मनरेगा पर केंद्र ने SC की भी नहीं मानी, पश्चिम बंगाल में रोक जारी, 70 लाख मज़दूरों पर असर
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2022 से योजना ठप होने के बाद, अनुमानित 70 लाख मनरेगा मज़दूरों को पश्चिम बंगाल में लगभग चार वर्षों से न तो सुनिश्चित रोज़गार मिला है और न ही मजदूरी का भुगतान- इससे संकट गहराया है और पलायन तेज़ हुआ है। (फ़ाइल फोटो)

मनरेगा पर केंद्र ने SC की भी नहीं मानी, पश्चिम बंगाल में रोक जारी, 70 लाख मज़दूरों पर असर

बंगाल में सत्ताधारी टीएमसी का आरोप है कि केंद्र ‘देरी की रणनीति’ अपना रहा है, ‘वेलफेयर को हथियार’ बना रहा है, जबकि ज्यादा अनियमितताओं वाले राज्यों पर कोई रोक नहीं लगाई गई है।


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केंद्र सरकार द्वारा 2022 में पश्चिम बंगाल में मनरेगा अचानक रोक दिए जाने के चार साल बाद भी यह योजना अब तक बंद पड़ी है, जबकि कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने 100 दिन की ग्रामीण रोज़गार योजना को फिर से शुरू करने के स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं।

स्पष्ट अदालत आदेशों के बावजूद योजना शुरू न होने से राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या पश्चिम बंगाल को राजनीतिक कारणों से जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। जून 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह 1 अगस्त से बंगाल में मनरेगा कार्य शुरू करे, और कहा था कि मज़दूरों को उनके वैधानिक अधिकारों से अनिश्चितकाल तक वंचित नहीं रखा जा सकता।

जब केंद्र ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, तो अक्टूबर के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी जिससे हाईकोर्ट का आदेश अंतिम और बाध्यकारी हो गया। लेकिन महीनों बाद भी जमीनी स्तर पर योजना शुरू नहीं हुई है।

देरी की रणनीति

फंड जारी करने या नए कार्यों को मंज़ूरी देने की बजाय, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने हाल ही में बंगाल सरकार से एक और “एक्शन टेकन रिपोर्ट” (ATR) मांगी है। मंत्रालय का दावा है कि पिछली ATR में कमियां हैं। यह जानकारी राज्य के पंचायती राज और ग्रामीण विकास (P&RD) विभाग के सूत्रों ने दी।

उन्होंने यह भी बताया कि रोक जारी है, जबकि पंचायती राज मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने 13 नवंबर को संसद की पब्लिक अकाउंट्स कमेटी की बैठक में आश्वासन दिया था कि योजना जल्द ही बंगाल में फिर शुरू होगी हालांकि उन्होंने कोई समयसीमा नहीं बताई।

राज्य के अधिकारियों ने दावा किया कि अब तक दो दर्जन से अधिक ATR जमा हो चुकी हैं, और नए ATR की मांग सिर्फ अदालत के आदेश का पालन रोकने की एक देरी कराने वाली चाल है।

पश्चिम बंगाल पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मंत्री प्रदीप मजूमदार ने The Federal से कहा, “एक और ATR की मांग, 100 दिन के काम की योजना दोबारा शुरू करने में देरी और अदालत के आदेश को टालने की एक सोची-समझी रणनीति है। यह केवल झूठे और बेबुनियाद दावों के बहाने बंगाल को वंचित रखने का नया तरीका है।”

मज़दूर संगठनों जैसे पश्चिम बंगाल खेत मज़दूर समिति (PBKMS) ने भी यही आरोप लगाया है और केंद्र की स्थिति को “न्यायिक स्पष्टता के बावजूद प्रशासनिक असहयोग” करार दिया है।

PBKMS ने कहा है कि यदि केंद्र सरकार अदालत के निर्देशों के अनुसार योजना को तुरंत दोबारा शुरू करने में विफल रहती है, तो संगठन अवमानना याचिका दायर करेगा।

योजना दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया

योजना को पुनः शुरू करने की प्रक्रिया का पहला और सबसे अहम कदम है-राज्य की लेबर बजट को मंत्रालय से मंजूरी दिलाना। एक वरिष्ठ अधिकारी ने The Federal को बताया कि राज्य सरकार इसके लिए मंत्रालय से आवश्यक स्वीकृति मांग चुकी है, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।

लेबर बजट एक वार्षिक अनुमान होता है, जिसमें अकुशल श्रमिकों की मांग और योजना के तहत किए जाने वाले कार्यों का ब्यौरा शामिल होता है। इसके बाद इस बजट की जांच की जाती है और ग्रामीण विकास सचिव की अध्यक्षता वाली एम्पावर्ड कमेटी इसे मंजूरी देती है।

लेबर बजट स्वीकृत होते ही राज्यों को NREGASoft यानी योजना की मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (MIS) के माध्यम से फंड की मांग भेजने का अधिकार मिल जाता है। इसके बाद मंत्रालय स्वीकृत लेबर बजट के आधार पर धनराशि जारी करता है।

अधिकारी ने कहा, “लेबर बजट की स्वीकृति, राज्य में मनरेगा गतिविधियां दोबारा शुरू करने की अनिवार्य शर्त है।”

राज्य सरकार ने योजना को फिर से शुरू करने के लिए अन्य औपचारिकताएँ भी पूरी करनी शुरू कर दी हैं — जैसे जिलों को जॉब कार्ड सत्यापन और e-KYC अपडेट करने के निर्देश देना। लेकिन फंड जारी हुए बिना और केंद्र से आधिकारिक स्वीकृति के अभाव में, ये प्रशासनिक तैयारियाँ बेकार साबित होंगी, अधिकारियों का कहना है।

केंद्र द्वारा मनरेगा रोकने की पृष्ठभूमि

केंद्र सरकार ने मार्च 2022 में पश्चिम बंगाल के लिए मनरेगा फंडिंग रोक दी थी, यह कहते हुए कि राज्य ने “केंद्रीय निर्देशों का पालन नहीं किया” — जो मनरेगा अधिनियम 2005 की धारा 27 के तहत आता है।

1 अगस्त 2025 को राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र ने स्वीकार किया कि मनरेगा के तहत वह “पश्चिम बंगाल को 3,000 करोड़ रुपये से अधिक” का भुगतान बकाया है जिसमें मजदूरी, सामग्री और प्रशासनिक लागत शामिल हैं।

केंद्र द्वारा 2022 में फंडिंग रोकने से पहले, पश्चिम बंगाल देश के सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में था — 2014–15 से 2021–22 के बीच हर साल 51 से 80 लाख परिवार इस योजना से लाभान्वित होते थे।

‘वेलफेयर’ योजनाओं का राजनीतिक इस्तेमाल

विवाद को और तेज़ करने वाला पहलू है अन्य राज्यों से सामने आ रहा डेटा। केंद्र सरकार के नवीनतम आँकड़ों (2024–25) के अनुसार, पूरे पश्चिम बंगाल में केवल दो फर्जी जॉब कार्ड पाए गए। इसके उलट, भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में पिछले दो वर्षों में 4.5 लाख से अधिक फर्जी या अयोग्य जॉब कार्ड हटाए गए।

अन्य भाजपा शासित राज्यों, जैसे मध्य प्रदेश, में भी भारी संख्या में जॉब कार्ड हटाने और प्रक्रियागत अनियमितताएँ दर्ज की गई हैं। इसके बावजूद इनमें से किसी भी राज्य को केंद्र ने फंड रोकने या योजना को पूरी तरह बंद करने जैसी सज़ा का सामना नहीं करना पड़ा।

इस असमान व्यवहार ने तृणमूल कांग्रेस के आरोपों को बल दिया है कि केंद्र सरकार ने विपक्ष शासित राज्य को निशाना बनाने के लिए एक वेलफेयर योजना को “राजनीतिक हथियार” में बदल दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का तर्क है कि यदि अनियमितताएँ ही फंड रोकने का आधार थीं, तो ज्यादा फर्जी जॉब कार्ड वाले राज्यों की पहले जांच होनी चाहिए थी। उनके अनुसार, बंगाल जहां फर्जी जॉब कार्ड की सबसे कम संख्या पाई गई, इस तरह की कार्रवाई का हकदार नहीं था।

टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने संसद में प्रस्तुत एक अन्य डेटा का हवाला देते हुए बताया कि 2022 से 2025 के बीच पूरे देश में 11,07,814 फर्जी मनरेगा जॉब कार्ड हटाए गए।

उन्होंने कहा, “केवल भाजपा-शासित उत्तर प्रदेश में ही 4,50,172 जॉब कार्ड हटाए गए — जो कुल का 40.6% है। अन्य शीर्ष राज्यों में ओडिशा, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश शामिल हैं — ये सभी डबल-इंजन सरकार वाले ,राज्य हैं। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में सिर्फ 5,984 हटाए गए — यानी मात्र 0.5%।”

घोष ने कहा, “फिर भी, मनरेगा फंड उसी बंगाल का रोका गया, वह भी कथित तौर पर झूठे अनियमितता के दावों के आधार पर।”

मानवीय कीमत

इस बीच, इस गतिरोध की मानवीय कीमत तेजी से बढ़ रही है। योजना 2022 से ठप है, और अनुमानित 70 लाख मनरेगा मज़दूरों को लगभग चार वर्षों से न तो सुनिश्चित रोज़गार मिला है और न ही मजदूरी का भुगतान।

राज्य के प्रमुख आदिवासी अधिकार और पर्यावरण कार्यकर्ता खोकोन मारडी कहते हैं, “कई ग्रामीण परिवारों के लिए इसका मतलब है कि कृषि के सुस्त सीज़न के दौरान उनकी आखिरी सहारा-आय भी खत्म हो गई। इससे संकट गहरा हुआ है और पलायन बढ़ा है।”

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