इतिहास की गवाह बस्तियों पर संकट
सबसे पहले हमारी टीम बी.आर कैंप पहुंची, जो रेस कोर्स के ठीक पीछे स्थित है। यहाँ लगभग 700 झुग्गियां हैं। यह बस्ती महज एक रिहायशी इलाका नहीं, बल्कि दिल्ली के इतिहास का एक हिस्सा है। यहाँ एक पुराने मंदिर की दीवार पर साल 1982 का एक उद्घाटन पत्थर लगा है, जिस पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम अंकित है। स्थानीय लोगों का दावा है कि यह बस्ती अंग्रेजों के जमाने की है। यहाँ रहने वाले अधिकतर लोग आसपास के रेस कोर्स और पोलो क्लब में अपनी सेवाएं देते हैं।
विक्रम और भाले: रोजगार और दूरी का गणित
बस्ती के निवासी विक्रम ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि वे बचपन से यहीं पले-बढ़े हैं। उनके पिता भी यहीं रहते थे। विक्रम खुद रेस कोर्स में जॉकी (घुड़सवार) थे, लेकिन एक हादसे ने उनका करियर खत्म कर दिया। वे कहते हैं, "हमने कभी जमीन पर हक नहीं जताया, हम कहीं भी बसने को तैयार हैं लेकिन 5 से 10 किलोमीटर के दायरे में। हमें 45 किलोमीटर दूर सावदा घेवरा भेजा जा रहा है, जबकि हमारे बच्चों के स्कूल और हमारा काम यहीं है।"
वहीं, 50 वर्षीय भाले का कहना है कि उनका जन्म भी यहीं हुआ। वे 10 से 15 हजार रुपये महीना कमाते हैं। भाले बताते हैं कि यहाँ से एम्स और आरएमएल जैसे बड़े अस्पताल नजदीक हैं। अगर वे 45 किलोमीटर दूर चले गए, तो आने-जाने में ही उनका आधा पैसा और समय खर्च हो जाएगा।
राधा देवी और मुन्नी: अधूरी पढ़ाई और खर्च का डर
राधा देवी की पूरी उम्र इन्हीं झुग्गियों में बीत गई। उनके बेटे की पिछले साल मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद वे अपनी दो बहुओं और पोती के साथ जैसे-तैसे गुजारा कर रही हैं। उनकी पोती आठवीं कक्षा में है और उसकी परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं। राधा देवी कहती हैं, "विधायक प्रवेश वर्मा ने वादा किया था कि हमें यहीं पक्के मकान मिलेंगे, लेकिन अब हमें निकाला जा रहा है।"
मुन्नी (58 वर्ष) ने बताया कि उनके पिता का जन्म भी इसी बस्ती में हुआ था। वे कबाड़ बीनकर अपना पेट पालती हैं। उनका बेटा पास के पेट्रोल पंप पर 8 हजार की नौकरी करता है। मुन्नी का सवाल है कि जिस नए मकान की बात हो रही है, उसके लिए पहले डेढ़ लाख रुपये मांगे जा रहे हैं। एक कबाड़ बीनने वाली महिला इतनी बड़ी रकम कहाँ से लाएगी?
इरफ़ान खान और प्रथम: सुरक्षा और संसाधनों की कमी
इरफ़ान खान जो रेस कोर्स में काम करते हैं, बताते हैं कि उनके बाप-दादा भी यहीं रहते थे। वे कहते हैं, "जहाँ हमें भेजने की बात हो रही है, वहां न रोजगार है और न ही मूलभूत सुविधाएं। वहां की डिस्पेंसरी में खिड़की तक नहीं है।" उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि चुनाव के समय हमें यहीं बसाने के वादे किए गए थे। वहीं प्रथम, जो मार्केटिंग की नौकरी करते हैं, ने सुरक्षा का मुद्दा उठाया। प्रथम का कहना है कि सावदा घेवरा का माहौल असुरक्षित है। साथ ही 45 किलोमीटर की दूरी उनकी नौकरी के लिए आर्थिक रूप से असंभव है।
डीआईडी कैंप: देश की सेवा करने वालों का दर्द
डीआईडी कैंप में सेना से रिटायर हुए दिलावर सिंह (72 वर्ष) रहते हैं। वे बताते हैं कि यहाँ रहने वाले ज्यादातर लोग आसपास के बंगलों या पोलो क्लब में काम करते हैं। वे सवाल करते हैं कि बुढ़ापे में 45 किलोमीटर दूर बिना किसी सहूलियत के कैसे रहेंगे? इसी कैंप के विनोद, जो एयर फोर्स से रिटायर्ड हैं, बताते हैं कि यहाँ 50 प्रतिशत लोग सेना से जुड़े हैं। यह इलाका डिफेंस का है, इसलिए यहाँ हमेशा शांति रहती है। विनोद कहते हैं, "6 मार्च का नोटिस देखकर हमारे घरों में खाना तक नहीं बना। हमने डोनेशन देकर बच्चों के दाखिले पास के स्कूलों में कराए हैं, अब सब बर्बाद हो जाएगा।" विनोद का ये भी कहना है कि चुनाव से पहले नारा था जहाँ झुग्गी वहीँ मकान और अब ऐसा लग रहा है कि जहाँ झुग्गी वहां से उठाओ सामान।
दिल्ली सरकार के मंत्री प्रवेश वर्मा हैं यहाँ से विधायक
लोगों का कहना है कि प्रवेश वर्मा जब विधायक का चुनाव लड़ रहे थे तो उन्होंने वादा किया था कि जहाँ झुग्गी वहीँ मकान। साथ ही ये भी कहा गया था कि किसी को चिंता करने की बात नहीं है, किसी को परेशान नहीं किया जाएगा, लेकिन अब हमें पूरी तरह से हटाये जाने की बात की जा रही है। लोगों का कहना है कि चुनाव के समय जो 1100 रूपये दिए गए थे, वही हम सब पर भारी पड़ रहे हैं।