उत्तर बंगाल में गहराया संकट: 2026 चुनाव में BJP खो देगी अपना सबसे मजबूत गढ़?
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उत्तर बंगाल में गहराया संकट: 2026 चुनाव में BJP खो देगी अपना सबसे मजबूत गढ़?

उत्तर बंगाल, जो कभी भारतीय जनता पार्टी का सबसे मजबूत किला माना जाता था, अब 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले एक गंभीर राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है।


कई सालों तक बीजेपी ने उत्तर बंगाल में अपनी ताकत एक सीधी रणनीति पर बनाई। उसने गोरखा और राजबोंगशी समुदाय की अलग राज्य की मांग का समर्थन किया, उनका भरोसा जीता और चुनावी सीटें हासिल कीं। यह रणनीति 2021 में बेहद सफल रही, जब पार्टी ने 54 में से 30 विधानसभा सीटें जीत लीं। लेकिन 2026 के चुनाव नजदीक आते ही यह रणनीति कमजोर पड़ती दिख रही है। 19 फरवरी को कर्सियांग के विधायक बिष्णु प्रसाद शर्मा ने इस्तीफा देकर टीएमसी जॉइन कर ली। इसके साथ ही कामतापुर नेता जीबन सिंघा ने निर्दलीय उम्मीदवार उतारने की धमकी दी है। इससे साफ हो गया है कि कई समुदाय अब निराश हैं और उन्हें लगता है कि उनकी पुरानी मांगों पर सिर्फ वादे किए गए, ठोस काम नहीं हुआ।

डैमेज कंट्रोल में जुटी BJP

अब बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व स्थिति संभालने में जुटा है, लेकिन उत्तर बंगाल के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में लोगों का सब्र टूटता नजर आ रहा है। शर्मा के दल-बदल के बाद गोरखालैंड के मुद्दे पर भी सवाल फिर से उठने लगे हैं। बीजेपी 2009 के दार्जिलिंग लोकसभा चुनाव से लगातार गोरखालैंड का वादा दोहराती रही है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई बड़ा और ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इसी वजह से कई गोरखा संगठनों ने अलग राज्य की मांग को लेकर अपनी गतिविधियां और आंदोलन तेज कर दिए हैं।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ रिवोल्यूशनरी मार्क्सिस्ट (CPRM) ने 9-10 फरवरी को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया। पिछले कुछ हफ्तों में दार्जिलिंग की पहाड़ियों में भी इसी तरह के विरोध प्रदर्शन हुए हैं।

क्यों कमजोर पड़ रही है उत्तर बंगाल में बीजेपी की पकड़?

♦ बागी विधायक शर्मा ने अधूरे वादों के कारण टीएमसी जॉइन की

♦ 2009 से गोरखालैंड का वादा अब तक पूरा नहीं हुआ

♦ कामतापुर नेता ने निर्दलीय उम्मीदवार उतारने की धमकी दी

♦ एक प्रमुख राजबोंगशी सांसद ने वोटर लिस्ट संशोधन पर खुलकर सवाल उठाए

♦ जातीय समुदायों का बीजेपी पर से भरोसा कम हो रहा है

♦ दिल्ली की चुनाव से पहले की पहल को राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश माना जा रहा है

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने दार्जिलिंग हिल्स के लिए सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी और पूर्व डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर पंकज कुमार सिंह को वार्ताकार नियुक्त किया है। इसके बाद कई स्थानीय पार्टियों और पहाड़ी नेताओं ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां और तेज कर दी हैं।

पिछले महीने पहाड़ी इलाके में एक जनसभा आयोजित की गई, ताकि लंबे समय से चल रहे इस मुद्दे का समाधान जल्दी निकाला जा सके। इस दौरान गोरखा नेताओं ने केंद्र सरकार को ज्ञापन सौंपकर अलग गोरखालैंड राज्य बनाने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि अगर अलग राज्य संभव नहीं है, तो पूर्ण विधायी अधिकारों वाला केंद्र शासित प्रदेश (यूनियन टेरिटरी) बनाया जाए।

झूठे वादों का आरोप

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) के नेता बिमल गुरुंग और रोशन गिरी ने कहा कि उनकी मांग अलगाववादी नहीं है, बल्कि संविधान के संघीय ढांचे के तहत है। लेकिन बागी विधायक शर्मा ने केंद्र पर आरोप लगाया कि उसने 'स्थायी राजनीतिक समाधान' जैसे अस्पष्ट वादों से गोरखा समुदाय को गुमराह किया। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले की यह नई पहल भी एक और जुमला यानि की झूठा वादा है।

अनित थापा, जो भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (BGPM) के अध्यक्ष और गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) के मुख्य कार्यकारी हैं, ने वार्ताकार की हालिया यात्रा की आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह दौरा असली समाधान के लिए नहीं, बल्कि चुनाव से पहले राजनीतिक फायदा लेने के लिए किया गया है। उनका कहना है कि बिना ठोस वादों और स्पष्ट फैसलों के सिर्फ एक मध्यस्थ भेज देने से स्थानीय लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं होंगी।

मैदानी इलाकों में भी बढ़ी मुश्किल

असंतोष सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है। मैदानों में भी एक प्रभावशाली समुदाय बीजेपी को समर्थन देने पर फिर से सोचने का संकेत दे रहा है। बीजेपी के खिलाफ संभावित बगावत के तौर पर कामतापुर स्टेट डिमांड काउंसिल के प्रमुख जीबन सिंघा ने आगामी चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार उतारने की धमकी दी है। यह संगठन राजबोंगशी/कामतापुरी समुदाय को ज्यादा पहचान दिलाने के लिए आंदोलन चलाता है। सिंघा ने आरोप लगाया कि लगातार केंद्र की सरकारों ने प्रशासनिक स्वायत्तता और राजनीतिक पहचान की उनकी पुरानी मांगों को नजरअंदाज किया है। वह प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन कामतापुर लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (KLO) का प्रमुख भी है।

हालांकि जीबन सिंघा ने कभी खुलकर बीजेपी का समर्थन नहीं किया, लेकिन जनवरी 2023 में म्यांमार के जंगलों से लौटने के बाद से उन्हें पार्टी का परोक्ष समर्थक माना जाता रहा है। उस समय वह और उनके कुछ साथी केंद्र सरकार की पहल पर शांति वार्ता में शामिल होने के लिए भारत आए थे।

राजनीतिक विरोधी, खासकर टीएमसी, उन्हें अक्सर 'बीजेपी का मोहरा' बताते रहे हैं। उनका कहना है कि सिंघा के बयान देने का समय और उनका लहजा अक्सर उत्तर बंगाल में बीजेपी की रणनीति से मेल खाता है।

सिलीगुड़ी के राजनीतिक विश्लेषक प्रबीर प्रमाणिक, जो पिछले तीन दशकों से इस क्षेत्र की राजनीति पर नजर रख रहे हैं, कहते हैं कि अगर सिंघा चुनाव में उम्मीदवार उतारते हैं तो इससे कोच-राजबोंगशी वोट बैंक पर बीजेपी की पकड़ कमजोर हो सकती है।

राजबोंगशी बागी

बीजेपी के लिए यह चिंता बढ़ गई क्योंकि इसी समय पार्टी के सबसे प्रमुख राजबोंगशी नेता और राज्यसभा सांसद अनंत महाराज ने पार्टी के लिए असंतोष व्यक्त करना शुरू कर दिया है। यह असंतोष विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन (SIR) के दौरान सामने आया। उन्होंने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया की खुले तौर पर आलोचना की, यह दावा करते हुए कि चुनाव अधिकारियों की गलती के कारण असली मतदाता परेशान हो रहे हैं और आम लोग 'ECI की गलतियों की कीमत चुका रहे हैं।'

हाल ही में सीताई, कुच बिहार में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनके समुदाय के लोगों को विदेशियों की तरह देखा जा रहा है, तो देश के शीर्ष नेताओं को भी विदेशी कहा जा सकता है। अपने बयान में उन्होंने चुनौतीपूर्ण अंदाज में कहा कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री 'बांग्लादेशी'हैं, और उन्होंने यह तर्क दिया कि अगर लंबे समय से रहने वाले लोगों को अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ रही है, तो नियम लागू करने वालों की नागरिकता भी इसी आधार पर सवालों के घेरे में हो सकती है।

चुनावी स्थिति पर असर

बीजेपी की उत्तर बंगाल में रणनीति मुख्य रूप से राजबोंगशी/कामतापुरी और गोरखा/नेपाली समुदायों की जातीय और भाषाई आकांक्षाओं पर आधारित रही है। इन समुदायों की लंबी शिकायतें हैं, जैसे सांस्कृतिक मान्यता का अभाव, आर्थिक हाशिए पर रहना और क्षेत्रीय स्वायत्तता की मांग।

सिलीगुड़ी के राजनीतिक विश्लेषक प्रबीर प्रमाणिक ने कहा कि जब इन आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया गया, तो स्थानीय नेताओं का बीजेपी पर भरोसा कम हो गया। उनका कहना है कि गोरखा और राजबोंगशी समुदायों में राजनीतिक मांगों के न पूरे होने के कारण बढ़ती असंतोष की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। इस असंतोष का बीजेपी के लिए चुनावी महत्व बहुत बड़ा है।

2021 में बीजेपी ने उत्तर बंगाल की 54 विधानसभा सीटों में से 30 जीत लीं, और इसमें इन दोनों समुदायों के समर्थन का बड़ा योगदान था। राजबोंगशी, जो राज्य की सबसे बड़ी अनुसूचित जाति समुदाय है, अनुमानित रूप से उत्तर बंगाल के पांच जिलों में करीब 20 विधानसभा क्षेत्रों पर प्रभाव डालती है। वहीं, गोरखा और अन्य नेपाली भाषी समुदाय तीन पहाड़ी सीटों में बहुमत रखते हैं और कम से कम 17 अन्य विधानसभा क्षेत्रों के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। इस असंतोष को नियंत्रित करने के लिए, नई दिल्ली अब नाराज समूहों को मनाने की कोशिश में लगी है।

बीजेपी ने शुरू की कोशिश

कई अधिकारियों ने The Federal को बताया कि गृह मंत्रालय ने अपने संदेश के जरिए जीबन सिंघा को 25 फरवरी को दिल्ली में शांति वार्ता के लिए आमंत्रित किया है। इस बैठक में मंत्रालय के उत्तर-पूर्व मामलों के सलाहकार अजीत लाल, जो सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं, भी शामिल होंगे। इस बैठक का उद्देश्य विधानसभा चुनाव से पहले परिषद की मुख्य मांगों पर रोडमैप तय करना है। बैठक से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस कदम से केंद्र की यह चिंता साफ दिखती है कि अगर सिंघा के साथ संबंध बिगड़ गए, तो उत्तर बंगाल की चुनावी राजनीति जटिल हो सकती है। साथ ही इस महीने गोरखा नेताओं के साथ भी इसी तरह की बातचीत की योजना बनाई जा रही है, सूत्रों ने बताया।

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