क्या SIR विवाद ने बंगाल की चुनावी सरगर्मी को किया फीका?
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क्या SIR विवाद ने बंगाल की चुनावी सरगर्मी को किया फीका?

ममता सरकार को सरकार को 44% लोगों ने अच्छा माना है। वहीं लोगों की पसंद के मामले में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री के तौर पर सबसे आगे हैं, जबकि बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है।


पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले आमतौर पर जो उत्साह और गर्म चुनावी माहौल देखने को मिलता है, वह इस बार काफी हद तक गायब है। Vote Vibe नाम के एक स्वतंत्र पब्लिक ओपिनियन प्लेटफॉर्म के संस्थापक अमिताभ तिवारी का मानना है कि इसकी वजह मतदाता सूची की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया से जुड़ा विवाद है, जिसने राज्य की राजनीति को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है।

उनके अनुसार, बंगाल में पार्टी कार्यकर्ता, नेता और आम मतदाता इन दिनों इस बात में व्यस्त हैं कि उनका नाम वोटर लिस्ट में सही तरीके से दर्ज हो। इसी वजह से चुनाव से पहले होने वाला सबसे अहम काम चुनावी प्रचार फिलहाल पीछे छूट गया है।

इसी पृष्ठभूमि में, Vote Vibe द्वारा किया गया एक हालिया सर्वे 2026 के चुनाव से पहले राज्य के राजनीतिक माहौल को समझने की कोशिश करता है। “AI with Sanket” के इस एपिसोड में लेखक ने अमिताभ तिवारी से उनके सर्वे के नतीजों, मतदाताओं के मूड और चुनावी राजनीति को प्रभावित करने वाले नैरेटिव्स पर बातचीत की। बातचीत के कुछ मुख्य अंश इस प्रकार हैं:

क्या आपको लगता है कि इस बार पश्चिम बंगाल चुनाव में पहले जैसा चुनावी माहौल नहीं दिख रहा?

हाँ, काफी हद तक ऐसा ही है, और इसकी बड़ी वजह SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) की प्रक्रिया है। 28 फरवरी को जो मतदाता सूची जारी हुई थी, उसके बाद से लगभग पूरा वोटर वर्ग अपने नाम की जांच कराने या उसे चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपडेट कराने में लगा हुआ है।

पार्टी कार्यकर्ता और बूथ स्तर के नेता भी यह सुनिश्चित करने में व्यस्त हैं कि उनके समर्थकों के नाम वोटर लिस्ट में बने रहें। अगर किसी का नाम सूची में नहीं है या उसमें कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो वे लोगों को सुनवाई और सत्यापन प्रक्रिया में शामिल होने में मदद कर रहे हैं। इस वजह से पूरी राजनीतिक व्यवस्था चाहे सत्तारूढ़ दल हो या विपक्ष के कार्यकर्ता और नेता इसी काम में लगे हुए हैं।

तिवारी के अनुसार, पश्चिम बंगाल ही ऐसा राज्य है जहां SIR की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। बाकी राज्यों में, चाहे वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार हो या विपक्ष की, यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। लेकिन कई तरह की प्रशासनिक अड़चनों की वजह से चुनाव आयोग यहां इसे अभी तक पूरा नहीं कर पाया है।

इसी वजह से पहले के चुनावों में जो असली चुनावी माहौल देखने को मिलता था। जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियाँ होती थीं और उनके जवाब में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी जोरदार प्रचार करती थीं। वह इस बार अभी तक जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है।

आपके सर्वे में राज्य सरकार के काम को 44 प्रतिशत लोगों ने सकारात्मक रेटिंग दी है। इसका क्या मतलब है?

असल में लगभग 44 प्रतिशत लोगों ने सरकार के काम को अच्छा बताया है, जबकि करीब 31 प्रतिशत लोग इससे संतुष्ट नहीं हैं। यानी सकारात्मक राय रखने वालों की संख्या नकारात्मक राय से करीब 13 प्रतिशत ज्यादा है। इसके अलावा करीब 15 प्रतिशत मतदाता ऐसे हैं जो न्यूट्रल हैं। यह न्यूट्रल वोटर जिस तरफ झुकेंगे, उसी को चुनाव में फायदा मिल सकता है। चाहे वह मौजूदा सरकार हो या विपक्ष।

यह एक दिलचस्प पैटर्न भी दिखाता है। दक्षिण भारत के राज्यों जैसे केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में अक्सर हर पाँच साल में सरकार बदल जाती है। लेकिन पूर्वी भारत के राज्यों जैसे बिहार, बंगाल और ओडिशाऔर अब झारखंड में अक्सर मौजूदा सरकार के पक्ष में रुझान दिखाई देता है।

उदाहरण के तौर पर, पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों की सरकार 34 साल तक सत्ता में रही, उसके बाद ममता बनर्जी सत्ता में आईं। इसी तरह बिहार में भी लालू प्रसाद यादव से नीतीश कुमार तक सत्ता में लंबे समय का बदलाव देखा गया।

यह आर्थिक कारणों से भी जुड़ा हो सकता है। पूर्वी राज्यों में प्रति व्यक्ति आय कम होती है और लोग सरकारी योजनाओं पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। जब लोग कल्याणकारी योजनाओं पर ज्यादा निर्भर होते हैं, तो वे अक्सर सरकार में निरंतरता चाहते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि नई सरकार आने पर कहीं उन्हें मिलने वाले फायदे बंद न हो जाएँ।

आपके सर्वे में मुख्यमंत्री के रूप में पसंद के सवाल पर ममता बनर्जी काफी आगे दिखाई दे रही हैं। इसकी वजह क्या है?

आमतौर पर जब भी यह सवाल पूछा जाता है, तो मौजूदा मुख्यमंत्री को 3 से 5 प्रतिशत ज्यादा समर्थन मिल जाता है, क्योंकि लोगों के दिमाग में उनका नाम सबसे पहले आता है। सरकारी विज्ञापनों और अभियानों में भी मुख्यमंत्री का चेहरा हर जगह दिखाई देता है। यह फायदा तब और बढ़ जाता है जब विपक्ष अपनी ओर से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं करता।

बीजेपी के मामले में नेतृत्व पूरी तरह एक जगह केंद्रित नहीं है। कुछ लोग सुवेंदु अधिकारी (विपक्ष के नेता) को पसंद करते हैं, कुछ समिक भट्टाचार्य (राज्य बीजेपी अध्यक्ष) को, और कुछ दिलीप घोष (पूर्व राज्य बीजेपी अध्यक्ष) को। हालांकि, वोट देते समय लोग सिर्फ मुख्यमंत्री के चेहरे को ही नहीं देखते। वे कई बातों को ध्यान में रखते हैं, जैसे प्रधानमंत्री का चेहरा, मुख्यमंत्री का चेहरा, सरकार का काम, सरकारी योजनाओं का लाभ, राजनीतिक नैरेटिव, जाति, धर्म, उम्मीदवार और पार्टी का चुनाव चिन्ह।

हमारे पहले किए गए सर्वे में पाया गया था कि मुख्यमंत्री का चेहरा केवल लगभग 12–15 प्रतिशत मतदाताओं के लिए ही महत्वपूर्ण होता है। हालांकि 15 साल से सत्ता में होने के बावजूद ममता बनर्जी अभी भी बंगाल की सबसे ज्यादा पहचानी जाने वाली नेता हैं। उनके मुकाबले में अभी तक कोई ऐसा करिश्माई नेता सामने नहीं आया है जो स्वाभाविक रूप से उनके नेतृत्व को चुनौती दे सके।

क्या बीजेपी नेताओं की तुलना ममता बनर्जी से करना सही है, जबकि बीजेपी चुनाव में मुख्य रूप से मोदी के नाम पर प्रचार करती है?

किसी हद तक यह सही है। चुनावों में बीजेपी का मुख्य चेहरा अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही होते हैं। कई चुनावों में यही पैटर्न देखा गया है। लेकिन जब मतदाताओं से पूछा जाता है कि मुख्यमंत्री कौन होना चाहिए, तब वे जानते हैं कि मोदी बंगाल के मुख्यमंत्री नहीं बन सकते। इसलिए वे राज्य के उपलब्ध नेताओं में यह देखते हैं कि कौन ममता बनर्जी को चुनौती देने के लिए सबसे उपयुक्त है या अगर बीजेपी जीतती है तो कौन मुख्यमंत्री बन सकता है।

आपके सर्वे में बेरोजगारी को बंगाल का सबसे बड़ा मुद्दा बताया गया है। चुनाव में इसकी कितनी अहमियत है?

दरअसल, भारत में लगभग हर सर्वे में बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा बनकर सामने आती है। इसकी वजह यह है कि देश में युवा आबादी बहुत ज्यादा है, लेकिन रोजगार के अवसर सीमित हैं। लेकिन वोट देने का फैसला सिर्फ मुद्दों के आधार पर ही नहीं होता। बंगाल में करीब 20 प्रतिशत मतदाता ऐसे हैं जिन पर मुद्दों का असर पड़ता है। इनमें से 36 प्रतिशत लोग बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं।

इसका मतलब है कि कुल मिलाकर लगभग 7 प्रतिशत मतदाता ऐसे हो सकते हैं जो मुख्य रूप से बेरोजगारी के आधार पर वोट दें। इसलिए पूरे चुनावी नतीजे पर मुद्दों का असर कुछ कम हो जाता है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जो लोग बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा बताते हैं, जरूरी नहीं कि वे खुद बेरोजगार ही हों। और अगर वे बेरोजगार भी हैं, तब भी यह जरूरी नहीं कि वे केवल इसी मुद्दे के आधार पर वोट दें।

कोई मतदाता बेरोजगार हो सकता है, लेकिन फिर भी वह प्रधानमंत्री के चेहरे, मुख्यमंत्री के चेहरे या सरकार की योजनाओं का लाभ मिलने की वजह से वोट दे सकता है।

सवाल यह है कि जब सर्वे में इनकी प्रतिक्रिया कम होती है, तब भी अवैध घुसपैठ या इनसाइडर बनाम आउटसाइडर जैसे मुद्दे चुनाव प्रचार में इतने हावी क्यों रहते हैं?

दरअसल, सूची के नीचे वाले मुद्दे असल में रोजमर्रा की समस्याएँ नहीं बल्कि राजनीतिक नैरेटिव होते हैं। ऊपर बताए गए मुद्दे असली समस्याएँ हैं, जैसे बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार। लेकिन चुनावी राजनीति अक्सर नैरेटिव (कथानक) के आसपास घूमती है। दुर्भाग्य से राजनीति में कई बार ऐसे नैरेटिव चर्चा पर हावी हो जाते हैं, भले ही वे लोगों की रोजमर्रा की सबसे बड़ी समस्या न हों।

कई लोगों का मानना है कि बीजेपी और टीएमसी के बीच कोई अंदरूनी समझ है। ऐसा क्यों माना जाता है?

यह सवाल सीधे जमीनी बातचीत से सामने आया है। लोगों ने हमसे इस बारे में मैदान में बातचीत के दौरान और सोशल मीडिया पर भी कई बार पूछा। इस धारणा की एक वजह यह है कि टीएमसी के महासचिव अभिषेक बनर्जी पर लगे आरोपों को कुछ लोग ज्यादा गंभीर मानते हैं, खासकर जब उनकी तुलना झारखंड के नेता हेमंत सोरेन या दिल्ली के नेता अरविंद केजरीवाल से जुड़े मामलों से की जाती है।

एक और कारण यह भी है कि SIR की प्रक्रिया ज्यादातर राज्यों में पूरी हो चुकी है, यहां तक कि केरल और तमिलनाडु जैसे विपक्षी दलों के शासन वाले राज्यों में भी। लेकिन पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।

इसलिए कुछ लोगों का मानना है कि कांग्रेस को मुकाबले से बाहर रखने के लिए बीजेपी और टीएमसी के बीच कोई अंदरूनी समझ हो सकती है। सर्वे में 41 प्रतिशत लोगों ने इस धारणा को सही माना, जबकि 41 प्रतिशत लोग इस बारे में निश्चित नहीं हैं। वहीं करीब 18 प्रतिशत लोगों ने इसे साफ तौर पर खारिज किया। लगभग आधे उत्तरदाताओं का यह भी मानना है कि टीएमसी अवैध घुसपैठ को बढ़ावा दे रही है।

इससे क्या संकेत मिलता है?

जब 47 प्रतिशत लोग इस आरोप से सहमत होते हैं, तो इसका मतलब है कि इस मुद्दे पर बीजेपी का नैरेटिव कुछ हद तक लोगों के बीच असर डालने में सफल रहा है। अगर टीएमसी का वोट शेयर लगभग 47–48 प्रतिशत है, तो बाकी 52–53 प्रतिशत वोट टीएमसी के विरोध में माने जा सकते हैं, जो बीजेपी, कांग्रेस, वाम दलों और अन्य पार्टियों में बंटे हुए हैं। इसलिए टीएमसी के विरोध में रहने वाले कई मतदाता स्वाभाविक रूप से इस नैरेटिव से जुड़ सकते हैं।

सर्वे में यह भी पाया गया कि अलग-अलग सामाजिक समूहों में इस धारणा की ताकत अलग-अलग है।

यह सोच अनुसूचित जाति (जिसमें मतुआ समुदाय भी शामिल है), आदिवासी और ओबीसी वर्गों में ज्यादा मजबूत है। वहीं मुस्लिम समुदाय और ऊँची जाति के हिंदुओं, जिन्हें अक्सर ‘भद्रलोक’ कहा जाता है, के बीच यह नैरेटिव उतना प्रभावी नहीं है।

मतदाता मतदाता सूची के SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को कैसे देखते हैं?

एक बेहद ध्रुवीकृत (polarised) राजनीतिक माहौल में लोग अक्सर अपने जवाब अपने राजनीतिक झुकाव के अनुसार देते हैं। पश्चिम बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर लगभग 37 प्रतिशत है। इसलिए लगभग उतने ही प्रतिशत उत्तरदाता SIR प्रक्रिया का समर्थन करते हैं। वहीं, अधिकांश टीएमसी समर्थक जिनके नाम ड्राफ्ट लिस्ट में सही हैं, इसे केवल एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानते हैं। लेकिन करीब 8–10 प्रतिशत मतदाता, जिनके नाम हटा दिए गए हैं या जिनमें कोई गड़बड़ी पाई गई है, मानते हैं कि यह प्रक्रिया चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने के लिए की जा रही है।

आपके सर्वे के अनुसार, ED की IPAC छापे के बाद TMC ने धारणा की लड़ाई जीत ली। ऐसा क्यों?

ममता बनर्जी एक संघर्षशील नेता हैं, जो राजनीतिक संघर्षों के जरिए उभरी हैं। इसके साथ ही वह बहुत चतुर राजनीतिज्ञ भी हैं। अगर आप विवादों पर प्रतिक्रियाओं की तुलना करें तो, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने SIR मुद्दे पर मतदाता अधिकारों के लिए मार्च किया, जबकि ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट गईं और सीधे मतदाताओं की ओर से पेश हुईं।

इस दृष्टिकोण का फर्क बहुत मायने रखता है। ऐसे माहौल में, जहाँ कई लोग मानते हैं कि चुनाव से पहले केंद्र की एजेंसियाँ जैसे ED, CBI और इनकम टैक्स विभाग विपक्षी नेताओं के खिलाफ इस्तेमाल की जाती हैं, ममता बनर्जी ने इस स्थिति का फायदा उठाया।

उन्होंने इस छापे को राजनीतिक निशाना बताया और इसे बंगाली पहचान और क्षेत्रीय गर्व से जोड़ दिया। इसी वजह से कई मतदाता मानते हैं कि उन्होंने पहले ही धारणा की लड़ाई जीत ली है।

लेकिन क्या यह विरोधाभासी नहीं है कि कुछ मतदाता ‘बीजेपी-टीएमसी समझौता’ और ‘ED टार्गेटिंग’ दोनों नैरेटिव पर विश्वास करते हैं?

सर्वे विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि एक सर्वे जिसमें कोई विरोधाभास न हो, वह शायद ड्रॉइंग रूम में बनाया गया हो। जब उत्तरदाता सवालों के जवाब देते हैं, उन्हें यह नहीं पता होता कि अगला सवाल क्या होगा। इसलिए वे हर सवाल का जवाब स्वतंत्र रूप से देते हैं। लेकिन जब हम बाद में पूरे सर्वे का डेटा एक साथ देखते हैं, तो हमें विरोधाभास दिखाई देता है, क्योंकि हम पूरे डेटा को एक नजर में देख रहे हैं, जबकि उत्तरदाता ऐसा नहीं कर रहे होते।

(ऊपर का कंटेंट वीडियो से फाइन-ट्यून किए गए AI मॉडल की मदद से ट्रांसक्राइब किया गया है। सटीकता, गुणवत्ता और संपादकीय अखंडता सुनिश्चित करने के लिए हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हैं। जहाँ AI प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार करता है, वहीं हमारी अनुभवी संपादकीय टीम इसे सावधानीपूर्वक जांचती है, संपादित करती है और प्रकाशित करने से पहले सुधारती है। The Federal में हम AI की दक्षता और मानव संपादकों के अनुभव को मिलाकर विश्वसनीय और ज्ञानवर्धक पत्रकारिता प्रदान करते हैं।)

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