
सम्मान की सियासत में उलझा यूपी का ब्राह्मण वोट,बटुक पूजन से रैलियों तक
मिशन 2027 से पहले यूपी में ब्राह्मण वोट को लेकर सियासत तेज है, बटुक पूजन, रैलियां और सम्मान की राजनीति के बीच सभी दल साधने में जुटे हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘प्रबुद्ध वर्ग’ यानी ब्राह्मण समुदाय को लंबे समय से सत्ता की चाबी माना जाता रहा है। करीब 12 से 13 प्रतिशत आबादी वाला यह वर्ग चुनावी गणित में निर्णायक भूमिका निभाता है। मिशन 2027 से पहले सूबे की राजनीति में एक बार फिर ब्राह्मण वोटों को लेकर घमासान तेज हो गया है। हालिया शिखा विवाद के बाद शुरू हुई बहस अब पूजन, रैलियों और सम्मान सम्मेलनों तक पहुंच चुकी है।
ब्रजेश पाठक का ‘बटुक पूजन’ और डैमेज कंट्रोल
सियासत की ताजा हलचल की शुरुआत डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने प्रयागराज के माघ मेले में ब्राह्मण बटुकों की शिखा खींचे जाने की घटना को महापाप बताया। भाजपा में ब्राह्मण चेहरे के तौर पर देखे जाने वाले पाठक ने इसके बाद अपने सरकारी आवास पर बटुकों को आमंत्रित कर विधि-विधान से पूजन किया, उनके पैर पखारे और आशीर्वाद लिया।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह कदम प्रयागराज की घटना के बाद ब्राह्मण समाज में पनपे असंतोष को शांत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि ब्राह्मण सम्मान उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है।
ओम प्रकाश राजभर का ‘प्रबुद्ध’ कार्ड
डिप्टी सीएम के इस कदम के तुरंत बाद सुभासपा प्रमुख और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी बड़ा दांव खेला। आजमगढ़ में आयोजित ‘सामाजिक समरसता रैली’ के लिए उन्होंने दस हजार प्रबुद्ध ब्राह्मणों को विशेष निमंत्रण दिया है।
राजभर का यह कदम संकेत देता है कि वे खुद को सिर्फ पिछड़ा वर्ग की राजनीति तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि सवर्ण समाज खासतौर पर ब्राह्मणों के बीच भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहते हैं। सपा के गढ़ माने जाने वाले इलाके में यह रणनीति राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है।
मायावती और 2007 का ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूला
बसपा प्रमुख मायावती भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। उन्होंने ब्राह्मणों से खुलकर समर्थन की अपील की है और भरोसा दिलाया है कि उनके शासनकाल में ब्राह्मणों का सम्मान सुरक्षित रहेगा। 2007 में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के सहारे पूर्ण बहुमत हासिल करने का उदाहरण देते हुए वे एक बार फिर उसी सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को जीवित करने की कोशिश कर रही हैं। मायावती के करीबी नेताओं के जरिए ब्राह्मण समाज को जोड़ने की रणनीति पर काम तेज हो गया है।
अखिलेश यादव का हमला
वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार राज्य सरकार पर ब्राह्मणों के अपमान और उत्पीड़न का आरोप लगा रहे हैं। वे पूर्वांचल के कद्दावर नेता रहे हरिशंकर तिवारी के गोरखपुर स्थित आवास ‘हाता’ का जिक्र करते हुए कहते हैं कि मौजूदा सरकार को ‘हाता’ नहीं भाता।
अखिलेश यादव विकास दुबे एनकाउंटर समेत कई घटनाओं का हवाला देकर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा शासन में ब्राह्मण उपेक्षित और असुरक्षित हैं।
अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा
ब्राह्मण अस्मिता की इस बहस को नया मोड़ तब मिला जब बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट और वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने ब्राह्मण सम्मान और स्वाभिमान के मुद्दे पर नई राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया। एक प्रशासनिक अधिकारी का इस तरह सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि यह मुद्दा केवल चुनावी बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी गहरी हलचल पैदा कर रहा है।
निर्णायक होगा ब्राह्मण रुख
कुल मिलाकर, यूपी की राजनीति में ब्राह्मण वोट एक बार फिर केंद्र में है। पूजन, रैलियों के न्योते, सम्मान के वादे और आरोप-प्रत्यारोप के बीच सभी दल इस समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में जुटे हैं। अब सवाल यह है कि ब्राह्मण समाज प्रतीकात्मक सम्मान और राजनीतिक आश्वासनों के बीच किसे अपना भरोसा सौंपता है। मिशन 2027 की राह में यह फैसला कई दलों की सियासी दिशा तय कर सकता है।

