
पलवल का छायंसा गांव बना 'डेथ वैली': 20 से ज्यादा मौतें और सिस्टम लाचार!
हरियाणा के पलवल में दूषित पानी और झोलाछाप डॉक्टरों के कारण फैली हेपेटाइटिस की महामारी! 12 साल के बच्चों से लेकर जवानों तक की लीवर फेलियर से मौत, गांव में मातम।
Palwal Chhaisa Village Story : हरियाणा के पलवल जिले का छायंसा गांव इस समय एक भीषण मानवीय त्रासदी के केंद्र में है। पिछले एक महीने के भीतर इस गांव ने अपनी आंखों के सामने 20 जिंदगियां ख़त्म होते हुए देखा है। इन मौतों के पीछे का मुख्य कारण दूषित पेयजल, सरकारी तंत्र की अनदेखी और गांव में सक्रिय झोलाछाप डॉक्टरों की जानलेवा लापरवाही को माना जा रहा है। गांव के हर दूसरे घर में कोई न कोई बीमार है और हर व्यक्ति के चेहरे पर मौत का खौफ साफ दिखाई देता है। आलम यह है कि महज 11 साल के बच्चे से लेकर 24 साल के हट्टे-कट्टे जवानों तक का लिवर महज तीन से चार दिनों के भीतर पूरी तरह खराब हो गया और उन्हें बचाने का मौका तक नहीं मिला।
केस स्टडी 1: जवान बेटे की मौत और सिस्टम पर सवाल
छायंसा गांव के निवासी हकीमुद्दीन के घर में आज मातम पसरा है। उनके 24 साल के जवान बेटे दिलशाद की मौत ने पूरे परिवार को झकझोर दिया है। हकीमुद्दीन बताते हैं कि 6 फरवरी को उनके बेटे को मामूली बुखार हुआ था। उन्होंने गांव के ही एक स्थानीय डॉक्टर को दिखाया, जिसने कुछ गोलियां दीं। जब राहत नहीं मिली, तो अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट कराया गया। रिपोर्ट में पता चला कि दिलशाद के लीवर और आंतों में गंभीर सूजन है और उसे काला पीलिया (हेपेटाइटिस) हो गया है।
9 फरवरी को उसे नल्हड़ के सरकारी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। हकीमुद्दीन का आरोप है कि उनका बेटा खुद चलकर एम्बुलेंस तक गया था, वह इतना गंभीर नहीं दिख रहा था। लेकिन अस्पताल में भर्ती होने के 48 घंटों के भीतर ही डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। परिजनों का गंभीर आरोप है कि प्राइवेट लैब संचालकों और डॉक्टरों के बीच साठगांठ है। जांच के नाम पर 5000 रुपये वसूले गए, लेकिन रिपोर्ट 48 घंटे बाद भी नहीं दी गई। दिलशाद की शादी महज छह महीने पहले हुई थी।
केस स्टडी 2: मासूम सारिक की अधूरी कहानी
मोहम्मद साकिर का साढ़े तेरह साल का बेटा सारिक सातवीं कक्षा में पढ़ता था। साकिर के अनुसार सारिक देखने में अठारह साल के युवक जैसा तंदुरुस्त और खूबसूरत था। साकिर बताते हैं कि सारिक को सिर्फ एक दिन बुखार चढ़ा। स्थानीय डॉक्टर से सुई लगवाने के बाद उसके पेट में तेज दर्द शुरू हो गया। अल्ट्रासाउंड में लीवर फेलियर और पेट में पानी भरने की पुष्टि हुई। 26 जनवरी को उसे मेडिकल कॉलेज ले जाया गया और अगली सुबह उसकी मौत हो गई। साकिर का कहना है कि गांव में 20 जनवरी से ही मौतों का सिलसिला शुरू हुआ था, लेकिन प्रशासन ने तब ध्यान दिया जब मीडिया में शोर मचा।
केस स्टडी 3: बुजुर्गों और महिलाओं पर कहर
गांव के खुशी मोहम्मद ने महज दस दिनों के भीतर अपनी मां और अपनी पत्नी दोनों को खो दिया। उनकी 55 वर्षीय पत्नी को बुखार आया, जिसे स्थानीय स्तर पर पीलिया बताया गया। नूंह के अस्पताल ले जाते समय उनकी हालत बिगड़ गई और उन्होंने दम तोड़ दिया। इसी तरह असरुद्दीन का 12 साल का पोता हुज़ैफ़ा भी इस बीमारी की भेंट चढ़ गया। उसे पलवल और फिर फरीदाबाद ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि बच्चे का लीवर 90 प्रतिशत तक डेड हो चुका है।
दूषित पानी और 'बासी जल' का संकट
गांव में मौतों का सबसे बड़ा कारण पानी को माना जा रहा है। शाहिद नाम के ग्रामीण ने बताया कि गांव के चारों तरफ 20 सालों से जंगलों में गंदा पानी भरा हुआ है। वाटर सप्लाई की पाइपलाइनें लीक हैं, जिससे गंदा पानी घरों तक पहुंच रहा है। गांव में पीने के पानी का घोर संकट है। ग्रामीण 150 रुपये महीना देकर कुंडा ( कुएं नुमा पानी स्टोर करने का साधन ) से पानी खरीदते हैं। पानी जमीन के भीतर बने कुंडों में स्टोर करते हैं। यह पानी डेढ़-डेढ़ महीने तक उसी कुंडे में रहता है, जिसे ग्रामीण 'बासी पानी' कहते हैं। भीषण गर्मी और गंदगी के बीच यह पानी जहर संक्रमित हो सकता है, लेकिन प्यास बुझाने का कोई दूसरा साधन नहीं है।
झोलाछाप डॉक्टरों की जानलेवा सिरिंज
ग्रामीणों ने एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। गांव में सक्रिय झोलाछाप डॉक्टर एक ही सिरिंज (सुई) का इस्तेमाल कई मरीजों पर करते हैं। मोहम्मद साकिर के अनुसार, ये डॉक्टर सुबह से शाम तक एक ही पंप से सुई लगाते रहते हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने भी जांच में पाया है कि हेपेटाइटिस बी और सी फैलने का यह एक प्रमुख कारण हो सकता है। जब एक संक्रमित व्यक्ति को लगाई गई सुई दूसरे स्वस्थ व्यक्ति को लगाई जाती है, तो वायरस सीधे खून में प्रवेश कर जाता है और लीवर पर हमला करता है।
प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग का पक्ष (डॉक्टर का वर्जन)
पलवल जिला अस्पताल की की मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) सिविल सर्जन सतिंदर वशिष्ठ के अनुसार, स्थिति अब नियंत्रण में है। उन्होंने बताया कि विभाग के पास आधिकारिक तौर पर लीवर फेलियर से 7 मौतों का आंकड़ा है। अन्य मौतों को बुढ़ापे या अन्य बीमारियों से जोड़ कर देखा जा रहा है। डॉक्टर ने बताया कि हेपेटाइटिस बी और सी एक 'ब्लड बॉर्न' बीमारी है। यह दूषित सुई, असुरक्षित यौन संबंध या संक्रमित खून चढ़ाने से फैलती है।
प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए गांव में सक्रिय झोलाछाप डॉक्टरों पर छापा मारा है और दो एफआईआर दर्ज की गई हैं। हालांकि, छापे के दौरान कई डॉक्टर क्लीनिक बंद करके फरार हो गए। स्वास्थ्य विभाग ने गांव में 550 से अधिक लोगों के सैंपल लिए हैं और ओपीडी कैंप लगाए हैं। पानी की समस्या को सुलझाने के लिए जनस्वास्थ्य विभाग को सूचित कर दिया गया है। फिलहाल 11 फरवरी के बाद से गांव में कोई नई मौत दर्ज नहीं हुई है। बीमारी कैसे फैली इसकी जांच अभी जारी है। दिल्ली से भी डॉक्टरों की टीम आई है, जो इन्वेस्टीगेशन में जुटी हुई है।
दहशत में जी रहा है पूरा गांव
छायंसा गांव में आज स्थिति यह है कि किसी को हल्का बुखार भी आता है, तो उसे लगता है कि उसकी मौत निश्चित है। गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा है और लोग प्रशासन से शुद्ध पेयजल की गुहार लगा रहे हैं। विधायक मोहम्मद इसराइल ने भी इस मामले को विधानसभा में उठाया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक पानी की निकासी और साफ पानी की व्यवस्था नहीं होगी, यह बीमारी फिर से पैर पसार सकती है। 20 से अधिक परिवारों के चिराग बुझ चुके हैं और पूरा गांव अब भी किसी अनहोनी की आशंका में जी रहा है।

