहीं कर रहे, तो क्यों न इस राशि को सरकार वापस लेकर किसी बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्ट में लगा दे?
कौन अव्वल और कौन फिसड्डी?
रिपोर्ट कार्ड पर गौर करें तो अररिया के प्रदीप सिंह (9.45 करोड़) और वैशाली की वीणा देवी (9.40 करोड़) खर्च के मामले में सबसे आगे रहे हैं। वहीं, राजीव प्रताप रूडी, संजय जायसवाल और विवेक ठाकुर जैसे कद्दावर नेताओं का रिकॉर्ड भी खर्च के मामले में 'जीरो' रहा है। युवा सांसद शांभवी चौधरी, जिनसे बड़ी उम्मीदें थीं, उन्होंने भी अब तक एक भी योजना की सिफारिश नहीं की है।
सांसद निधि का गणित समझिए
यह पैसा सीधे सांसद के हाथ में नहीं आता। सांसद 'ई-साक्षी' पोर्टल पर काम की सिफारिश करते हैं, जिसे जिला योजना पदाधिकारी अमली जामा पहनाते हैं। 15 लाख से ऊपर के कामों के लिए टेंडर होता है, जबकि छोटे कामों में सांसदों की मर्जी चलती है। नियम यह भी है कि यह पैसा मंदिर, मस्जिद या किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं दिया जा सकता। अगर पैसा इस साल खर्च नहीं हुआ, तो वह अगले साल के फंड में जुड़ जाता है, यानी वह 'लैप्स' नहीं होता।
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