
तो दिल्ली में शराब घोटाला नहीं हुआ था, अदालती फैसले के क्या हैं मायने?
दिल्ली शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल-मनीष सिसोदिया बरी हो चुके हैं। राउज एवेन्यू कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि कभी कभी आप फाइल ज्यादा पढ़ते हैं तो फाइल आपसे बात करनी लगती हैं।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के शासन में क्या शराब घोटाला हुआ था। इस सवाल का जवाब अब सामने आ चुका है। राउज एवेन्यू कोर्ट ने कहा कि ऐसे कोई साक्ष्य नहीं है जो यह साबित करते हों कि शराब घोटाला हुआ था। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को बरी कर दिया। यही नहीं अदालत ने जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच का भी आदेश दिया है। हालांकि सीबीआई ने कहा कि वो निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट में अपील करेगी।
एक ऐसा केस जिसमें दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया को करीब एक साल और संस्थापक अरविंद केजरीवाल को 6 महीने तक तिहाड़ जेल में बिताना पड़ा। सवाल यह है जब निचली अदालत की नजर में शराब घोटाला नहीं हुआ तो क्या यह राजनीतिक साजिश थी। इससे पहले जज ने दो तीन बड़ी बात कही। जज ने कहा कि कभी कभी आप फाइल ज्यादा पढ़ते हैं तो फाइल आपसे बात करनी लगती हैं।कोर्ट ने CBI के वकील से पूछा कि आपने कन्फेशनल स्टेटमेंट जमा क्यों नहीं किया? सीबीआई ने कहा ये कि सील कवर में जमा हुआ था। जज जितेंद्र सिंह ने नाराजगी जताई कि अभी तक मुझे कन्फेशनल स्टेटमेंट की कॉपी तक नहीं दी गई। मैं सीबीआई के वकील से ईमानदारी की उम्मीद करता हूं। मेरे मन में ये भी चिंता थी कि साउथ ग्रुप जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। ये सही नहीं है।
अदालत ने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) की चार्जशीट को कमजोर बताते हुए कहा कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि आबकारी नीति में किसी व्यापक साजिश या आपराधिक मंशा के प्रमाण नहीं मिले।न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहा, इसलिए केस को आगे बढ़ाने का आधार नहीं बनता।
विशेष न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि केजरीवाल के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं। वहीं, सिसोदिया के खिलाफ प्रथम दृष्टया भी मामला नहीं बनता। अदालत ने आरोपपत्र में कई आंतरिक विरोधाभासों और कमियों की ओर इशारा किया, जो कथित साजिश की थ्योरी को कमजोर करते हैं।
न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि आरोपपत्र में किए गए कई दावे न तो दस्तावेजी साक्ष्यों से समर्थित हैं और न ही गवाहों के बयानों से पुष्ट होते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार की बरामदगी या ठोस सामग्री के अभाव में आरोपों को कायम नहीं रखा जा सकता।
कानून के शासन पर जोर
अदालत ने यह भी कहा कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के किसी व्यक्ति को अभियोजन का सामना करवाना कानून के शासन की भावना के विपरीत है। सिसोदिया के संदर्भ में अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो उनकी संलिप्तता दर्शाता हो।
बचाव पक्ष की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद अरविंद केजरीवाल के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने कहा कि अदालत ने सभी दलीलों, आरोपपत्र और हजारों दस्तावेजों की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि आरोप टिकने योग्य नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अदालत ने पाया कि आरोपमुक्त करने का ही मामला बनता है। इस फैसले के साथ ही लंबे समय से चल रहा यह हाई-प्रोफाइल मामला कानूनी तौर पर समाप्त हो गया है, जिसने राष्ट्रीय राजनीति में भी व्यापक बहस को जन्म दिया था।

