हिमाचल के राज्यपाल ने 50 पन्नों का विधानसभा संबोधन 3 मिनट में निपटाया, केंद्र पर सवाल उठाते पैरा नहीं पढ़े
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राज्यपाल ने भाषण के वे हिस्से नहीं पढ़े, जिन्हें राज्य सरकार ने 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (RDG) बंद किए जाने को लेकर तैयार किया था

हिमाचल के राज्यपाल ने 50 पन्नों का विधानसभा संबोधन 3 मिनट में निपटाया, केंद्र पर सवाल उठाते पैरा नहीं पढ़े

हिमाचल प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र आज शुरू हो गया। सत्र की शुरुआत के पहले दिन ही उस वक्त अजीबोगरीब स्थिति हो गई, जब राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला ने अपने अभिभाषण को पूरा नहीं पढ़ा।


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हिमाचल प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत सोमवार को उस समय चर्चा का विषय बन गई, जब राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने अपना 50 पन्नों का अभिभाषण महज तीन मिनट में समाप्त कर दिया। उन्होंने भाषण के केवल पहले दो पैराग्राफ पढ़े और राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) से जुड़े विवादित हिस्सों को पढ़ने से परहेज किया।

राज्यपाल ने स्पष्ट कहा कि उनके भाषण के पैराग्राफ तीन से सोलह एक संवैधानिक निकाय से संबंधित हैं, इसलिए वे उन्हें पढ़ना उचित नहीं समझते। इसके बाद उन्होंने सत्र के एजेंडे 2025-26 की अनुपूरक मांगें, 2026-27 का बजट और अन्य विधायी कार्य का उल्लेख करते हुए अपना संबोधन समाप्त कर दिया।

दरअसल, भाषण के जिन हिस्सों को नहीं पढ़ा गया, उनमें 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (RDG) बंद किए जाने पर राज्य सरकार की चिंताएं शामिल थीं। यह मुद्दा पिछले कुछ समय से राज्य की राजनीति में प्रमुख बहस का विषय बना हुआ है।

भाषण में यह उल्लेख था कि संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत उन राज्यों को अनुदान दिया जाता है, जो अपने राजस्व और व्यय के बीच की कमी को पूरा नहीं कर पाते। 1952 में पहले वित्त आयोग से लेकर 15वें वित्त आयोग (2020-25) तक हिमाचल प्रदेश को लगातार यह अनुदान मिलता रहा है।

छोड़े गए पैराग्राफ में यह भी कहा गया था कि 16वें वित्त आयोग का निर्णय छोटे और पहाड़ी राज्यों, विशेषकर हिमाचल जैसे विशेष श्रेणी राज्यों, पर गंभीर असर डाल सकता है। पहाड़ी और सीमावर्ती राज्यों में सीमित संसाधनों और भौगोलिक कठिनाइयों के कारण राजस्व सृजन कम होता है, ऐसे में विकास योजनाओं, सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों और आपदा प्रबंधन के लिए यह अनुदान महत्वपूर्ण माना जाता है।

राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस विषय को संबोधन में शामिल न कर राज्यपाल ने सत्र की औपचारिक मर्यादा बनाए रखने पर जोर दिया और राज्य सरकार की उपलब्धियों तथा नियमित विधायी कार्यों तक ही अपने भाषण को सीमित रखा।

माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर विधानसभा के भीतर बजट और विकास प्राथमिकताओं को लेकर तीखी बहस हो सकती है, खासकर तब जब केंद्र से मिलने वाली इस सहायता को बंद करने का फैसला लिया गया है।

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