
गुजरात में अंतर-धार्मिक शादियों पर असर? नए नियम पर उठे सवाल
गुजरात में प्रस्तावित नियम के तहत वयस्कों की शादी से पहले माता-पिता को सूचना और 30 दिन की जांच अनिवार्य होगी, जिस पर निजता और स्वतंत्रता को लेकर बहस छिड़ी है।
गुजरात सरकार ने विवाह पंजीकरण कानून में एक प्रस्तावित संशोधन की घोषणा की है, जिसके तहत दो वयस्कों के आपसी सहमति से विवाह का पंजीकरण कराने से पहले उनके माता-पिता को सूचित करना अनिवार्य होगा। मसौदा नियमों के अनुसार, विवाह पंजीकरण के लिए आवेदन करने वाले जोड़े को अपने माता-पिता के संपर्क विवरण देने होंगे और यह बताना होगा कि क्या उन्होंने विवाह की जानकारी उन्हें दी है। इसके बाद विवाह रजिस्ट्रार पंजीकरण प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले माता-पिता को नोटिस जारी करेगा।
इस प्रस्ताव में विवाह प्रमाणपत्र जारी करने से पहले 30 दिन की सत्यापन अवधि का प्रावधान भी शामिल है। आलोचकों का कहना है कि यह अवधि विवाह प्रक्रिया में अनावश्यक देरी या बाधा उत्पन्न कर सकती है।
प्रस्ताव के समर्थन और विरोध में तर्क
समर्थकों का तर्क है कि यह कदम धोखाधड़ी रोकने और तथाकथित लव जिहाद जैसे मामलों से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के उद्देश्य से उठाया गया है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह प्रावधान एक ऐसे कानूनी प्रक्रिया में अभिभावकीय निगरानी जोड़ता है, जो केवल दो वयस्कों की सहमति पर आधारित होती है।
मौजूदा कानूनों के तहत यदि दोनों व्यक्ति वयस्क हैं तो माता-पिता की सहमति आवश्यक नहीं होती। विवाह पंजीकरण को एक प्रशासनिक प्रक्रिया माना जाता है, न कि परिवार की अनुमति पर निर्भर निर्णय। विरोधियों का कहना है कि माता-पिता को अनिवार्य रूप से सूचित करने की शर्त विशेष रूप से अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाह करने वाले जोड़ों के लिए अप्रत्यक्ष बाधाएं खड़ी कर सकती है।
संवैधानिक पहलू
कानूनी विशेषज्ञ संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हैं, जो निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है जिसमें अपने जीवनसाथी को चुनने की स्वतंत्रता भी शामिल है।2018 के ऐतिहासिक हदिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि बालिग भारतीयों को अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने की स्वतंत्रता है। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था, “विवाह से जुड़ी निजी निकटताएं, जिसमें यह निर्णय भी शामिल है कि विवाह करना है या नहीं और किससे करना है, राज्य के नियंत्रण से बाहर हैं। संविधानिक स्वतंत्रताओं के संरक्षक के रूप में न्यायालयों का दायित्व है कि वे इन अधिकारों की रक्षा करें।
न्यायालय ने सहमति से साथ रहने (लिव-इन रिलेशनशिप) की वैधता को भी मान्यता दी है और यह स्पष्ट किया है कि धर्मांतरण-विरोधी कानून वयस्कों के विवाह के अधिकार को निरस्त नहीं करते।
भारत में विवाह संबंधी कानून
Special Marriage Act, 1954 नागरिक विवाह की अनुमति देता है, जिसमें धार्मिक अनुष्ठान या माता-पिता की सहमति आवश्यक नहीं होती। विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानून विवाह की रस्मों और परंपराओं को नियंत्रित करते हैं, लेकिन यदि दोनों पक्ष वयस्क हों तो वे भी अभिभावकीय अनुमति को अनिवार्य नहीं ठहराते।गुजरात सहित कई राज्य अंतर-जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन भी देते हैं, जहां कानूनी रूप से माता-पिता की सहमति अनिवार्य नहीं है।
व्यापक बहस
गुजरात द्वारा विवाह पंजीकरण नियमों के माध्यम से जो बदलाव प्रस्तावित किया गया है, वह देशभर में प्रचलित मानक व्यवस्था का हिस्सा नहीं है। अब बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या माता-पिता को अनिवार्य सूचना देने का प्रावधान वयस्कों की संवैधानिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता का उल्लंघन करता है।
चर्चा जारी है, लेकिन यह प्रस्ताव एक मूल प्रश्न खड़ा करता है क्या राज्य उन व्यक्तिगत निर्णयों में माता-पिता को शामिल कर सकता है, जिन्हें संविधान ने वयस्कों की निजी स्वतंत्रता के दायरे में रखा है?

