
बंगाल चुनाव में कांग्रेस की कठिन राह, टीएमसी पर वार या बीजेपी पर फोकस?
बिहार के झटके के बाद कांग्रेस बंगाल में वापसी की कोशिश में है। राहुल-प्रियंका प्रचार करेंगे, लेकिन TMC से टकराव और BJP से मुकाबले के बीच रणनीति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।
बिहार विधानसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के कुछ महीनों बाद कांग्रेस के सामने फिर से राजनीतिक वापसी का अवसर आया है। जल्द ही चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं, जहां कांग्रेस का मुकाबला राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों से भी होगा। इन क्षेत्रीय दलों में वाम दल और एआईएडीएमके जैसे मजबूत खिलाड़ी शामिल हैं। हालांकि इन चुनावों में सबसे जटिल स्थिति West Bengal में देखने को मिल सकती है।
बंगाल में कांग्रेस के सामने दोस्त और दुश्मन का समीकरण
राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि “दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है”, लेकिन बंगाल में यह फार्मूला पूरी तरह लागू नहीं होता। यहां Mamata Banerjee की पार्टी आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस भाजपा की विरोधी जरूर है, लेकिन कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते जटिल बने हुए हैं। यही वजह है कि बंगाल चुनावों के लिए रणनीति तय करना कांग्रेस नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
राहुल और प्रियंका की आक्रामक लेकिन संतुलित रणनीति
कांग्रेस इस साल होने वाले राज्य चुनावों के लिए सक्रिय रणनीति पर काम कर रही है। इसी के तहत पार्टी बंगाल में केंद्रीय नेतृत्व के जरिए जोरदार प्रचार अभियान चलाने की तैयारी कर रही है। इस अभियान की कमान मुख्य रूप से राहुल गांधी, और प्रियंका गांधी के हाथ में होगी।
हालांकि पार्टी को यहां एक संतुलन भी बनाए रखना होगा—ताकि भाजपा विरोधी दलों की एकता को नुकसान न पहुंचे। कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि टीएमसी सरकार के खिलाफ हमला सीमित और संतुलित रखा जाएगा, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को हराने के लिए विपक्षी एकजुटता जरूरी है।
INDIA गठबंधन में साथ, बंगाल में अलग रास्ता
कांग्रेस और टीएमसी दोनों ही विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं। संसद में कई मुद्दों पर दोनों दल एक साथ भी नजर आए हैं।लेकिन बंगाल चुनावों में दोनों पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतर सकती हैं। इस स्थिति ने कांग्रेस के लिए रणनीति और भी जटिल बना दी है।
ममता और राहुल के रिश्तों में पहले भी रही खटास
अतीत में ममता बनर्जी ने राहुल गांधी पर तंज कसते हुए उन्हें “माइग्रेटरी बर्ड” कहा था—यानी ऐसे नेता जो केवल चुनाव के समय राज्य में नजर आते हैं। 2016 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने भी ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी दोनों पर निशाना साधा था। उस समय वे वाम नेता Buddhadeb Bhattacharjee के साथ मंच साझा कर रहे थे।
दो दशक बाद बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी
कांग्रेस ने इस बार करीब दो दशक बाद बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। 2006 में जब पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा था, तब उसे 21 सीटें मिली थीं। 2011 में टीएमसी के साथ गठबंधन कर उसने सीटों की संख्या दोगुनी कर ली थी और वाम मोर्चे की सरकार को सत्ता से हटाने में मदद की थी।हालांकि बाद में कई कांग्रेस नेताओं ने माना कि यह गठबंधन पार्टी के अपने जनाधार को कमजोर करने वाला साबित हुआ।
बंगाल में संगठन मजबूत करने पर फोकस
कांग्रेस अब बंगाल में संगठन को दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इसके लिए पार्टी ने राज्य के सभी 23 जिलों में AICC पर्यवेक्षक नियुक्त किए हैं।इसके अलावा राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के नेतृत्व में दो हफ्ते का व्यापक प्रचार कार्यक्रम चलाने की योजना बनाई जा रही है, जिसमें रैलियां, जनसभाएं और जनसंपर्क अभियान शामिल होंगे।
चुनावी मुद्दे: बेरोजगारी, पलायन और भ्रष्टाचार
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पार्टी बंगाल में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाएगी। कांग्रेस सांसद Isha Khan Choudhury ने कहा कि मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में गंगा के कटाव से हर साल जमीन और घर बह जाते हैं, जिससे लोगों को रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ता है।
भाजपा भी रहेगी मुख्य निशाने पर
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पार्टी का मुख्य निशाना भाजपा ही रहेगी। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार ने बंगाल के साथ सौतेला व्यवहार किया है और कई योजनाओं के फंड रोके गए हैं। साथ ही कांग्रेस टीएमसी सरकार पर भी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं को लेकर सवाल उठाने की तैयारी में है।
क्या कांग्रेस फिर से पा सकेगी खोई जमीन?
कांग्रेस कभी बंगाल की राजनीति की मजबूत ताकत हुआ करती थी, लेकिन पिछले कई दशकों में उसका जनाधार काफी कमजोर हो गया। अब सवाल यह है कि क्या राहुल और प्रियंका गांधी का अभियान पार्टी को राज्य में दोबारा खड़ा कर पाएगा या बंगाल की राजनीति पहले की तरह ही टीएमसी बनाम भाजपा के बीच सिमट कर रह जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह टीएमसी और भाजपा दोनों से मुकाबला करते हुए अपनी अलग पहचान कैसे बनाए।

