
दौड़ और रील के बीच हरियाणा का युवा, देसी फिटनेस बनी पहचान का नया रास्ता
हरियाणा में देसी फिटनेस रील्स ने कसरत को पहचान, सम्मान और करियर बना दिया है। अखाड़ा, अनुशासन और कैमरा अब युवाओं की नई ताकत हैं।
हरियाणा के कुछ हिस्सों में सुबह पांच बजे दिन की शुरुआत अब दो तरह के अलार्म से होती है। पहला अलार्म दौड़ के लिए, दूसरा रील के लिए। मोबाइल की स्क्रीन जगमगाती है और शांत सुबह को चीरती हुई एक जानी-पहचानी आवाज़ आती है राम-राम भाई सारया ने।
वीडियो छोटा होता है: कच्चे रास्ते पर दौड़, रस्सी कूदना, पुश-अप्स, अखाड़ा स्टाइल की कसरत, झटपट देसी खाना और अनुशासन का वादा। लेकिन संदेश सिर्फ फिटनेस तक सीमित नहीं होता। यह एक पूरी पहचान बेचता है स्थानीय, सख्त, अनुशासित और इसका सबसे गहरा असर उन युवा पुरुषों पर पड़ रहा है जो सिर्फ सेहत नहीं, बल्कि पहचान और सम्मान की तलाश में हैं।
रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स की दुनिया में देसी फिटनेस ने रोज़मर्रा की दिनचर्या को एक फॉर्मेट में बदल दिया है। अब ट्रेनिंग को सिर्फ खेल या लंबे समय की सेहत के रूप में नहीं, बल्कि स्टेटस के रूप में पेश किया जा रहा है। तराशा हुआ शरीर सम्मान का प्रतीक बन गया है। सख्त टाइमटेबल एक पर्सनैलिटी बन चुका है। संदेश सीधा है न तो महंगे जिम की ज़रूरत है, न ही हाई-फाई इक्विपमेंट की। बस चाहिए निरंतरता, एक कैमरा और ऐसा देसी अंदाज़ जो लोगों को भाए।
हरियाणा में यह “वाइब” स्थानीय पहचान और मेहनत की नैतिक भाषा से बनती है। राम-राम, जय बाबा की, बम बोले, जय बजरंग बली जैसे अभिवादन, गांव की पृष्ठभूमि, अखाड़े के संदर्भ और नो एक्सक्यूज़ वाला लहजा सब कुछ अपनापन दर्शाता है। यह संदेश देता है कि यह किसी बड़े शहर से आयात की गई मोटिवेशन नहीं है, बल्कि हमारी अपनी संस्कृति है। सोशल मीडिया एल्गोरिदम जब एक ही बात को बार-बार दोहराता है, तो वह धीरे-धीरे एक आंदोलन जैसी लगने लगती है।
इस ट्रेंड का सबसे बड़ा चेहरा हैं सोनीपत के बयांपुर गांव से आने वाले 27 वर्षीय अंकित बैयानपुरिया। उनके वीडियो, खासकर चैलेंज-स्टाइल रूटीन, राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने। 8 मार्च 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड (बेस्ट हेल्थ एंड फिटनेस क्रिएटर) से सम्मानित किया। उस मुलाकात में बैयानपुरिया ने अपना 75 हार्ड चैलेंज भी बताया जिसमें रोज़ दो वर्कआउट (एक बाहर), सख्त डाइट, भरपूर पानी, रोज़ 10 पेज पढ़ना और हर दिन प्रोग्रेस की फोटो पोस्ट करना शामिल है। यह सिर्फ एक क्रिएटर का सम्मान नहीं था, बल्कि एक पूरे जॉनर की मुहर थी।
बैयानपुरिया की लोकप्रियता का पैमाना चौंकाने वाला है। दिसंबर 2025 तक उनके इंस्टाग्राम पर करीब 84.4 लाख फॉलोअर्स, यूट्यूब पर लगभग 47 लाख सब्सक्राइबर्स, फेसबुक पर करीब 1.47 लाख लाइक्स और X (ट्विटर) पर लगभग 3.95 लाख फॉलोअर्स बताए जाते हैं।
लेकिन हरियाणा की देसी फिटनेस सिर्फ एक चेहरे तक सीमित नहीं है। झज्जर जिले के ढंडलान गांव से राहुल ढंडलानिया (25) और झज्जर के ही सुंदर सांगवान (28) भी इसी इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। इनके कंटेंट में बॉडीबिल्डिंग, देसी डाइट सलाह, मोटिवेशनल बातें और सांस्कृतिक संकेतों की भरमार होती है। इनका प्रभाव सिर्फ देखा नहीं जाता, बल्कि कॉपी किया जाता है — हॉस्टल के गलियारों में, जिम के शीशों में और व्हाट्सऐप स्टेटस पर।
MDU रोहतक के छात्र कुलदीप कुमार कहते हैं, “राहुल, अंकित और सुंदर साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं। इनके पास अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल मेडल नहीं हैं, फिर भी सोशल मीडिया पर इनकी जबरदस्त फैन फॉलोइंग है। लोग रील्स देखते हैं और बदले में इन्हें फिटनेस प्रोडक्ट्स बेचने के ऑफर मिलते हैं। हरियाणा के युवा इनके दीवाने हैं — ये छोटी रील्स इन्हें तुरंत शोहरत, पैसा और पहचान दे रही हैं।”
हरियाणा में देसी फिटनेस का उभार 2020 के आसपास शॉर्ट-वीडियो बूम से जुड़ा है। 2021–22 में यह मजबूत हुआ और 2023–24 में चरम पर पहुंच गया। बैयानपुरिया 2023 के “75 हार्ड” चैलेंज के जरिए पहले राष्ट्रीय ब्रेकआउट बने। राहुल 2017 से धीरे-धीरे अपना आधार बना रहे थे और सुंदर 2023 के बाद उभरे।
दृश्य भाषा भी साफ है। ट्रेडमिल नहीं, कच्चा रास्ता ही हीरो है। चमचमाता जिम नहीं, अखाड़ा ही मंच है। हैंडहेल्ड कैमरा, तेज़ कट्स और परिचित संगीत। दूध, बेसन, लस्सी, अंडे जैसे “देसी डाइट” शॉट्स सांस्कृतिक प्रमाण की तरह दिखाए जाते हैं। फिटनेस को “साइंस” नहीं, बल्कि “हरियाणा का तरीका” बताया जाता है।
इस ऑनलाइन लोकप्रियता का असर ऑफलाइन भी दिखता है। राहुल और सुंदर जहां जाते हैं, भीड़ लग जाती है। विश्वविद्यालयों में इन्हें खास मेहमान के तौर पर बुलाया जाता है। छात्र सेल्फी लेने के लिए लाइन लगाते हैं और इनके “राम-राम” स्टाइल को अपनाते हैं।
जिमों के अंदर भी असर साफ है। रोहतक के एक गांव के जिम-गोअर परवीन कुमार कहते हैं, “अब हर दूसरा व्यक्ति कैमरा लेकर घूम रहा है। सेट्स के बीच सेल्फी, हर एक्सरसाइज़ की रिकॉर्डिंग — सोशल पहचान अब ट्रेनिंग से मुकाबला करने लगी है।”
उनके मुताबिक देसी फिटनेस क्रिएटर्स इसलिए प्रभावी हैं क्योंकि वे रील्स की भाषा समझते हैं — कीचड़, अखाड़ा, देसी खाना कैमरे पर ‘रियल’ लगता है और बिकता है।
हालांकि आलोचना भी है। हरियाणा पुलिस के इंस्पेक्टर और वर्ल्ड पुलिस एंड फायर गेम्स के गोल्ड मेडलिस्ट नवीन मोर कहते हैं, हमारे कोच कहते थे। फोकस चाहिए तो मीडिया से दूर रहो। आज 30 सेकंड की रील में लोग खुद को फिटनेस गुरु बना रहे हैं। इसे असली ट्रेनिंग का विकल्प मानना मज़ाक है। वहीं समर्थक कहते हैं कि कम से कम ये युवा को मैदान में तो ला रहे हैं।
कमाई भी अब इस कहानी का बड़ा हिस्सा है। यूट्यूब एड रेवेन्यू, ब्रांड डील्स, एफिलिएट कोड्स, पेड प्लान्स और ऑफलाइन इवेंट्स सब मिलकर एक नई अर्थव्यवस्था बना रहे हैं। सुंदर सांगवान ने खुद कहा, मेरे पास न पढ़ाई थी, न स्किल। सोशल मीडिया ने सब कुछ दिया पक्का घर, दुकान, पहचान, शादी के रिश्ते।
यह सिर्फ पैसे की कहानी नहीं है, बल्कि सम्मान, सामाजिक हैसियत और सपनों की है। हरियाणा में, जहां प्रतिष्ठा अक्सर अवसर से तेज़ चलती है, फॉलोअर्स की गिनती सामाजिक प्रमाण बन गई है।देसी फिटनेस सिर्फ “मज़बूत बनो” नहीं कहती, बल्कि कहती है मज़बूत दिखो। असली बदलाव यही है। कच्चा रास्ता अब सिर्फ ट्रेनिंग की जगह नहीं रहा, बल्कि ऑडिशन का मंच बन गया है। और हरियाणा के कई युवाओं के लिए यह ऑडिशन अब करियर जैसा दिखने लगा है।

