
ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट पर आदिवासी विरोध, अधिकार और पर्यावरण को लेकर चिंता
आदिवासी नेताओं ने पारदर्शिता की कमी, विस्थापन के डर और पर्यावरणीय जोखिमों को लेकर चिंता जताई है, जबकि सरकार 72,000 करोड़ रुपये की विकास योजना को आगे बढ़ा रही है।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के आदिवासी नेताओं ने सोमवार को एक बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को लेकर गंभीर चिंताएं जताईं। उनका आरोप है कि इस परियोजना में पारदर्शिता की कमी है, पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है और आदिवासी अधिकारों की अनदेखी हो रही है।
ग्रेट निकोबार का समग्र विकास’ नाम की इस परियोजना में 160 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और पावर प्लांट का निर्माण प्रस्तावित है।
इसमें लगभग 130 वर्ग किलोमीटर जंगल शामिल हैं, जहां अनुसूचित जनजाति निकोबारी और अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समूह (PVTG) शोंपेन रहते हैं, जिनकी आबादी लगभग 200 से 300 के बीच मानी जाती है।
स्थानीय लोगों की चिंता
पुलोभाभी गांव के फर्स्ट कैप्टन (ग्राम प्रमुख) टाइटस पीटर ने कहा कि ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे क्षेत्र के लोग इस परियोजना के कारण कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने सरकार से अपील की कि स्थानीय लोगों की चिंताओं पर ध्यान दिया जाए।
उन्होंने आशंका जताई कि बाहरी लोगों के संपर्क बढ़ने से शोंपेन जनजाति को बीमारियों का खतरा हो सकता है, जिससे उनके अस्तित्व पर संकट आ सकता है।
पर्यावरणीय खतरे का मुद्दा
पीटर ने यह भी चेतावनी दी कि यह परियोजना द्वीप की विशिष्ट (एंडेमिक) प्रजातियों को नुकसान पहुंचा सकती है। उनका आरोप है कि प्रशासन ने परियोजना के बारे में पूरी जानकारी साझा नहीं की, जिससे आदिवासी समुदाय इसके वास्तविक प्रभाव से अनजान हैं।
विस्थापन की यादें और विरोध
ग्रेट निकोबार और लिटिल निकोबार के ट्राइबल काउंसिल के अध्यक्ष बरनाबास मंजू ने 2004 की सुनामी के बाद हुए विस्थापन को याद किया। उन्होंने कहा कि कई आदिवासी परिवारों को अन्य द्वीपों पर बसाया गया था और वे आज भी अपने पैतृक घरों में लौटने का इंतजार कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, *“बार-बार अनुरोध के बावजूद हमारे पुनर्वास और पारंपरिक भूमि की बहाली पर ध्यान नहीं दिया गया।”*
मंजू ने कहा कि भले ही सरकार मुआवजा दे, लेकिन आदिवासी समुदाय अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं है, क्योंकि उनका अपने पैतृक क्षेत्र से गहरा जुड़ाव है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यह पर्यावरण को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाकर नहीं होना चाहिए।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
अंडमान और निकोबार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कैंपेन कमेटी चेयरमैन जी. भास्कर ने बताया कि एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में नई दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात कर उन्हें स्थिति से अवगत कराया।
भास्कर के अनुसार, राहुल गांधी ने आदिवासी समुदायों का समर्थन किया और खुद ग्रेट निकोबार जाकर हालात का जायजा लेने का आश्वासन दिया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने परियोजना की पूरी जानकारी दिए बिना आदिवासियों से ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC)’ हासिल कर लिया।
पुनर्विचार की मांग
प्रतिनिधियों ने परियोजना में अधिक पारदर्शिता, आदिवासी समुदायों से उचित परामर्श और पर्यावरण व स्थानीय अधिकारों की रक्षा के लिए योजना की समीक्षा की मांग की है।
उन्होंने कहा कि निकोबार द्वीप समूह के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा बेहद जरूरी है।

