मोटर व्हीकल संशोधन पर सबक, पश्चिम बंगाल के विरोध से बदली केंद्र की रणनीति
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मोटर व्हीकल संशोधन पर सबक, पश्चिम बंगाल के विरोध से बदली केंद्र की रणनीति

मोटर व्हीकल एक्ट में बदलाव को लेकर केंद्र ने राज्यों से परामर्श शुरू किया है। बिना बीमा वाहनों और DL नियमों पर सख्ती के प्रस्ताव हैं, ताकि 2019 जैसा विरोध न हो।


केंद्र सरकार ने मोटर व्हीकल एक्ट में प्रस्तावित बदलावों को लेकर राज्य सरकारों के साथ परामर्श प्रक्रिया शुरू कर दी है। इनमें बिना बीमा वाले वाहनों और ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़े नियमों को सख्त करने जैसे प्रावधान शामिल हैं। इस पहल का मकसद उन विरोधों की पुनरावृत्ति से बचना है, जो पहले गैर-बीजेपी शासित कुछ राज्यों ने मोटर वाहन कानूनों में संशोधनों के दौरान किए थे। इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, सरकार इस बार पहले ही राज्यों की राय जान लेना चाहती है।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल समेत सभी राज्यों को पत्र लिखकर प्रस्तावित संशोधनों पर उनके विचार मांगे हैं। साथ ही राज्यों से यह भी कहा गया है कि वे किसी भी संभावित कानूनी या संवैधानिक आपत्ति को पहले ही चिन्हित करें, ताकि अंतिम फैसला लेने से पहले उन पर विचार किया जा सके। संविधान के तहत परिवहन एक समवर्ती विषय है, यानी इस पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्यों—दोनों के पास है। हालांकि, मोटर वाहन कानूनों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों की होती है, ऐसे में किसी भी देशव्यापी सुधार के लिए उनका सहयोग बेहद जरूरी है।

अधिकारियों का कहना है कि यह परामर्श प्रक्रिया 2019 में किए गए मोटर व्हीकल एक्ट संशोधनों से मिले सबक का नतीजा है। उस समय कई राज्यों ने या तो अहम प्रावधानों को लागू करने में देरी की थी या फिर उन्हें लागू करने से इनकार कर दिया था। खास तौर पर ट्रैफिक उल्लंघनों पर जुर्माने में भारी बढ़ोतरी का कड़ा विरोध हुआ था।

2019 के संशोधनों का पश्चिम बंगाल ने किया था विरोध

2019 के संशोधनों का सबसे मुखर विरोध करने वाले राज्यों में पश्चिम बंगाल शामिल था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से संशोधित कानून को लागू करने से इनकार कर दिया था। उनका तर्क था कि अत्यधिक बढ़े हुए जुर्माने आम नागरिकों पर असमान रूप से बोझ डालेंगे। उन्होंने कानून के कुछ हिस्सों को कठोर बताते हुए इसे संघीय ढांचे पर हमला भी करार दिया था।

पश्चिम बंगाल सरकार आज भी अपने मौजूदा मोटर वाहन नियमों के तहत काम कर रही है और हेलमेट न पहनने या सीट बेल्ट न लगाने जैसे अपराधों पर अधिक जुर्माने लगाने का विरोध करती रही है। राज्य के अधिकारियों ने वाहन फिटनेस सर्टिफिकेशन की प्रक्रियाओं में किए गए बदलावों की भी आलोचना की थी। यह पूरा विवाद केंद्र के कानून और राज्यों के प्रवर्तन अधिकारों के बीच तनाव को उजागर करता है।

हालांकि सख्त जुर्मानों का विरोध करने के बावजूद, पश्चिम बंगाल का सड़क सुरक्षा रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की ओर से सितंबर 2023 में जारी वार्षिक दुर्घटना रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य न तो दुर्घटनाओं और मौतों के मामले में शीर्ष पर है और न ही हाल के वर्षों में सबसे अधिक दुर्घटना-प्रवण 10 राज्यों की सूची में शामिल रहा है।

फिर भी, सड़क हादसों में मौतों की संख्या इतनी अधिक है कि सड़क सुरक्षा एक गंभीर चिंता बनी हुई है। कोलकाता पुलिस की हालिया तुलनात्मक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में कोलकाता में 188 दुर्घटनाओं में 191 लोगों की मौत हुई। यह आंकड़ा दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे देश के छह बड़े महानगरों में सबसे कम है। इससे संकेत मिलता है कि बड़े शहरों में ऊंचे जुर्मानों से बचने का असर बहुत नकारात्मक नहीं रहा, लेकिन पूरे राज्य में सड़क सुरक्षा अब भी एक चुनौती है।

राज्य के परिवहन मंत्री स्नेहाशीष चक्रवर्ती का कहना है, “हर जगह भारी जुर्माने लागू कर देना आम नागरिकों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है, जबकि इससे दुर्घटनाओं के मूल कारण, खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों में, जरूरी नहीं कि दूर हों।” अधिकारियों के मुताबिक, राज्य सरकारों की इसी तरह की प्रतिक्रियाओं ने केंद्र को नए संशोधनों के मामले में अधिक सतर्क बना दिया है।

बिना बीमा वाले वाहनों पर सख्ती की तैयारी

नए प्रस्तावों का केंद्र बिंदु बिना बीमा वाले वाहनों से जुड़े नियमों को सख्त करना है। अधिकारियों का कहना है कि खासकर दोपहिया वाहनों में बिना बीमा के चलने की प्रवृत्ति देशभर में अब भी व्यापक है। फिलहाल पुलिस के पास बिना रजिस्ट्रेशन या परमिट वाले वाहनों को जब्त करने का अधिकार है, लेकिन बीमा न होने की स्थिति में प्रवर्तन के विकल्प सीमित हैं।

मौजूदा कानून के तहत बिना वैध बीमा वाहन चलाने पर एक तय जुर्माना लगता है, चाहे अपराध दोहराया गया हो या नहीं। केंद्र का मानना है कि यह व्यवस्था वाहन चालकों को रोकने में नाकाम रही है और इसी वजह से सड़कों पर बिना बीमा वाले वाहनों की संख्या लगातार बनी हुई है।

इस समस्या से निपटने के लिए मंत्रालय प्रवर्तन एजेंसियों को यह अधिकार देने पर विचार कर रहा है कि वे बिना वैध बीमा वाले वाहनों को जब्त कर सकें। साथ ही, एक समान जुर्माने की जगह वाहन के बीमा प्रीमियम से जुड़ा परिवर्तनीय दंड लगाने का प्रस्ताव भी है। इससे नियमों का उल्लंघन करने की लागत काफी बढ़ सकती है।

अधिकारियों के मुताबिक, ये प्रस्ताव इसी सप्ताह राज्य परिवहन मंत्रियों और परिवहन आयुक्तों के साथ हुई बैठक में साझा किए गए। इसके अलावा राज्यों को औपचारिक प्रतिक्रिया के लिए लिखित रूप से भी प्रस्ताव भेजे गए हैं। यह पहल राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा परिषद की सिफारिशों के बाद की गई है, जिसने बिना बीमा वाले वाहनों को समय पर मुआवजा देने में बड़ी बाधा और सड़क सुरक्षा के लिए गंभीर जोखिम बताया है। अधिकारियों का कहना है कि दुर्घटनाओं के शिकार लोगों को अक्सर मुआवजा पाने में देरी या विवाद का सामना करना पड़ता है, जब दोषी वाहन के पास बीमा नहीं होता।

राज्यों से यह भी कहा गया है कि वे आकलन करें कि प्रस्तावित प्रवर्तन अधिकार और दंड संरचना कहीं संवैधानिक चुनौतियों या मौजूदा राज्य कानूनों से टकराव तो नहीं पैदा करेंगे।

बीमा प्रीमियम और ड्राइविंग लाइसेंस नियमों में बदलाव

प्रवर्तन के अलावा, मसौदा संशोधनों में बीमा प्रीमियम और ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़े व्यापक बदलाव भी शामिल हैं। एक अहम प्रस्ताव मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 147 में संशोधन का है, जिसके तहत बीमा नियामक संस्था भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) को यह अधिकार मिलेगा कि वह बीमा प्रीमियम तय करने में वाहन की उम्र और मालिक के ट्रैफिक उल्लंघन के इतिहास जैसे अतिरिक्त मानकों का उपयोग कर सके।

फिलहाल थर्ड पार्टी बीमा प्रीमियम सरकार द्वारा IRDAI के परामर्श से तय किए जाते हैं। अधिकारियों का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव से जोखिम-आधारित मूल्य निर्धारण संभव होगा और व्यक्तिगत ड्राइविंग व्यवहार को बेहतर तरीके से दर्शाया जा सकेगा। ट्रैफिक उल्लंघनों से जुड़ा डेटा दुर्घटना जोखिम को समझने में मदद करता है और इससे बीमा कंपनियां अधिक सटीक प्रीमियम तय कर सकेंगी, साथ ही सुरक्षित ड्राइविंग को भी बढ़ावा मिलेगा।

अन्य प्रस्तावित बदलाव

अन्य प्रस्तावों में अनिवार्य थर्ड पार्टी बीमा कवरेज का दायरा बढ़ाकर उसमें वाहन मालिक, चालक और निजी वाहनों के यात्रियों को स्पष्ट रूप से शामिल करना भी है। इसके अलावा, भारी वाहनों के लिए ड्राइविंग लाइसेंस की पात्रता को चरणबद्ध करने का प्रस्ताव है, ताकि व्यावसायिक चालकों के बीच सड़क सुरक्षा मानकों में सुधार हो सके।

एक और प्रस्ताव के तहत अनिवार्य मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट की उम्र सीमा को 40 साल से बढ़ाकर 60 साल करने पर विचार किया जा रहा है, ताकि बदलती जनसांख्यिकी और स्वास्थ्य पैटर्न के अनुरूप नियमों को ढाला जा सके।

राज्यों को साथ लेने की कोशिश

मंत्रालय का इरादा है कि राज्यों से मिली प्रतिक्रिया की समीक्षा करने के बाद ही मसौदे को अंतिम रूप दिया जाए और संसद में पेश किया जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाद में किसी तरह की कार्यान्वयन संबंधी बाधा न आए, खासकर अगर राज्य नए नियमों को लागू करने में हिचकिचाएं।

एक अधिकारी ने कहा, “मकसद सड़क सुरक्षा में सुधार करना है, बिना एक और केंद्र-राज्य टकराव को जन्म दिए।” वहीं, एक अन्य अधिकारी ने टिप्पणी की, “खासकर पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से मुखर राज्यों को अगर केंद्र साथ नहीं ले पाया, तो इन प्रस्तावित सुधारों का भविष्य तय हो जाएगा।”

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