Bengal Election: स्कूलों में CAPF का कब्जा, पढ़ाई ठप होने से छात्र परेशान
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Bengal Election: स्कूलों में CAPF का कब्जा, पढ़ाई ठप होने से छात्र परेशान

स्कूल कैंपस के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल CAPF के रहने के लिए किया जा रहा है, जिससे रेगुलर क्लास में रुकावट आ रही है, हाइब्रिड लर्निंग को मजबूर किया जा रहा है, और टीचरों और पेरेंट्स के बीच गंभीर चिंताएँ बढ़ रही हैं।


West Bengal Upcoming Election : पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बिगुल बजने से पहले ही राज्य की शैक्षणिक व्यवस्था एक बड़े संकट के मुहाने पर खड़ी हो गई है। राज्य में चुनावी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) का आगमन शुरू हो चुका है, लेकिन उनके ठहरने की व्यवस्था ने स्कूलों के सामान्य कामकाज को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। कई शैक्षणिक संस्थानों को सुरक्षाकर्मियों को ठहराने के लिए अपनी नियमित कक्षाएं निलंबित करने पर मजबूर होना पड़ा है। दक्षिण 24 परगना जिले का भांगड़ इलाका, जो अपनी राजनीतिक संवेदनशीलता और चुनावी हिंसा के इतिहास के लिए जाना जाता है, वहाँ स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। यहाँ कम से कम दो बड़े स्कूलों में पढ़ाई पूरी तरह बंद हो गई है क्योंकि परिसर अब सुरक्षा बलों के नियंत्रण में हैं। 'रिफ्यूजी कॉलोनी गवर्नमेंट प्राइमरी स्कूल' और 'पोलेरहाट हाई स्कूल' को अस्थायी छावनियों में तब्दील कर दिया गया है। अभिभावकों और शिक्षकों का कहना है कि एक तरफ निष्पक्ष चुनाव की तैयारी हो रही है, तो दूसरी तरफ बच्चों के मौलिक अधिकार 'शिक्षा' के साथ समझौता किया जा रहा है।


भांगर के स्कूलों पर पड़ा चुनावी ड्यूटी का सबसे बड़ा बोझ
दक्षिण 24 परगना के भांगर विधानसभा क्षेत्र में चुनावी हिंसा रोकने के लिए सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई है। 'रिफ्यूजी कॉलोनी गवर्नमेंट प्राइमरी स्कूल' की मुख्य अध्यापिका मानसी कुंडू ने अत्यंत निराशा के साथ बताया कि 2 मार्च से ही स्कूल की तमाम शैक्षणिक गतिविधियां निलंबित कर दी गई हैं। स्कूल परिसर में सुरक्षा बलों की एक बड़ी टुकड़ी रुकी हुई है, जिसके कारण छोटे बच्चों के लिए स्कूल आना असंभव हो गया है।

यही हाल पड़ोस के 'पोलेरहाट हाई स्कूल' का भी है। यहाँ के प्रधानाध्यापक संदीप सरकार ने बताया कि उनके स्कूल में छात्रों की संख्या लगभग 4,600 है। इतनी बड़ी छात्र संख्या के बावजूद, स्कूल के 11 महत्वपूर्ण क्लासरूम सुरक्षा बलों को आवंटित कर दिए गए हैं। संदीप सरकार ने कहा, "इतने सारे कमरों के ब्लॉक होने के बाद हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचा था। अब हम ऑफलाइन और ऑनलाइन व्यवस्था के मिश्रण यानी 'हाइब्रिड मोड' के जरिए किसी तरह पढ़ाई खींचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह नाकाफी है।"

मुर्शिदाबाद और कोलकाता में भी स्थिति गंभीर
राज्य के अन्य हिस्सों से भी इसी तरह की विघटनकारी खबरें आ रही हैं। मुर्शिदाबाद जिले के समसेरगंज ब्लॉक में स्थित 'जॉयकृष्णपुर एबीएस विद्यापीठ' (उच्च माध्यमिक विद्यालय) के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि स्कूल की मुख्य इमारत को केंद्रीय बलों की एक कंपनी को ठहराने के लिए अधिग्रहित (Requisitioned) कर लिया गया है। इस फैसले ने सैकड़ों छात्रों की नियमित पढ़ाई पर ब्रेक लगा दिया है।

प्रधानाध्यापक हुमायूं अली ने बताया कि उन्हें अनौपचारिक रूप से संकेत दिया गया है कि सुरक्षा बल चुनाव प्रक्रिया के अंत तक, यानी अगले ढाई से तीन महीने तक स्कूल परिसर में बने रह सकते हैं। हुमायूं अली ने चिंता जताते हुए कहा, "हमने अप्रैल में कक्षा 5 से 10 तक की परीक्षाएं आयोजित करने की योजना बनाई थी, लेकिन अब पूरा शेड्यूल अनिश्चितता के घेरे में है। विडंबना यह है कि प्रमुख परीक्षाओं के संपन्न होने से पहले ही सुरक्षा बलों को ठहराने की तैयारी शुरू कर दी गई थी।"

मध्य कोलकाता के 'सेंट पीटर्स स्कूल' ने भी सुरक्षा बलों के कब्जे के कारण अपना रूटीन संशोधित कर दिया है। यहाँ कैंपस के एक हिस्से पर कब्जा होने के बाद स्कूल अब सप्ताह में केवल तीन दिन ही कक्षाएं संचालित कर पा रहा है।

अभिभावकों की चिंता और 'डिजिटल डिवाइड' का संकट
अभिभावकों का कहना है कि पढ़ाई पहले से ही प्रभावित थी क्योंकि कई शिक्षकों को मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य के लिए बूथ स्तर के अधिकारी (BLO) के रूप में तैनात किया गया था। अब स्कूलों के अधिग्रहण ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। कोलकाता की एक शिक्षाविद अरुंधति रायचौधरी का कहना है कि चुनौतियां केवल कमरों की कमी तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने बताया, "जब सुरक्षा बल लंबे समय तक परिसर में रहते हैं, तो स्कूल का बुनियादी ढांचा जैसे खेल के मैदान, गलियारे और शौचालय नियमित शैक्षणिक उपयोग के लिए सुलभ नहीं रह जाते।"

रायचौधरी ने 'डिजिटल डिवाइड' की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि शहरी और निजी स्कूल तो ऑनलाइन या हाइब्रिड मॉडल अपना लेते हैं, लेकिन ग्रामीण और सरकारी स्कूलों के अधिकांश छात्र आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। उनके पास न तो तेज इंटरनेट है और न ही व्यक्तिगत डिजिटल उपकरण (स्मार्टफोन या लैपटॉप)। ऐसे में उनके लिए 'हाइब्रिड लर्निंग' केवल कागजों तक सीमित रह जाती है।

शिक्षक संगठनों और शिक्षाविदों का कड़ा विरोध
पश्चिम बंगाल तृणमूल माध्यमिक शिक्षक संघ के संजय मुखर्जी ने इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कहा कि मतदाता सूची के काम के बाद अब सुरक्षा बलों के ठहरने से शिक्षण कार्य पर दोहरा प्रहार हुआ है। 'शिक्षणुरागी ऐक्य मंच' नामक शिक्षक मंच ने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। संगठन के महासचिव किंकर अधिकारी ने कहा कि सरकारी स्कूलों को रूटीन के तौर पर 'बैरकों' में बदलना छात्रों के शिक्षा के अधिकार का हनन है।

उन्होंने सुझाव दिया कि सुरक्षा बलों को ठहराने के लिए सरकारी सभागारों (Auditoriums), मार्केट कॉम्प्लेक्स या अप्रयुक्त सरकारी भवनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके अलावा, खुले मैदानों में अस्थायी टेंट या कैंप लगाकर भी इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है ताकि स्कूल अपनी गरिमा और कार्यक्षमता बनाए रख सकें।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और वर्तमान स्थिति
पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री ब्रात्य बसु ने भी इस मामले में अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों के लिए स्कूलों का उपयोग छात्रों के अध्ययन को बुरी तरह बाधित करता है। उन्होंने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से आग्रह किया कि वे अपनी तैनाती योजनाओं में बच्चों की शिक्षा पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को ध्यान में रखें।

वर्तमान में, पश्चिम बंगाल में दो चरणों में केंद्रीय बलों की लगभग 480 कंपनियां तैनात की जा चुकी हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, यह संख्या और बढ़ेगी, जिससे राज्य के स्कूलों पर दबाव और बढ़ना तय है। अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में है कि वह सुरक्षा और शिक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाता है।


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