
दिल्ली में GRAP हटा: क्या प्रदूषण के लिए सिर्फ मौसम के भरोसे है सरकार?
ग्रैप हटने से राहत तो मिली पर सवाल बरकरार, क्या सरकारी कवायदें सिर्फ कागजी हैं या जमीन पर भी दिखता है इनका असर?
Delhi's Air Pollution : दिल्ली सरकार ने राजधानी से ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) को हटा लिया है, लेकिन यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या प्रदूषण से राहत केवल मौसम की मेहरबानी है? सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की विशेषज्ञ शाम्भवी शुक्ला के अनुसार, ग्रैप एक इमरजेंसी कदम है जिसे अक्सर 15 अक्टूबर से 15 मार्च के बीच लगाया जाता है। सर्दियों में 'मिक्सिंग हाइट' कम होने और हवा की गति धीमी होने से दिल्ली एक कटोरे की तरह प्रदूषकों को कैद कर लेती है। अब गर्मी शुरू होते ही प्रदूषक तत्व हवा के साथ ऊपर चले जाते हैं, जिससे एयर क्वालिटी में सुधार दिखता है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि दिल्ली का दम घोंटने वाला प्रदूषण कम होने में सरकारी प्रयासों से कहीं ज्यादा भूमिका मौसम के बदलाव की रही है।
प्रदूषण के स्थायी स्रोत बनाम सरकारी सुस्ती
शाम्भवी शुक्ला का वैज्ञानिक तर्क है कि दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले मुख्य स्रोत साल के बारहों महीने एक जैसे ही सक्रिय रहते हैं। इनमें वाहनों का धुआं, कंस्ट्रक्शन ( निर्माण कार्य ) की धूल और औद्योगिक उत्सर्जन शामिल हैं। सरकार अक्सर केवल सर्दियों के दौरान ही सक्रियता दिखाती है, जबकि स्थायी समाधानों पर काम करने की रफ्तार बेहद सुस्त है। यदि सरकारी कवायदें वास्तव में प्रभावी होतीं, तो हर साल सर्दियों में दिल्ली को 'गैस चैंबर' बनने से रोका जा सकता था। विशेषज्ञ मानती हैं कि जब तक हम इन स्रोतों पर 'राउंड द ईयर' यानी पूरे साल कड़ाई से काम नहीं करेंगे, तब तक हर साल अक्टूबर आते ही स्थिति फिर से बेकाबू हो जाएगी। ग्रैप हटाना एक प्रक्रिया है, लेकिन यह प्रदूषण की समस्या का अंत कतई नहीं है।
आंकड़ों में छिपा सच: 25% सुधार या 60% की जरूरत?
पिछले कुछ वर्षों के डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ प्रशासनिक कदमों से प्रदूषण कर्व को मोड़ने में मदद मिली है। इससे वायु प्रदूषण के स्तर में करीब 25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन शाम्भवी शुक्ला चेतावनी देती हैं कि यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। सुरक्षित राष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के लिए दिल्ली को अपने PM 2.5 स्तर में अभी भी 60 प्रतिशत की और कटौती करनी होगी। यह लक्ष्य तब तक हासिल नहीं किया जा सकता जब तक सरकार केवल 'स्मॉग टावर' या 'पानी के छिड़काव' जैसे अस्थायी उपायों पर करोड़ों खर्च करती रहेगी। विपक्ष का भी आरोप रहा है कि मॉनिटरिंग स्टेशनों के पास जानबूझकर पानी छिड़का जाता है ताकि रीडिंग को कृत्रिम रूप से सुधारा जा सके, जो कि मूल समस्या के साथ छलावा है।
सार्वजनिक परिवहन का संकट और बसों की कमी
दिल्ली की परिवहन व्यवस्था आज भी प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक बनी हुई है। लगभग 15 साल पहले कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि दिल्ली की आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से सड़कों पर कम से कम 10,000 बसें होनी चाहिए। विडंबना यह है कि साल 2026 में भी दिल्ली के पास केवल 7,500 बसें ही उपलब्ध हैं। इनमें से भी एक बड़ी संख्या उन सीएनजी बसों की है जो अपनी तय उम्र सीमा पूरी कर चुकी हैं। शाम्भवी शुक्ला के अनुसार, जब तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट इतना मजबूत और विश्वसनीय नहीं होगा कि लोग अपनी निजी कारों को छोड़ सकें, तब तक उत्सर्जन कम नहीं होगा। ई-बसें आ तो रही हैं, लेकिन उनकी गति और संख्या मांग के मुकाबले बहुत कम है।
फंड का उपयोग और प्रशासनिक विफलता
एक सबसे चौंकाने वाला पहलू फंड के इस्तेमाल को लेकर है। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत दिल्ली को लगभग 80 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया था। रिकॉर्ड बताते हैं कि दिल्ली सरकार इस फंड का केवल 20 प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में ला पाई है। 31 मार्च 2026 को इस महत्वपूर्ण प्रोग्राम की समय सीमा समाप्त होने वाली है, लेकिन बजट की उपलब्धता के बावजूद योजनाओं को जमीन पर न उतार पाना घोर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए ट्रांसपोर्ट विभाग, एमसीडी और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) के बीच आपसी तालमेल का जबरदस्त अभाव दिखता है।
अवैध उद्योगों और कचरा प्रबंधन की चुनौती
शाम्भवी शुक्ला ने यह भी उजागर किया कि हालांकि दिल्ली के औपचारिक औद्योगिक क्षेत्रों में कोयला प्रतिबंधित है, लेकिन अनधिकृत कॉलोनियों में स्थिति भयावह है। इनफॉर्मल सेक्टर में चल रही हजारों छोटी फैक्ट्रियों का सरकार के पास कोई सटीक डेटा नहीं है। वहां बॉयलर में क्या जलाया जा रहा है, इसकी निगरानी करने वाला कोई नहीं है। इसके साथ ही, लैंडफिल साइट्स पर लगने वाली आग और गलियों में कूड़ा जलाने की घटनाएं आज भी जारी हैं। जब तक लोकल लेवल पर टीम बनाकर इन पर लगाम नहीं लगाई जाएगी, तब तक दिल्ली की हवा में जहर घुलता रहेगा।

