हैदराबाद में पानी की गुणवत्ता पर सवाल, 2009 की यादें फिर ताजा
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हैदराबाद में पानी की गुणवत्ता पर सवाल, 2009 की यादें फिर ताजा

इंदौर की त्रासदी के बाद हैदराबाद में दूषित पानी की शिकायतों ने चिंता बढ़ा दी है। नल का पानी सुरक्षित होने के दावों के बीच भंडारित पानी सबसे बड़ा खतरा बन रहा है।


Hyderabad Water Crisis: इंदौर की हालिया त्रासदी लोगों के ज़हन में अभी ताज़ा ही थी कि सोमवार (5 जनवरी) को हैदराबाद के एक रिहायशी इलाके के लोगों ने पीने के पानी की आपूर्ति में गंदगी की शिकायत की। सरूरनगर के बापूनगर की रोड नंबर 2, 3 और 4 के स्थानीय निवासियों का कहना है कि पिछले एक हफ्ते से पानी की स्थिति ऐसी ही है, लेकिन प्रशासन से की गई शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं हुई।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि जल बोर्ड के अधिकारियों ने पानी की गुणवत्ता को लेकर उनकी चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया और उन्हें या तो पानी को इस्तेमाल से पहले 20 मिनट तक बहने देने या फिर उबालकर पीने की सलाह दी। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब हैदराबाद खुद इंदौर जैसी एक त्रासदी का गवाह रह चुका है। वर्ष 2009 में भोलकपुर इलाके में जहरीली भारी धातुओं और खतरनाक कोलीफॉर्म बैक्टीरिया से दूषित पानी पीने के कारण 14 लोगों की मौत हो गई थी।

भोलकपुर की त्रासदी अब भी यादों में ताज़ा

हालांकि मौजूदा समय में भोलकपुर की स्थिति पहले से बेहतर बताई जा रही है। बांग्लादेश मार्केट (जो कभी बांग्लादेशी प्रवासियों का इलाका था) के निवासियों का कहना है कि अब उन्हें साफ पीने का पानी मिल रहा है। 54 वर्षीय मोहम्मद शकीर, जिन्होंने 2009 में अपने पांच साल के बेटे को खो दिया था, पानी की गुणवत्ता को लेकर आश्वस्त हैं। वे पाइपलाइन से सीधे लिया गया पानी पीकर यह भरोसा जताते हैं।

मोहम्मद शकीर कहते हैं अब जो पानी सप्लाई किया जा रहा है, वह साफ है। उसकी गुणवत्ता की जांच होती है और अगर किसी तरह की आशंका हो तो हमें पहले ही चेतावनी दी जाती है। 2009 की घटना के बाद नई पानी की पाइपलाइनें ज़मीन के दो फीट नीचे डाली गईं और सीवर लाइनें चार फीट और नीचे की गईं। कई सालों तक एंबुलेंस की आवाज़ सुनते ही हम घबरा जाते थे। उस समय वाईएसआर सरकार ने मृतकों के परिजनों को दो लाख रुपये की अनुग्रह राशि दी थी, लेकिन केयर अस्पताल में इलाज कराने वालों को वादा किए अनुसार भुगतान नहीं मिला।

36 वर्षीय सैयद आमिर, जो उस समय किशोर थे जब उनके चाचा सैयद गनी की भोलकपुर त्रासदी में मौत हो गई थी, बताते हैं कि उन्हें भी तेज बुखार और उल्टियां हुई थीं। “मेरे बड़े भाई भी बीमार पड़े थे लेकिन ठीक हो गए,” उन्होंने कहा। इसके बाद उनके परिवार ने वॉटर प्यूरिफायर का इस्तेमाल शुरू कर दिया।

पानी के जार का तेज़ी से बढ़ता कारोबार

हालांकि हर कोई वॉटर प्यूरिफायर खरीदने में सक्षम नहीं है। सिकंदराबाद के वेस्ट मार्रेडपल्ली इलाके में एक घर में चौकीदार का काम करने वाले के. शिवैया बताते हैं कि उनका परिवार पानी को सिर्फ एक साधारण कपड़े से छानकर पीता है। “दो साल पहले पानी की गुणवत्ता बहुत खराब थी। उच्च अधिकारियों से शिकायत के बाद नई पाइपलाइनें डाली गईं। उसके बाद से कोई समस्या नहीं आई,” उन्होंने कहा।

लेकिन उनके घर से कुछ ही दूरी पर स्थित तुलजाभवानी एंटरप्राइजेज नामक वाटर प्लांट चलाने वाले रावुला विनोद का कहना है कि आसपास की सभी अपार्टमेंट इमारतों के निवासी उनसे पानी के जार खरीदते हैं। “हम 20 लीटर के जार में सामान्य शुद्ध पानी 40 रुपये में और ब्रांडेड कंपनियों का पानी 110 रुपये में बेचते हैं। मैं पिछले चार साल से यह व्यवसाय कर रहा हूं। रोज़ाना 70 सामान्य और 40 ब्रांडेड पानी के कैन बिक जाते हैं। गर्मियों में मांग और बढ़ जाती है,” विनोद ने बताया।

पानी के कई स्रोतों पर निर्भर है हैदराबाद

हैदराबाद की पेयजल आपूर्ति उस्मान सागर, हिमायत सागर, सिंगूर जैसी झीलों और मंजिरा, कृष्णा व गोदावरी नदियों पर निर्भर है। ये झीलें आखिरी निज़ाम के शासनकाल में 1908 की विनाशकारी बाढ़ के बाद बनाई गई थीं ताकि ऐसी आपदाओं को रोका जा सके और पीने का पानी उपलब्ध कराया जा सके।

जहां झीलों का पानी गुरुत्वाकर्षण के सहारे शहर तक पहुंचता है, वहीं मंजिरा और सिंगूर जलाशयों से पानी गुरुत्वाकर्षण और पंपिंग दोनों तरीकों से आता है। कृष्णा और गोदावरी का पानी पूरी तरह पंपिंग के जरिए लाया जाता है, जिससे लागत बढ़ जाती है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के एक अध्ययन के अनुसार, नगरजुनसागर से हैदराबाद तक पानी लाने की लागत 6.4 से 18 रुपये प्रति किलोलीटर तक है।

अनियमित आपूर्ति और टैंकरों पर निर्भरता

माधापुर इलाके में रहने वाले निजी कर्मचारी और जल कार्यकर्ता साईं तेजा का कहना है कि पानी की आपूर्ति का समय तय नहीं रहता। कभी शाम 5 बजे तो कभी रात 9 बजे पानी आता है। हाल ही में हैदराबाद मेट्रोपॉलिटन वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड ने पानी की अनुपलब्धता की सूचना देने के लिए व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए हैं। कुकटपल्ली, मियापुर, केपीएचबी, कोंडापुर और गाचीबोवली जैसे इलाके टैंकरों पर निर्भर हैं। टैंकरों की सतहें जंग लगी होती हैं।

हालांकि अच्छे मानसून के कारण हाल के दिनों में टैंकरों की मांग कुछ कम हुई है। मियापुर के जनप्रिय वेस्ट सिटी के निवासी बी. भारत राव कहते हैं,“हमें रोज़ मंजिरा का पानी मिल रहा है, लेकिन कुछ लोग मोटर लगाकर मुख्य लाइन से पानी खींच लेते हैं, जो समस्या है।”

मुंबई के बाद सबसे सुरक्षित नल का पानी

एचएमडब्ल्यूएसएसबी ने 1 दिसंबर 2020 से हर घर को 20,000 लीटर मुफ्त पानी देने की योजना शुरू की थी। 31 दिसंबर 2021 तक पंजीकरण कराने वाले लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। इसके तहत घरों में वाटर मीटर लगाना अनिवार्य है और तय सीमा से अधिक उपयोग पर शुल्क लिया जाता है।भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा 21 शहरों में किए गए अध्ययन के अनुसार, हैदराबाद का नल का पानी मुंबई के बाद देश में पीने के लिए दूसरा सबसे सुरक्षित माना गया है।

एडमिनिस्ट्रेटिव कॉलेज ऑफ इंडिया, हैदराबाद के अध्ययन के मुताबिक, शहर में जल नेटवर्क की कवरेज 90 प्रतिशत है, लेकिन वास्तव में सिर्फ 70 प्रतिशत लोगों तक पाइप से पानी पहुंचता है। बाहरी नगरपालिकाओं में यह कवरेज घटकर 65 प्रतिशत रह जाती है, जिससे केवल 40 प्रतिशत आबादी को ही पानी मिल पाता है। अनियमित आपूर्ति के कारण लोग पानी जमा करके रखते हैं, जिससे दूषित होने का खतरा बढ़ जाता है।

भंडारित पानी सबसे बड़ा खतरा

कम आय वाले इलाकों में किए गए अध्ययन में पाया गया कि नल से आने वाला पानी तो मानकों पर खरा उतरता है, लेकिन घरों में जमा किया गया पानी अक्सर दूषित हो जाता है। अध्ययन में चेतावनी दी गई कि नंगे हाथों से पानी छूने पर ई-कोली जैसे रोगाणु प्रवेश कर सकते हैं।

एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया की वरिष्ठ वैज्ञानिक अनू मेहा वत्स कहती हैं, “पानी की आपूर्ति केवल नल चालू रखने तक सीमित नहीं है। इसके लिए वितरण, मूल्य निर्धारण और पहुंच पर समग्र निगरानी जरूरी है। पानी की उपलब्धता तब तक पर्याप्त नहीं मानी जा सकती, जब तक वह स्वास्थ्य मानकों पर खरा न उतरे।

जल स्रोतों के संरक्षण की ज़रूरत

मानव गतिविधियां जैसे कृषि, उद्योग और अनियंत्रित कचरा निपटान स्थिति को और जटिल बना देती हैं। पिछले तीन दशकों से हैदराबाद की झीलों पर काम कर रहे बी.वी. सुब्बा राव कहते हैं, “हुसैन सागर 1946 तक पीने के पानी का स्रोत था। कवुनी चेरुवु का पानी 2009 तक इस्तेमाल होता रहा। स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण जरूरी है। इस्तेमाल किए गए पानी को दोबारा शुद्ध कर उपयोग में लाना चाहिए। हम फ्लाईओवर, भविष्य के शहरों और सुरंगों पर ध्यान दे रहे हैं, लेकिन पानी और हवा जैसी बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज किया जा रहा है।”

गौरतलब है कि सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों में शामिल है, जिन पर 2015 में भारत समेत सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किए थे।

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