
Ajit Pawar: जो कभी न बन पाए CM, लेकिन सत्ता और सिस्टम पर हमेशा रहे हावी
अजित पवार को प्यार से ‘दादा’ कहा जाता था। कई विवादों के बावजूद उनकी पहचान एक सख्त लेकिन कुशल प्रशासक के रूप में थी।
महाराष्ट्र में बुधवार की सुबह उस समय सदमे और गहरे शोक में डूब गया, जब राज्य के उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख अजित पवार का एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया। यह हादसा पुणे जिले के बारामती में हुआ, जो उनका राजनीतिक गढ़ माना जाता है। अजित पवार 66 वर्ष के थे। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, वह उन नेताओं में गिने जाते थे, जिन्हें अक्सर “महाराष्ट्र का सबसे बेहतर मुख्यमंत्री, जो कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सका” कहा जाता था।
हादसे से ठीक एक दिन पहले ही अजित पवार ने कैबिनेट बैठक में हिस्सा लिया था। हाल ही में संपन्न शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी को मिली हार के बावजूद वह सहज और उत्साहित नजर आए थे। महाराष्ट्र की अत्यंत ध्रुवीकृत राजनीति के बावजूद, उनके निधन पर सभी राजनीतिक दलों ने शोक व्यक्त किया। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के लोकसभा सांसद अरविंद सावंत ने कहा कि अगर अजित पवार किसी काम के लिए हां कह देते थे तो उसे पूरा करने के लिए किसी भी हद तक चले जाते थे। लेकिन अगर उन्होंने ना कह दी तो वह काम न हो पाने की पूरी गारंटी होती थी। दूसरे उपमुख्यमंत्री और शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने इस हादसे को “पहाड़ जैसी आपदा” करार दिया।
सबके ‘दादा’
अजित पवार को प्यार से ‘दादा’ कहा जाता था। कई विवादों के बावजूद उनकी पहचान एक सख्त लेकिन कुशल प्रशासक के रूप में थी, ठीक अपने चाचा और दिग्गज नेता शरद पवार की तरह। करीब तीन दशक के लंबे विधायी जीवन और मंत्री पद के कार्यकाल में उन्होंने वित्त, जल संसाधन, ऊर्जा, ग्रामीण विकास जैसे अहम विभागों को संभाला। कठिन परियोजनाओं को रिकॉर्ड समय में पूरा कराना उनकी पहचान थी। वह अनुशासनप्रिय थे, हालांकि कई बार उनके सार्वजनिक बयान इसकी विपरीत छवि पेश करते थे। अजित पवार सुबह जल्दी उठने वाले नेता थे। वे आमतौर पर सुबह 5:30 बजे काम शुरू करते और देर रात तक काम करते थे। अफसरशाही और जनता, दोनों उनसे डरते भी थे और उन्हें सम्मान भी देते थे।
शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफर
22 जुलाई 1959 को अनंतराव पवार के घर जन्मे अजित पवार ने राजनीति की शुरुआत 1980 के दशक के अंत में बारामती की सहकारी चीनी फैक्ट्री और पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के बोर्ड से की। वर्ष 1991 में वह पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए। अपने चाचा शरद पवार के मार्गदर्शन में राजनीति सीखी, हालांकि उनकी शैली अलग रही। बुधवार को निधन तक उन्होंने कभी भी बारामती से चुनाव नहीं हारा। एकजुट एनसीपी में जिम्मेदारियों का बंटवारा साफ था—राज्य में अजित पवार और केंद्र में सुप्रिया सुले। वर्ष 2004 से ही पार्टी का संगठनात्मक संचालन मुख्य रूप से अजित के हाथों में था।
मुख्यमंत्री बनने से एक कदम दूर
उनके करीबी सहयोगियों के अनुसार, अजित पवार को शहरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था—दोनों की गहरी समझ थी। विधानसभा में उनके भाषणों में स्थानीय कहावतें और जमीनी भाषा सुनाई देती थी, जो आज की राजनीति में दुर्लभ है। हालांकि, वह हमेशा “मुख्यमंत्री बनने की कतार में खड़े नेता” बने रहे। 1999 में एनसीपी के कांग्रेस से अधिक सीटें जीतने के बावजूद मुख्यमंत्री पद सहयोगी कांग्रेस को दे दिया गया। तब विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री बने। अजित पवार को बाद में उपमुख्यमंत्री बनाया गया और वे अंत तक उसी पद पर रहे।
बगावत, विभाजन और सत्ता की राजनीति
2022 में अजित पवार ने पहली बार अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत की, लेकिन वह प्रयास विफल रहा। इसके बाद जुलाई 2023 में उन्होंने एनसीपी को विभाजित कर भाजपा के साथ सरकार में शामिल होने का बड़ा फैसला लिया और उपमुख्यमंत्री बने। 2024 के लोकसभा चुनावों में उनके गुट को भारी नुकसान हुआ, लेकिन बाद में विधानसभा चुनावों में उन्होंने राजनीतिक जमीन काफी हद तक वापस हासिल कर ली। इस राजनीतिक कदम को शरद पवार के पार्टी पर लंबे वर्चस्व के अंत और अजित पवार के स्वतंत्र राजनीतिक उदय के रूप में देखा गया।
राजनीति से परे रिश्ते
राजनीतिक मतभेदों के बावजूद अजित पवार ने पारिवारिक रिश्ते नहीं तोड़े। वह सार्वजनिक रूप से शरद पवार को अपना मार्गदर्शक और सुप्रिया सुले को बहन बताते रहे। हाल ही में ऐसी अटकलें भी थीं कि दोनों एनसीपी गुट एक बार फिर साथ आ सकते हैं और एक ही चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन इससे पहले ही यह दुखद हादसा हो गया। उनके निधन के बाद दोनों एनसीपी गुट असमंजस की स्थिति में हैं। शरद पवार की उम्र को देखते हुए अजित पवार के गुट में उनकी जगह लेने वाला कोई स्पष्ट चेहरा नहीं दिखता।
विवादों से भी रहा नाता
अजित पवार का राजनीतिक करियर कई गंभीर आरोपों और विवादों से भी घिरा रहा। सिंचाई परियोजनाओं में अनियमितताओं से लेकर सहकारी बैंकों और चीनी मिलों से जुड़े मामलों तक उन पर आरोप लगे। हालांकि, उन्होंने हर राजनीतिक संकट से खुद को उबारा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक समय उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन एनसीपी विभाजन के बाद भाजपा से गठबंधन होने पर इन आरोपों पर चुप्पी छा गई। पार्टी प्रमुख के तौर पर अजित पवार ने आपराधिक मामलों में घिरे नेताओं के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की और अवैध गतिविधियों के प्रति ‘शून्य सहनशीलता’ का संदेश दिया।

