
BMC नतीजे ने शिवसेना (UBT) को दिया झटका! लेकिन ‘ब्रांड ठाकरे’ मुंबई में बरकरार
बीएमसी पर नियंत्रण खोने से पार्टी को अब सीमित संसाधनों और कम प्रभाव के साथ काम करना होगा। मुंबई का सामाजिक और चुनावी परिदृश्य बदल रहा है, जिससे राजनीतिक सक्रियता और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है।
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के चुनाव परिणाम ने उद्धव ठाकरे और उनके नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। इस नतीजे के साथ ही पार्टी की भारत के सबसे अमीर नगर निगम पर 25 साल से अधिक की सत्ता की स्थिति समाप्त हो गई। बीएमसी पर नियंत्रण लंबे समय से शिवसेना की मुंबई में राजनीतिक पकड़ का आधार रहा है। यह सत्ता उन्हें केवल प्रशासनिक ताकत ही नहीं, बल्कि संगठनात्मक संसाधन भी देता था, जिससे पार्टी अपनी शक्ति और नेटवर्क को मजबूत बनाए रखती थी।
उद्धव ठाकरे की रणनीति
भले ही पार्टी ने वित्तीय और संगठनात्मक कठिनाइयों का सामना किया, उद्धव ठाकरे ने अपनी रणनीति का केंद्र मुंबई रखा। शिवसेना (UBT) ने मराठी पहचान पर जोर दिया, मराठी लोगों के लिए लक्षित कल्याण योजनाओं का वादा किया और लंबे समय से चले आ रहे स्थानीय नेटवर्क का सहारा लिया। राज ठाकरे के साथ संबंध सुधारने का कदम विशेष रणनीति के तहत उठाया गया, ताकि मराठी वोट बंटने से रोका जा सके। इन प्रयासों ने पार्टी को दक्षिण और केंद्रीय मुंबई के कुछ इलाक़ों में पकड़ बनाए रखने में मदद की, जैसे दादर और बायकुल्ला, लेकिन ये प्रयास बीएमसी पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
बीएमसी नतीजे: सीटों का आंकड़ा
शिवसेना (UBT): 65 सीटें
बीजेपी: आगे, लेकिन अकेले बहुमत नहीं
शिंदे गुट: 29 सीटें
यद्यपि शिवसेना (UBT) पूरी तरह से हार से बच गई, लेकिन बीजेपी अकेले बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाई। इसके बावजूद मुंबई में उद्धव ठाकरे का राजनीतिक महत्व बरकरार है। शिंदे गुट भले ही 29 सीटें जीत गया हो, लेकिन उसने ठाकरे की शहर में पकड़ को पार नहीं किया।
उद्धव और राज ठाकरे का रिएक्शन
उद्धव ठाकरे ने बीएमसी नतीजों के बाद कहा कि महाराष्ट्र में मराठी समुदाय को सम्मान मिलने तक लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने X पर लिखा कि संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। राज ठाकरे ने भी इसी भावना को दोहराया और हार का कारण महायुति की वित्तीय और संस्थागत ताकत को बताया। उन्होंने कहा कि MNS मराठी लोगों की भाषा, पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखेगी।
मराठी वोटर आधार की सीमाएं
मुंबई आधारित राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे का कहना है कि बीएमसी चुनावों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि “ब्रांड ठाकरे” अभी भी मुंबई में प्रभावशाली है। उन्होंने कहा कि शिंदे गुट ने पार्टी को तोड़ा और ठाकरे के अधिकांश विधायक अपने साथ ले गए, तथा शिवसेना (UBT) ने महाराष्ट्र में भारी नुकसान झेला, फिर भी मुंबई में मराठी वोटों का समेकन ठाकरे पक्ष में रहा। हालांकि, देशपांडे ने यह भी बताया कि केवल मराठी पहचान पर आधारित राजनीति पर्याप्त नहीं है। मराठी वोट एकजुट होने के बावजूद बीएमसी पर कब्ज़ा करने के लिए जरूरी संख्या नहीं मिली। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस के बजाय MNS के साथ गठबंधन किया गया होता तो परिणाम बदल सकते थे।
आने वाली चुनौतियां
देशपांडे के अनुसार, उद्धव ठाकरे को दो बड़ी चुनौतियों का सामना करना होगा:-
1. अंदरूनी टूट को रोकना: बीजेपी लगातार नेताओं को लुभा रही है।
2. सामाजिक आधार का विस्तार: पारंपरिक मराठी वोटर से बाहर जाकर अन्य समुदायों और अल्पसंख्यकों तक पहुंच बढ़ाना।
मुंबई से बाहर शिवसेना (UBT) का प्रदर्शन कमजोर रहा। ठाणे में केवल 1 सीट, नवमुंबई और पनवेल में खराब प्रदर्शन ने चुनौती की गंभीरता को दिखाया। वरिष्ठ पत्रकार मृणालिनी नानीवडेकर का कहना है कि यह समय पीढ़ीगत बदलाव का है। आदित्य ठाकरे को पिता के साये से बाहर निकलकर पूरे महाराष्ट्र में पार्टी को मजबूत करना होगा। अगर ऐसा हुआ तो 2029 विधानसभा चुनावों में शिवसेना (UBT) फिर से बड़ी ताकत बन सकती है।
बीएमसी के बिना नई राजनीति
बीएमसी पर नियंत्रण खोने से पार्टी को अब सीमित संसाधनों और कम प्रभाव के साथ काम करना होगा। मुंबई का सामाजिक और चुनावी परिदृश्य बदल रहा है, जिससे राजनीतिक सक्रियता और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। बीएमसी में कांग्रेस के सबसे कम सीटों के साथ, उद्धव ठाकरे अब शहर में मुख्य विपक्षी आवाज बन गए हैं। बीएमसी नतीजे केवल हार या जीत नहीं, बल्कि पुनर्गणना और रणनीति की नई शुरुआत हैं। उद्धव ठाकरे अब भी शिवसेना की राजनीतिक विरासत को बनाए रखने और भविष्य के लिए आधार बनाने में सक्षम हैं।

