
आत्मनिर्भर बनने की कोशिश, लेकिन बिहार में कांग्रेस सत्ता के बिना बेसहारा
बिहार में कांग्रेस आरजेडी के साथ चुनाव लड़कर भी न सीटें बढ़ा सकी, न संगठन। 2020 के मुकाबले 2025 में प्रदर्शन और गिरा।
Congress performance in Bihar: ना हमें सीटों की संख्या में फायदा हुआ और ना ही हम अपने संगठन को मजबूत कर सके। अब समय आ चुका है जब बिहार में कांग्रेस पार्टी को कुछ करना होगा। आरजेडी(RJD) के साथ मिलकर चुनाव जरूर लड़े। लेकिन फायदा नहीं मिला। यह कहना है बिहार कांग्रेस के कद्दावर नेता शकील अहमद खान का जो पिछली सरकार में सदन में नेता विधायक दल थे। हालांकि इस दफा वो खुद अपना चुनाव हार गए।
शकील अहमद खान (Shakeel Ahmed Khan) जब इस तरह से अपने गुस्से या व्यथा का इजहार कर रहे थे तो आरजेडी के नेता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि शुक्र मनाएं कि 6 सीट जीत गए नहीं तो तस्वीर और बुरी होती। इसके साथ यह भी कहा कि अलग होने की इच्छा हो तो अलग हो जाएं। हालांकि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने शकील अहमद खान के बारे में कहा कि वो अवसरवाद की बात नहीं करें तो अच्छा। विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के कार्यकर्ता जब चुनाव अलग से लड़ने की बात कर रहे थे तब शकील अहमद खान क्यों कुछ नहीं बोले। अब शकील अहमद के इस बयान पर आगे बढ़ने से पहले कम से कम साल 2020 और 2025 की तस्वीर को समझना भी जरूरी होगा।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (Bihar Assembly Elections 2025) में कांग्रेस को 6 सीटों से संतोष करना पड़ा। बता दें कि 61 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों ने किस्मत आजमाई थी। अगर सीट के सीटों की संख्या के हिसाब से देखें तो सफलता की दर 10 फीसद है। करीब 8.71 फीसद मतदाताओं ने भरोसा जताया। लेकिन अगर इसकी तुलना साल 2020 के चुनाव से करें तो 70 सीटों पर लड़ी कांग्रेस को करीब 9.6 फीसद मत मिले और सीटों की संख्या 19 थी यानी कि सफलता की दर करीब 25 फीसद।
अब इन आंकड़ों पर बिहार की राजनीति पर नजर रखने वाले अशोक मिश्रा कहते हैं कि जमीनी स्तर पर कांग्रेस शून्य है। सीटों की संख्या जितनी भी है उसमें आरजेडी का योगदान है। अशोक मिश्रा कहते हैं कि क्या आपको याद है कि बिहार में कितने साल पहले कांग्रेस सत्ता में थी। पांच साल, दस साल या दशकों। यह सवाल इस वजह से वाजिब है कि कांग्रेस जिस वोटबैंक पर राजनीति किया करती थी। धीरे धीरे उस पर क्षेत्रीय दलों का कब्जा होता गया।
अशोक मिश्रा कहते हैं कि साल 1990 के बाद यानी मंडल कमीशन (Mandal Commission Politics) की राजनीति ने बिहार की सामाजिक व्यवस्था को बदल दिया। उसमें कमंडल की राजनीति में तड़के का काम किया। इसका सीधा असर कांग्रेस पर पड़ा। कांग्रेस, समावेशी सोच के साथ अपनी राजनीति कर रही थी। लेकिन इन दो घटनाओं के बाद सामाजिक न्याय (Social Justice in Bihar) की बात करने वाले और सांप्रदायिक राजनीतिक (Communal Politics in Bihar) करने वाले कामयाब हुए। हालांकि बिहार की जनता ने करीब डेढ़ दशक तक सांप्रदायिक राजनीति को नकारा। हालांकि धीरे धीरे बीजेपी अपने मकसद में कामयाब होती गई।
कांग्रेस, चुपचाप अपनी जमीन को खिसकती हुई देखती रही। यह कड़वा सच है कि संगठन को जिंदा और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए सरकारें ऑक्सीजन का काम करती हैं और वो ऑक्सीजन कांग्रेस के पास नहीं है। साल 2025 में वोटर अधिकार यात्रा के दौरान जमीन पर कांग्रेस खासतौर पर राहुल गांधी के लिए लगाव नजर आया। खासतौर से सीमांचल के इलाके में। लेकिन यदि आप नतीजों को देखें तो साल 2020 की तुलना में पार्टी का प्रदर्शन इस दफा बेहद खराब रहा। बिहार कांग्रेस के नेता खासतौर से सीमांचल के नेता चाहते थे कि असदुद्दीन ओवैसी(Asaduddin Owaisi) की पार्टी से समझौता हो जाए। लेकिन जमीन पर वो हो नहीं सका।
सीमांचल से आने वाले शकील अहमद खान कहीं न कहीं इसके लिए तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) को जिम्मेदार मानते हैं। हालांकि इस तरह की धारणा पर अशोक मिश्रा कहते हैं कि सियासत में कोई आपको स्पेस क्यों देगा। सत्ता की लड़ाई में जहां हर एक सीट अहम है उसे हासिल करने के लिए जो ताकतवर है वो वैसे दलों की मदद लेता है जो उसके लिए खतरा ना बने। अगर तेजस्वी यादव की पार्टी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही थी तो गलत भी था क्योंकि उनका ट्रैक रिकॉर्ड तो कांग्रेस से बेहतर था। देखिए, कांग्रेस के नेता इस बात को सिर्फ कहते हैं कि अब हमें अपने कार्यकर्ताओं के बारे में सोचना चाहिए, संगठन को मजबूत बनाना होगा। लेकिन जमीन पर क्या हुआ। देखा यह गया है कि एयर कंडीशन कमरे में बैठकर कांग्रेसी नेता बात तो बड़ी बड़ी करते हैं। लेकिन धरातल पर कुछ ठोस नजर नहीं आता।

