BMC Election: मराठी अस्मिता का दांव पड़ा उलटा? ठाकरे ब्रदर्स को झटका
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BMC Election: मराठी अस्मिता का दांव पड़ा उलटा? ठाकरे ब्रदर्स को झटका

बीएमसी चुनाव रुझानों में महायुति बहुमत के पार है। मराठी अस्मिता और परप्रांतीय विरोध का दांव ठाकरे परिवार के लिए उलटा पड़ता दिख रहा है।


BMC Election Results 2026: सियासत में कभी किसी को खारिज नहीं किया जा सकता है। ऐसा नहीं होता है कि जिस शख्स या दल का वर्तमान खराब हो उसका भविष्य अच्छा नहीं होगा और जिसके सितारे गर्दिश में हों वो कभी बुलंदियों पर नहीं पहुंचेगा। सियासत बहते पानी की तरह है। धारा के खिलाफ गए तो किनारे लग गए और धारा के साथ बहे तो सत्ता की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुंचे। महाराष्ट्र में बीएमसी (BMC Elections result 2026) समेत 29 नगर निकायों के लिए मतगणना जारी है। वैसे तो सियासी पंडितों की निगाह हर एक निकाय पर है। लेकिन चर्चा के केंद्र में बीएमसी है। अब तक आए रुझानों के हिसाब से महायुति यानी बीजेपी गठबंधन ने 227 पार्षद सीटों में से 115 पर बढ़त बनाने में कामयाब हुई है यानी कि बहुमत के आंकड़े से आगे निकल गई है। वहीं शिवसेना यूबीटी और महाराष्ट्र निर्माण सेना पीछे है। ऐसे में क्या ठाकरे परिवार की चमक और दमक मुंबई में फीकी पड़ चुकी है।

बीएमसी चुनाव नतीजे/रुझान 2026

कुल सीटें- 227

बीजेपी-90

शिवसेना- 28

शिवसेना यूबीटी- 63

एनसीपी अजित पवार- 0

एनसीपी- शरद पवार- 0

कांग्रेस- 12

एमएनएस-6

बीएमसी चुनाव के रुझानों और नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए शिंदे सेना की नेता शाइना एनसी ने कहा कि ने कहा कि ठाकरे भाई अब घर पर ही रहें, वर्क फ्रॉम होम करें। अब मुंबई की जनता भी ठाकरे भाइयों की पुरानी स्क्रिप्ट से तंग आ चुकी है। अब उन्हें अपनी स्क्रिप्ट बदलने की जरूरत है।

महाराष्ट्र में जब नगर निकाय चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान हुआ तो सबकी नजर इस बात पर टिकी क्या महाविकास अघाड़ी के सभी दल ताल ठोकेंगे। लेकिन घटक दलों की राह जुदा हो गई। शिवसेना यूबीटी (Shivsena UBT) और एनसीपी शरद पवार (NCP Sharad Pawar) गुट एक साथ आए लेकिन कांग्रेस ने अलग अलग रास्ते को चुना। हालांकि ठाकरे परिवार यानी कि उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) और राज ठाकरे (Raj Thackeray) एक साथ आने का फैसला किया और दोनों ने साथ मिलकर किस्मत आजमाई।

पारंपरिक तौर पर बीएमसी शिवसेना का गढ़ रहा है। कांग्रेस (Congress) या दूसरे दलों की दाल नहीं गली। अविभाजित शिवसेना और बीजेपी हर एक चुनाव में कांग्रेस को मात देते रहे। लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में चार बड़े बदलाव भी हुए। मसलन उत्तराधिकारी के मुद्दे पर राज ठाकरे अलग हुए और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) का गठन किया, वहीं शिवसेना के भी दो धड़े हुए। पहला धड़ा शिवसेना (उद्धव बाला साहेब ठाकरे गुट) और दूसरा शिवसेना (शिंदे)। इसके साथ ही एनसीपी भी दो हिस्सों में शरद पवार (Sharad Pawar) और अजित पवार (Ajit Pawar) गुट में टूट गई। अगर इन रुझानों को ही आखिरी नतीजे के तौर पर देखा जाए तो एक बात साफ है कि ठाकरे परिवार का महाराष्ट्र के साथ साथ मुंबई में भी कम होता जा रहा है।

रुझानों के मुताबिक शिवसेना यूबीटी गुट 63, एमएनएस 9 सीटों पर आगे या जीत दर्ज कर चुकी है। सवाल यह है कि बीएमसी में इस प्रदर्शन के पीछे क्या राज ठाकरे की बोली जिम्मेदार है। इस सवाल के जवाब में सियासी जानकार कहते हैं कि उद्धव ठाकरे ने जब वैचारिक तौर पर खुद को बीजेपी से अलग किया उसके बाद से उद्धव ठाकरे की ताकत में कमी आने लगी। महाराष्ट्र की जनता ने यह माना कि सत्ता के लिए उद्धव ने सिद्धांतों से समझौता कर लिया। उसके बाद रही सही कसर एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) की बगावत ने कर दी।

शिंदे की बगावत की वजह से मुंबई और उसके अगल बगल वाले इलाके में जमीनी स्तर पर ताकत कमजोर पड़ती गई क्योंकि मुंबई पालघर इलाके में एकनाथ शिंदे मजबूत स्तंभ थे। इन सबके बीच सबकी निगाह इस बात पर टिकी थी कि क्या राज ठाकरे जिन्होंने बाला साहेब ठाकरे से बगावत कर अलग राह चुनी वो उद्धव ठाकरे की मदद कर पाएंगे। लेकिन रुझान और नतीजे अलग ही कहानी बयान कर रहे हैं। जिस तरह से 11 जनवरी की रैली में राज ठाकरे ने परप्रांतियों के खिलाफ जहर उगला था उसका खामियाजा उद्धव ठाकरे को भुगतना पड़ा।

सबसे पहले तो यह जानिए कि राज ठाकरे ने परप्रांतियों खासतौर से यूपी और बिहार के लोगों के लिए किस भाषा का इस्तेमाल किया था। राज ठाकरे ने कहा था कि यूपी और बिहार के लोगों को समझना चाहिए कि हिंदी आपकी भाषा नहीं है। मुझे भाषा से कोई नफरत नहीं है। लेकिन अगर इसे थोपने की कोशिश करेंगे तो मैं आपको लात मारूंगा। उनके इस बयान पर भीड़ ने जोरदार तालियां बजाईं। हिंदी भाषियों पर हमला करते हुए एमएनएस मुखिया राज ठाकरे ने कहा था कि वे हर तरफ से महाराष्ट्र आ रहे हैं और आपका हिस्सा छीन रहे हैं। अगर जमीन और भाषा चली गई तो आप खत्म हो जाएंगे। बीएमी चुनाव मराठियों के लिए आखिरी चुनाव है। अगर आज यह मौका गंवा दिया तो आप खत्म हो जाएंगे। मराठी और महाराष्ट्र के लिए एकजुट हों। लेकिन सियासी तौर उनकी यह भाषा बैकफायर कर गई। अगर आप महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के रिकॉर्ड को भी देखें तो महाराष्ट्र की जनता ने उनकी भाषा को स्वीकार भी नहीं किया। एमएनएस के जन्म यानी कि साल 2006 से देखें तो राज ठाकरे विकल्प नहीं बन सके।

अगर आप मुंबई में हिंदी भाषी वोटर्स को देखें तो यह संख्या 50 फीसद के करीब है। इसका अर्थ यह हुआ कि इतनी बड़ी वोटर्स संख्या को कोई भी दल नकार नहीं सकता। अब शिवसेना की सियासत मोटे तौर पर परप्रांतीय विरोध की रही है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे को लगा कि मराठी अस्मिता का कार्ड खेलकर वो बीएमसी में जीत दर्ज कर सकते हैं। लेकिन व्यवहारिक तौर पर वो इस बात को भूल गए कि हिंदी भाषियों के खिलाफ जितनी तकरीर करेंगे या मराठावाद का भय दिखाएंगे उसका फायदा बीजेपी (BJP) उठाएगी और रुझानों से पता चल रहा है कि ठाकरे बंधुओं ने हिंदी भाषियों का जो भय दिखाया वो दांव उलटा पड़ गया।

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