क्या 2007 का सोशल इंजीनियरिंग मॉडल फिर चलेगा, मायावती का भरोसेमंद दांव
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क्या 2007 का सोशल इंजीनियरिंग मॉडल फिर चलेगा, मायावती का भरोसेमंद दांव

2027 चुनाव से पहले बीएसपी ने सतीश मिश्रा और उमाशंकर सिंह के सहारे 2007 के सामाजिक समीकरण को फिर आज़माने का संकेत दिया है।


देश के सबसे बड़े सूबे में से एक उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है। लेकिन सियासी दलों की तरकश से तीर निकलने शुरू हो चुके हैं। एक तरफ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार योगी आदित्यनाथ सरकार पर निशान साध रहे हैं तो बीएसपी भी पीछे नहीं है। यह बात अलग है कि 2012 के बाद से ही बहुजन समाज पार्टी का ग्राफ सूबे में घटता गया। हालांकि 2019 आम चुनाव को अपवाद के तौर पर देखा जा सकता है जब मायवती की पार्टी से समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनावी संग्राम में कूदने का फैसला किया और उनकी झोली में 10 सीटें भी आईं।

यह बात अलग है कि 2019 के बाद ग्राफ ऐसे गिरा कि लोकसभा में बीएसपी का एक भी सांसद नहीं है। विधानसभा में एक मात्र विधायक उमाशंकर सिंह है। ऐसे में 2027 में बीएसपी जमीनी स्तर पर कितना बेहतर कर सकेगी आप भी अंदाजा लगा सकते हैं। लेकिन सियासत के बारे में कहा जा सकता है कि यह असंभावनाओं का खेल है। जिसे आप जमीनी हकीकत से दूर समझते हैं वो हकीकत में तब्दील हो जाता है। इन सबके बीच बीएसपी ने कमर कस ली है और इसकी कमान अपने भतीजे आकाश आनंद, सतीश चंद्र मिश्रा और उमाशंकर सिंह को दी है।

सवाल यह है कि सतीश चंद्र मिश्रा और उमाशंकर सिंह को जिम्मेदारी देकर मायावती किसे संदेश दे रही हैं। उससे पहले आपको बताएंगे कि सतीश चंद्र मिश्रा और उमाशंकर सिंह कौन हैं। सतीश चंद्र मिश्रा पेशे से वकील रहे हैं और सियासत में किस्मत आजमाने के लिए बीएसपी के साथ हो लिए। सतीश चंद्र मिश्रा को सर्वजन की संकल्पना का जनक माना जाता है। अगर बीएसपी की राजनीति को देखें तो 1984 से लेकर 2007 तक पार्टी बहुजन के नारे के साथ आगे बढ़ी। पार्टी को कामयाबी भी मिली, मायावती यूपी की सीएम भी बनीं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह भी थी कि वो अपने दम पर 2007 से पहले कभी सरकार नहीं बना सकीं।

2007 में जब पार्टी ने खुद को बहुजन से सर्वजन की तरफ आगे बढ़ने का फैसला किया तो उसका फायदा भी मिला। बीएसपी पहली बार अपने दम पर सरकार बनाने में कामयाब हुई। इस कामयाबी का श्रेय सतीश चंद्र मिश्रा को दिया गया। यदि सतीश चंद्र मिश्रा को कामयाबी का श्रेय दिया गया तो उसके पीछे वजह भी थी। सतीश चंद्र मिश्रा ने ब्राह्मण दलित भाईचारा सम्मेलन की एक लंबी श्रंखला चलाई और उसका फायदा यह हुआ कि बीएसपी के सामाजिक आधार में विस्तार हुआ। करीब 21 फीसद दलित आबादी और करीब 10 फीसद ब्राह्मणों के मेल से 31 फीसद का आधार वोटबैंक मायावती को मिला और यूपी में हाथी ने सबको रौंद दिया।

अब जिस तरह से पिछले 9 साल के कार्यकाल में योगी सरकार पर ब्राह्नण विरोध का ठप्पा लगा है उसमें बीएसपी को खुद के लिए एक बेहतर कल नजर आ रहा है। सियासत के जानकार कहते हैं कि कुछ लोग यह कह सकते हैं कि अगर सतीश चंद्र मिश्रा इतने बड़े चाणक्य थे, ब्राह्मण मतों पर प्रभाव था तो साल 2012, 2014, 2017, 2019, 2022 और 2024 में पार्टी को क्यों नहीं जिता सके। इस सवाल के जवाब में जानकार कहते हैं कि दरअसल सियासी नफा नुकसान सिर्फ अंकगणित पर आधारित नहीं होता इसमें कैमिस्ट्री की भूमिका होती है।

2007 में मुलायम सिंह यादव के खिलाफ नाराजगी और जमीन पर सामाजिक समीकरण बीएसपी के पक्ष में पूरी तरह काम कर गया क्योंकि बीजेपी उस वक्त वेंटीलेटर पर थी। अगर मौजूदा समय की बात करें तो समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती है, बीजेपी के खिलाफ माहौल बन रहा है ऐसे में मायावती को लगता है कि 2007 के फॉर्मूले को फिर अपनाया जा सकता है जिसमें सतीश चंद्र मिश्रा की भूमिका थी।

सतीश चंद्र मिश्रा के बाद अब बात करेंगे उमाशंकर सिंह की। उमाशंकर सिंह का नाता पूर्वी यूपी से है और इस समय बलिया के रसड़ा से विधायक हैं। उमाशंकर सिंह, ठाकुर समाज से आते हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत है कि जब बीएसपी के एक भी विधायक विधानसभा की दहलीज तक नहीं पहुंच सके तो इन्होंने अपनी जगह बनाई।

यूपी की सियासत पर नजर रखने वाले कहते हैं कि यह बात सच है कि उमाशंकर सिंह को कामयाबी मिलती रही है लेकिन वो ठाकुरों के नेता नहीं है। इन सबके बीच जमीनी स्तर पर अगर मायावती ने इनके नाम का चयन किया है तो उसके पीछे ठाकुर समाज को संदेश देने की कोशिश हो सकती है कि बीएसपी सर्वसमाज की भावना में यकीन करती है। अगर इसे अंकगणित के नजरिए से देखें तो यूपी में दलित समाज की आबादी 21 फीसद, ब्राह्मण समाज की आबादी करीब 10 फीसद और ठाकुर समाज की आबादी करीब सात फीसद है और यह आंकड़ा 38 फीसद के करीब है। अगर इस वोटबैंक को वो साधने में कामयाब होती हैं तो मुस्लिम समाज जो आमतौर पर टैक्टिकल वोटिंग करता है वो बीजेपी के खिलाफ जा सकता है।

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