पानी नहीं, जहर पहुंचता रहा घरों तक: अफसर–नेता फाइल घुमाते रहे, भागीरथपुरा में बुझते गए चूल्हे
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पानी नहीं, जहर पहुंचता रहा घरों तक: अफसर–नेता फाइल घुमाते रहे, भागीरथपुरा में बुझते गए चूल्हे

Indore poisoned water: भागीरथपुरा की यह त्रासदी बताती है कि जब फाइलें टेबल पर घूमती रहती हैं और जिम्मेदारी तय नहीं होती तो उसकी कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।


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Bhagirathpura water incident: भागीरथपुरा में लोग पानी नहीं, ज़हर पी रहे थे और दफ्तरों में बैठा सिस्टम यह तय कर रहा था कि फाइल आज आगे बढ़ेगी या कल। जब तक कागज आगे बढ़ते रहे, तब तक 16 घरों के चूल्हे हमेशा के लिए बुझ चुके थे। यह मामला महज एक पाइपलाइन के फटने की नहीं है, यह उस व्यवस्था के फेल होने की कहानी है, जो मौतों के बाद ही जागती है। भागीरथपुरा इलाके में पाइपलाइन को बदलने की प्रक्रिया तीन साल पहले शुरू हो चुकी थी, लेकिन अफसरों और नेताओं की सुस्ती के कारण काम समय पर पूरा नहीं हुआ।

भागीरथपुरा में गंदे पानी की शिकायतें नई नहीं थीं। लंबे समय से लोग बदबूदार और गंदा पानी आने की शिकायत कर रहे थे।

जुलाई 2022

तत्कालीन नगर निगम आयुक्त प्रतिभा पाल ने समस्या को गंभीर मानते हुए 2 करोड़ 40 लाख रुपए की लागत से नई पाइपलाइन बिछाने के लिए टेंडर जारी किया।

नवंबर 2022

23 नवंबर को फाइल जलकार्य समिति को भेजी गई और 25 नवंबर को महापौर परिषद ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यहां तक सब ठीक था, लेकिन इसके बाद फाइल की रफ्तार थम गई।

जिस फाइल का सीधा संबंध लोगों की सेहत से था, वह सिर्फ हस्ताक्षरों के लिए महीनों तक दफ्तरों में पड़ी रही।

3 फरवरी 2023 को अपर आयुक्त ने दस्तखत किए। 6 फरवरी 2023 को महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने हस्ताक्षर किए। यानी करीब तीन महीने सिर्फ साइन होने में लग गए। इतना ही नहीं, वर्क ऑर्डर जारी होने के बाद भी साढ़े तीन साल बीत गए, लेकिन पाइपलाइन का काम आज तक पूरा नहीं हो सका।

महापौर की सफाई

महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने देरी पर कहा कि टेंडर में केवल एक ही ठेकेदार था और उसका पिछला काम ठीक नहीं था, इसलिए जांच में समय लगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या जांच की कीमत लोगों की जान से ज्यादा थी?

दूसरे चरण की कहानी और भी चौंकाने वाली है। 12 नवंबर 2024 को दूसरे फेज की फाइल तैयार हो गई। लेकिन महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। करीब 9 महीने बाद टेंडर जारी किया गया। 17 सितंबर 2025 को टेंडर खोलने की तारीख तय थी, लेकिन न टेंडर खुले और न काम शुरू हुआ। इस दौरान फाइल अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया की टेबल पर पड़ी रही और भागीरथपुरा के लोग गंदा पानी पीने को मजबूर रहे।

तीन दिन में 9 मौतें

आखिरकार वही हुआ, जिसका डर था। दूषित पानी पीने से 3 दिनों में 9 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग बीमार हो गए। शहर में हड़कंप मच गया और मामला मीडिया में छा गया।

30 दिसंबर 2025

जिस फाइल पर 8 महीने तक कोई ध्यान नहीं दिया गया था, उसी पर एक दिन में हस्ताक्षर हो गए। अगले ही दिन टेंडर खोला गया और ठेकेदार को वर्क ऑर्डर भी दे दिया गया। यानी जो काम 8 महीने में नहीं हुआ, वह 24 घंटे में हो गया।

निलंबित कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव के अनुसार, भागीरथपुरा की पाइपलाइन 1998 में बिछाई गई थी। बार-बार सड़क, सीवर और अन्य कामों के लिए खुदाई हुई। खुदाई के दौरान पाइप में छेद हो गए। उन्हीं छेदों से गटर का पानी पीने के पानी में मिल गया। समय रहते पाइपलाइन बदली जाती तो यह हादसा टल सकता था।

अफसर-नेताओं की खींचतान

1 जनवरी की बैठक में महापौर ने अधिकारियों पर नाराजगी जताते हुए कहा कि अधिकारी सुनते नहीं हैं। मैं ऐसे सिस्टम में काम नहीं कर सकता। वहीं क्षेत्र के पार्षद कमल वाघेला ने कहा कि उन्होंने कई बार नगर निगम को लिखित शिकायतें दी थीं।

आखिरकार हुई कार्रवाई

लगातार दबाव और जनता के गुस्से के बाद सरकार ने कदम उठाए गए। नगर निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव हटाए गए। अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया सस्पेंड हुए। इसके साथ ही कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव को सस्पेंड किया गया।

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