
भालों- तलवारों से जीती लड़ाई, जब मैसूर लांसर्स ने किया था हैफा पर कब्जा
1918 में मैसूर और जोधपुर लांसर्स ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हैफा को ओटोमन शासन से मुक्त कराया। उनकी घुड़सवार वीरता सैन्य इतिहास की अनोखी घटना मानी जाती है।
23 सितंबर 1918 को मैसूर रियासत द्वारा गठित घुड़सवार सेना मैसूर लांसर्स ने जोधपुर लांसर्स के साथ मिलकर लगभग 400 वर्षों के ओटोमन शासन से इज़राइल के बंदरगाह शहर हैफा को मुक्त कराया। मैसूर लांसर्स का नाम उनके युद्ध में इस्तेमाल होने वाले भाले (लांस) से पड़ा था। ये दोनों रेजिमेंट 15वीं (इम्पीरियल सर्विस) कैवेलरी ब्रिगेड का हिस्सा थीं, जिसमें हैदराबाद लांसर्स और पटियाला लांसर्स भी शामिल थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान यह ब्रिगेड ब्रिटिश सेना के साथ मिलकर फिलिस्तीन में लड़ रही थी।
स्वेज नहर की रणनीतिक अहमियत
ब्रिटिश साम्राज्य के लिए स्वेज नहर यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग था। इसके माध्यम से ब्रिटेन अपने एशियाई उपनिवेशों, विशेषकर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया से संपर्क बनाए रखता था।इस रणनीतिक महत्व को समझते हुए जर्मनी और ओटोमन साम्राज्य ने स्वेज नहर पर कब्जा करने की कोशिश की, ताकि ब्रिटिश आपूर्ति मार्ग बाधित किए जा सकें। इसके जवाब में ब्रिटिश और सहयोगी सेनाओं ने कार्रवाई की।
हैफा की लड़ाई से पहले मैसूर लांसर्स ने उन बेदुइन कबीलों को हराया, जिन्होंने नहर के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर ब्रिटिश कमांडरों ने उन्हें हैफा को मुक्त कराने का जिम्मा सौंपा।इतिहासकारों के अनुसार, इस लड़ाई में मैसूर लांसर्स ने 29 अधिकारी, 444 घुड़सवार सैनिक और 526 घोड़े तैनात किए थे।
बेंगलुरु के शेषाद्रिपुरम कॉलेज में इतिहास की प्रोफेसर पम्पा अरस बताती हैं कि प्रथम विश्व युद्ध में मैसूर लांसर्स ने असाधारण साहस और बलिदान का परिचय दिया। उनके अनुसार स्वेज नहर की रक्षा और हैफा की मुक्ति युद्ध के महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुए।उन्होंने बताया कि हैफा की लड़ाई में उनके परदादा कैप्टन चामराज उर्स और कैप्टन ए. नंजुंडैया उर्स ने मैसूर लांसर्स का नेतृत्व किया था, जबकि उनके एक अन्य परदादा लिंगराज उर्स भी इस युद्ध में शामिल थे।
अरस के मुताबिक इन जीतों ने न केवल ब्रिटिश और मित्र देशों की प्रगति में मदद की, बल्कि मैसूर लांसर्स को विश्व इतिहास में एक प्रतिष्ठित घुड़सवार सेना के रूप में स्थापित कर दिया।
कठिन परिस्थितियों में ऐतिहासिक जीत
इतिहासकारों के अनुसार, ओटोमन और जर्मन सेनाओं ने आधुनिक इज़राइल के उत्तरी हिस्से में स्थित माउंट कार्मेल की पहाड़ियों पर तोपें और मशीनगन तैनात कर मजबूत रक्षा व्यवस्था बनाई थी। इसके बावजूद मैसूर और जोधपुर लांसर्स के सैनिक घोड़ों पर सवार होकर तलवारों और भालों के साथ सीधे दुश्मन पर टूट पड़े। इस हमले से जर्मन सैनिक पीछे हटने को मजबूर हो गए और अंततः हैफा पर कब्जा कर लिया गया।
इतिहासकार राव बहादुर एम. शामा राव ने अपनी 1936 में प्रकाशित पुस्तक Modern Mysore में लिखा है कि मैसूर के सैनिक असाधारण शारीरिक क्षमता और सहनशक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। कठोर मौसम और अजनबी परिस्थितियों में भी वे मेहनत और अनुशासन के लिए जाने जाते थे।
उनके अनुसार घोड़ों को कर्नल देशराज उर्स के नेतृत्व में उत्कृष्ट प्रशिक्षण दिया गया था। सैनिकों के अनुशासन और प्रशिक्षण को देखकर उस समय के भारत के वायसराय ने भी उनकी खुलेआम प्रशंसा की थी।
सैन्य इतिहास में अनोखी लड़ाई
ब्रिटिश कमांडर जनरल एडमंड एलेनबी ने भी इस जीत की प्रशंसा की।सेवानिवृत्त भारतीय सेना अधिकारी महेंद्र सिंह जोधा की पुस्तक The Story of the Jodhpur Lancers (1885–1952) के अनुसार, जब मैसूर लांसर्स माउंट कार्मेल की पहाड़ियों पर तैनात दुश्मन की तोपों को नष्ट कर रहे थे, उसी समय जोधपुर लांसर्स संकरे रास्तों से आगे बढ़े और मशीनगन चौकियों पर हमला किया।
वे सीधे शहर में घुस गए और गलियों में लड़ते हुए तुर्की सैनिकों को भालों से मार गिराया। एलेनबी ने इस लड़ाई को सैन्य इतिहास की एक दुर्लभ घटना बताया, क्योंकि पूरी युद्ध अवधि में इतनी बड़ी घुड़सवार कार्रवाई कहीं और नहीं हुई थी।
मैसूर रियासत का योगदान
प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत में मैसूर के महाराजा कृष्णराज वोडेयार चतुर्थ ने ब्रिटिश सरकार को अपने निजी कोष से 50 लाख रुपये दान दिए थे। इसके अलावा घोड़े, परिवहन वाहन और चिकित्सा सामग्री भी युद्ध मोर्चे पर भेजी गई।मैसूर के तत्कालीन दीवान एच.एम. कंथराज उर्स के नेतृत्व में “मैसूर वॉर फंड” भी बनाया गया। इस फंड में मैसूर सरकार ने 65,08,400 रुपये और जनता ने 42,75,455 रुपये का योगदान दिया। कुल मिलाकर उस समय युद्ध राहत के लिए एक करोड़ रुपये से अधिक जुटाए गए।
युद्ध के बाद सम्मान और स्मारक
युद्ध समाप्त होने के बाद मैसूर सरकार ने सैनिकों और शहीदों के परिवारों को पेंशन, मुआवजा और आवास प्रदान किए। कर्नाटक राज्य अभिलेखागार के अनुसार, शहीद सैनिकों के परिवारों को 1,170 रुपये मुआवजा और युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों को 6,020 रुपये विशेष भत्ते के रूप में दिए गए।साथ ही शहीदों की जमीन की सुरक्षा और उनके बच्चों की शिक्षा व आवास की व्यवस्था भी की गई।
1923 में बेंगलुरु के हेब्बल में मैसूर लांसर्स की याद में एक स्मारक बनाया गया। इसके अलावा नई दिल्ली के तीन मूर्ति हैफा चौक पर भी इम्पीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड का स्मारक मौजूद है।
2018 में इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ यहां श्रद्धांजलि अर्पित की थी। वहीं 2017 में मोदी ने इज़राइल यात्रा के दौरान हैफा स्थित भारतीय युद्ध स्मारक पर भी श्रद्धांजलि दी थी।
विरासत जो धीरे-धीरे भुला दी गई
आज मैसूर लांसर्स की वीरता की यादें शहर के सामान्य जीवन में कहीं-कहीं दिखाई देती हैं। बेंगलुरु के मुनेश्वर स्वामी मंदिर में लगी 250 किलोग्राम की कांस्य घंटी, जिस पर फ्रेंच भाषा में शिलालेख है, उन सैनिकों ने दान की थी जो युद्ध से वापस लौटे थे।हर साल 23 सितंबर (हैफा दिवस) पर लांसर्स के सैनिकों के परिवार इस मंदिर में प्रार्थना करने आते हैं।
हालांकि आज के कई मैसूर निवासी इस इतिहास से परिचित नहीं हैं। हैफा दिवस पर जब सेना के जवान और लांसर्स के परिवार स्मारक पर श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं, तभी यह इतिहास जीवंत हो उठता है।
एक कार्यक्रम में बेंगलुरु के पूर्व पुलिस आयुक्त भास्कर राव ने कहा था कि मैसूर लांसर्स की वीरता की कहानी को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।

