
नीतीश का 'पावर गेम', राज्यसभा की रेस में हरिवंश और रामनाथ ठाकुर के भविष्य पर सस्पेंस
बिहार की 5 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव में जेडीयू के कोटे की 2 सीटों पर पेच फंसा हुआ है। पार्टी के भीतर 'तीसरी पारी' ना देने की परंपरा को आगे बढ़ाने की रणनीति के बीच यह चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है।
Bihar Rajya Sabha Elections : बिहार में राज्यसभा की 5 सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने राज्य की सियासत में हलचल बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) के कोटे में 2 सीटें आनी तय मानी जा रही हैं। वर्तमान में इन सीटों पर राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह और केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर काबिज हैं, जिनका कार्यकाल अप्रैल में समाप्त हो रहा है। सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार अपने पुराने दिग्गजों को फिर से मौका देंगे या पार्टी में किसी नए चेहरे की एंट्री होगी? चर्चा है कि नीतीश की पार्टी से हरिवंश और रामनाथ ठाकुर में कोई एक ही वापस राज्यसभा लौटेगा, दूसरे को रिपीट करने का विचार नहीं है।
रामनाथ ठाकुर: अति-पिछड़ा कार्ड और 'स्पेशल केस'
जेडीयू में आमतौर पर किसी नेता को तीसरी बार राज्यसभा नहीं भेजने की परंपरा रही है। आरसीपी सिंह और वशिष्ठ नारायण सिंह जैसे कद्दावर नेता भी इस नियम के चलते तीसरी पारी से चूक गए थे। हालांकि, रामनाथ ठाकुर के मामले में समीकरण अलग हो सकते हैं। भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर के बेटे होने के नाते उनका कद पार्टी और राज्य की राजनीति में बहुत बड़ा है। नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग में अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) सबसे मजबूत स्तंभ है। ऐसे में माना जा रहा है कि 'किंग महेंद्रा' के नाम से मशहूर दवा उद्योग के बड़े नाम महेंद्र प्रसाद हैं, जिनको तीन बार मौका मिला। किंग महेंद्रा तो यहां तक कहते थे कि अगर जदयू के पास एक सीट भी होगी तो संसद वही जाएंगे। विधान परिषद में संजय गांधी और रामवचन राय को भी तीसरी पारी मिली है। ऐसे में की तरह रामनाथ ठाकुर को 'स्पेशल केस' मानकर तीसरी बार संसद भेजा जा सकता है।
हरिवंश नारायण सिंह: क्या कम हो गई है नीतीश से नजदीकी?
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह के लिए राह उतनी आसान नहीं दिख रही है। सूत्रों की मानें तो 2022 में जब नीतीश कुमार एनडीए छोड़कर महागठबंधन में गए थे, तब पार्टी के स्टैंड के विपरीत हरिवंश ने उपसभापति का पद नहीं छोड़ा था। हालांकि नीतीश अब वापस एनडीए में हैं, लेकिन पार्टी के भीतर एक धड़ा उन्हें जेडीयू से ज्यादा भाजपा का वफादार मानता है। चर्चा है कि इस बार उनकी जगह किसी और को मौका मिल सकता है।
मनीष वर्मा: नीतीश के नए 'भरोसेमंद' सारथी
इस चुनाव में जिस एक नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है, वह है मनीष वर्मा। पूर्व आईएएस अधिकारी मनीष वर्मा न केवल नीतीश कुमार के गृह जिले से आते हैं, बल्कि उनकी अपनी जाति (कुर्मी) से भी हैं। वर्तमान में जेडीयू के महासचिव मनीष वर्मा को पार्टी के जमीनी संचालन का जिम्मा सौंपा गया है। सियासी गलियारों में उन्हें नीतीश के 'उत्तराधिकारी' और आरसीपी सिंह के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि नीतीश उन्हें राज्यसभा भेजकर दिल्ली की राजनीति में अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहते हैं।
संजय झा और उपसभापति का समीकरण
पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा पहले से ही राज्यसभा में हैं और नीतीश के सबसे करीबी मंत्रियों में गिने जाते हैं। चर्चा यह भी है कि यदि हरिवंश को दोबारा मौका नहीं मिलता है, तो भाजपा की सहमति से संजय झा को राज्यसभा के उपसभापति पद की जिम्मेदारी दी जा सकती है। यदि ऐसा होता है, तो मनीष वर्मा के लिए राज्यसभा का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा।
नीतीश कुमार अपने फैसलों से हमेशा चौंकाते रहे हैं। चाहे वह अति-पिछड़ा कार्ड खेलकर रामनाथ ठाकुर को रिपीट करना हो या मनीष वर्मा जैसे ब्यूरोक्रेट को राजनीति के शीर्ष पर लाना, जेडीयू की यह नई 'सोशल इंजीनियरिंग' बिहार की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगी।

