मुंबई से सत्ता संकेत,बीजेपी ने बदला महाराष्ट्र की शहरी राजनीति का नक्शा
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मुंबई से सत्ता संकेत,बीजेपी ने बदला महाराष्ट्र की शहरी राजनीति का नक्शा

बीएमसी में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत ने मुंबई की राजनीति बदली। शहरी महाराष्ट्र में पहचान से विकास की ओर सत्ता संतुलन खिसकता नजर आया।


करीब तीन दशकों तक अविभाजित शिवसेना के अभेद्य किले माने जाने वाले बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में इस बार सत्ता की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने न सिर्फ बीएमसी चुनावों में निर्णायक बढ़त हासिल की, बल्कि पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे बड़े शहरी निकायों में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के दोनों गुटों शरद पवार और अजित पवार के गठबंधन को भी करारी शिकस्त दी है। यह नतीजे महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में एक बड़े राजनीतिक पुनर्संतुलन का संकेत देते हैं।

बीएमसी: शिवसेना के किले में सेंध

227 वार्डों वाली बीएमसी में बीजेपी ने 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने का गौरव हासिल किया। सहयोगी शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) ने 29 सीटें जीतकर महायुति को बहुमत के पार पहुंचाया। वहीं उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 65 सीटों से संतोष करना पड़ा। कांग्रेस-वंचित बहुजन आघाड़ी गठबंधन को 24 सीटें मिलीं, जबकि एमआईएम ने 8 सीटों के साथ शहरी मुस्लिम इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

114 सीटों के बहुमत के आंकड़े को पार करते हुए बीजेपी-नेतृत्व वाला महायुति गठबंधन अब देश की सबसे अमीर नगर पालिका बीएमसी पर शासन के लिए पूरी तरह तैयार है, जिसका 2025-26 का बजट 74,427 करोड़ रुपये का है।

‘मिशन मुंबई’ और फडणवीस फैक्टर

बीजेपी की इस जीत के केंद्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का नेतृत्व साफ दिखाई देता है। 2017 में 82 सीटों के अपने पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए बीजेपी ने इस बार शहरी मतदाताओं में अपनी स्वीकार्यता और बढ़ाई है। पार्टी का ‘मिशन मुंबई’ अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक वास्तविकता बन चुका है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस जीत को सुशासन और विकास के एजेंडे पर जनता की मुहर बताया। बीजेपी का दावा है कि मुंबई की राजनीति अब ‘मराठी अस्मिता’ की पहचान-आधारित राजनीति से आगे बढ़कर विकास और शहरी बुनियादी ढांचे के सवालों पर केंद्रित हो रही है।

शिंदे की शिवसेना की ताकत: ठाणे का संदेश

डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के गृह क्षेत्र ठाणे में उनकी शिवसेना ने 131 में से 75 सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की। बीजेपी को यहां 28 सीटें मिलीं। यह परिणाम संकेत देता है कि शिंदे गुट शहरी महाराष्ट्र में केवल सहयोगी नहीं, बल्कि एक प्रभावी राजनीतिक शक्ति बन चुका है।

पुणे, पिंपरी-चिंचवड़ और नागपुर: विपक्ष का बिखराव

पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में बीजेपी ने एनसीपी और एनसीपी (एसपी) के गठबंधन को लगभग हाशिए पर धकेल दिया। पुणे में बीजेपी ने 96 सीटें जीतीं, जबकि शरद पवार गुट केवल तीन सीटों तक सिमट गया। पिंपरी-चिंचवड़ में तो एनसीपी (एसपी) खाता भी नहीं खोल सकी। नागपुर,मुख्यमंत्री फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के गढ़ में बीजेपी ने 151 में से 102 सीटें जीतकर कांग्रेस को करारी शिकस्त दी।

कांग्रेस का शहरी पतन और AIMIM का उभार

बीएमसी समेत अधिकांश शहरी निकायों में कांग्रेस का प्रदर्शन ऐतिहासिक रूप से कमजोर रहा। मुंबई में पार्टी 10 प्रतिशत से भी कम सीटें जीत पाई। इसके उलट, असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने मुस्लिम बहुल वार्डों में उल्लेखनीय बढ़त बनाकर खुद को ‘डार्क हॉर्स’ के रूप में स्थापित किया है।

ठाकरे बंधुओं और पवार राजनीति की सीमा

चुनाव से पहले उद्धव और राज ठाकरे का दो दशक बाद साथ आना और पुणे में एनसीपी के दोनों गुटों का गठबंधन भी मतदाताओं को खास प्रभावित नहीं कर सका। इससे यह संकेत मिलता है कि केवल भावनात्मक या प्रतीकात्मक एकता शहरी मतदाताओं के लिए पर्याप्त नहीं रही।

शहरी महाराष्ट्र में नया राजनीतिक युग

इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर है। बीजेपी ने खुद को वित्तीय राजधानी मुंबई समेत 29 में से 25 नगर निगमों में सत्ता के केंद्र में स्थापित कर लिया है। यह जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि उस राजनीतिक बदलाव का संकेत है, जहां विकास, शहरी प्रशासन और स्थिर नेतृत्व को पहचान-आधारित राजनीति पर तरजीह दी जा रही है।

बीएमसी के नतीजे आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए भी दिशा तय करते नजर आ रहे हैं और फिलहाल, इस दिशा का केंद्र बीजेपी और महायुति गठबंधन है।

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